हिंदी सेक्सी कहानियां



हिंदी सेक्सी कहानियां


जवानी चार दिनों की-3

Posted: 16 Feb 2013 06:58 PM PST

चौकीदार के जाते ही मैंने दरवाजा अंदर से बंद किया और पकड़ कर पायल को अपनी बाहों में भर लिया।

"बहुत बेताब हो मुझे चोदने के लिए...?"

पायल के मुख से यह 'चोदना' शब्द सुन एक पल को तो मैं हैरान रह गया लेकिन मैं बोला- मेरी जान कल रात से तड़प रहा हूँ तुम्हें पाने के लिए... अब तो बेताबी की हद हो गई है।

मैंने पायल को अपनी बाहों में उठाया और बेड पर लेटा दिया। उसने मुझे दो मिनट रुकने के लिए कहा और फिर अपनी सारी ज्वेलरी आदि उतार कर एक तरफ रख दी और फिर खुद ही आकर मेरी गोद में बैठ गई।

मैं अब और इंतज़ार नहीं कर सकता था। मैंने बिना देर किये अपने होंठ पायल के होंठों पर रख दिए और मेरे हाथ सीधा पायल की मस्त चूचियों को दबाने लगे थे। पायल भी जैसे प्यार के लिए तड़प रही थी। वो भी पूरी मस्ती में मेरे किस का जवाब दे रही थी।

करीब पाँच मिनट तक किस करने के बाद मेरे हाथ पायल के बदन से कपड़े कम करने में व्यस्त हो गए। पायल ने लहँगा-चोली पहना हुआ था। मैंने पहले उसकी चोली की डोर ढीली करके उसे उसके बदन से अलग किया। ब्रा में कसी उसकी बड़ी बड़ी चूचियाँ हिमालय को भी नीचा दिखा रही थी। मैं पायल की चूचियों पर टूट पड़ा और मस्त होकर उसकी चूचियों को उसकी ब्रा के ऊपर से ही चूमने चाटने लगा।

पायल की सिसकारियाँ कमरे में गूँजने लगी थी। तभी मैंने पीछे हाथ ले जाकर ब्रा का हुक खोल दिया तो दोनों बड़े बड़े खरबूजों जैसे चूचियाँ उछल कर मेरे सामने लहराने लगी।

पायल की चूचियाँ एकदम खड़ी खड़ी और तनी हुई थी। चूचियों के चुचूक भूरे रंग के थे और गोरी गोरी चूचियों पर इतने मस्त लग रहे थे कि मैं अपने आप को रोक नहीं पाया और मैंने झट से उसके बाएँ चुचूक को अपने होंठों में दबा लिया और चूसने लगा। मैं बेरहमी से पायल की चूचियाँ मसल रहा था और उसके चुचूक को दांतों से काट रहा था।

"आह... खा जाओ राज.... आह... ओह्ह... पी जाओ मेरी चूचियों को..." पायल मस्ती में बड़बड़ा रही थी।

मेरा लण्ड भी अब पैंट से बाहर निकलने के लिए उछल कूद मचा रहा था। पायल ने जैसे उसकी परेशानी को समझ लिया था तभी तो उसने हाथ बड़ा कर पैंट के ऊपर से ही सहलाना शुरू कर दिया था। पर अब तो लण्ड पैंट से बाहर आकर अपना जलवा दिखाना चाहता था।

मैंने झट से अपनी पैंट खोली और अंडरवियर सहित एकदम से नीचे कर दी। लण्ड महाराज पैंट से निकल कर तोप की तरह तन कर खड़े हो गए।

मैंने पायल का हाथ पकड़ा और लण्ड पर रख दिया। लण्ड हाथ में आते ही पायल उछल पड़ी और वही शब्द 'जो मैं पहले भी कई लड़कियों और औरतों के मुँह से सुन चूका था' पायल के मुँह से निकले।

"हाय राज... तुम्हारा तो बहुत मोटा है !"

लण्ड भी अपनी तारीफ सुन कर पायल के हाथों में ही खुशी से उछलने लगा। कुछ देर हाथ से सहलाने के बाद पायल घुटनों के बल बैठ गई और अगले ही पल मैं जन्नत में था क्यूंकि पायल ने मेरा लण्ड अपने कोमल कोमल होंठों में जो दबा लिया था। पायल मस्त होकर मेरा लण्ड चूसने और चाटने लगी। मेरे मुँह से भी मस्ती भरी आहें निकल रही थी। मैं पायल के बाल पकड़ कर लण्ड को पूरा उसके मुँह में डाल रहा था और पायल भी जीभ घुमा घुमा कर मेरा लण्ड चूस रही थी।

कुछ देर बाद मैंने पायल को खड़ा किया और फिर हम दोनों ने एक दूसरे के बाकी बचे कपड़े भी उतार दिए। अब हम दोनों कमरे में बिल्कुल नंगे थे।

दोनों के नंगे बदन फिर से एक दूसरे से लिपट गए। मैंने उसको बिस्तर पर लेटाया और उसकी क्लीन शेव चूत के ऊपर जीभ रगड़ने लगा। पायल मस्त हो उठी और उसकी चूत जो पहले से ही गीली हो चुकी थी एक बार फिर से पानी पानी हो गई। पायल मेरे लण्ड को पकड़ पकड़ कर खींच रही थी। मैं बिस्तर के ऊपर आ गया और फिर हम 69 की अवस्था में आ गए। अब पायल मेरा लण्ड चूस रही थी और मैं पायल की चूत चाट रहा था।

पायल की चूत लगातार पानी छोड़ रही थी और अब मेरा लण्ड भी झड़ने के कगार पर था। मैं अभी झड़ना नहीं चाहता था। इसीलिए मैंने लण्ड पायल के मुँह से निकाल लिया और उसकी टांगों के बीच में आकर बैठ गया। पायल की चूत कमरे की दूधिया रोशनी में चमक रही थी। मैंने देर न करते हुए लण्ड को पायल की चूत के छेद पर लगाया तो पायल ने भी अपने चूतड़ ऊपर उठा कर मेरे लण्ड का स्वागत किया।

मैं लण्ड को चूत के छेद रगड़ रहा था। तभी मैंने एक जोरदार धक्के के साथ आधे से ज्यादा लण्ड पायल की चूत की गहराई में उतार दिया।

पायल की चीख निकल गई।

वो तो मैंने उसकी मुँह पर हाथ रख दिया नहीं तो पूरा गेस्ट हाउस जाग जाता।

"राज... धीरे धीरे करो... तुम्हारा लण्ड बहुत मोटा है।"

मैंने लण्ड को बाहर खींचा और इस बार थोड़ा आराम से लण्ड को अंदर डाला। पायल की चूत बहुत कसी थी। चूत की दीवारें लण्ड को जकड़े हुए थी। लगता नहीं था कि यह किसी शादीशुदा औरत की चूत है।

मैंने लण्ड एक बार फिर बाहर निकाला और फिर एक जोरदार धक्के के साथ पूरा लण्ड पायल की चूत में घुसा दिया। लण्ड सीधा पायल की बच्चेदानी से टकराया था।

पूरा लण्ड चूत में डालने के बाद मैं कुछ देर पायल के ऊपर लेटा उसके होंठ और चूचियों को चूमता रहा। पायल ने भी अब अपने कूल्हे उछालने शुरू कर दिए थे। मैंने भी अब पायल की गर्म गर्म चूत में लण्ड को अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया और फिर धीरे धीरे स्पीड बढ़ाते हुए पायल की चूत चोदने लगा। पायल भी गाण्ड उछाल उछाल कर मेरा लण्ड अंदर तक ले रही थी।

"चोद... चोद मेरे राजा... चोद मुझे... जोर जोर से चोद.... फाड़ दे मेरी चूत... चोद मुझे... साली को पहली बार कोई मस्त लण्ड मिला है... आज तो फाड़ डाल मेरे राजा..."

"कल से मेरे लण्ड की हालत खराब कर रही थी... चुद अब मेरी जान चुद...फड़वा ले अपना भोसड़ा !"

चुदाई अपने पूरे शबाब पर थी। धक्के दुरंतो की गति से में चल रहे थे। पायल की चूत पानी पानी हो रही थी। दस मिनट की चुदाई में दो बार झड़ चुकी थी पायल। कमरे में अब फच्च फच्च का मादक संगीत गूंज रहा था।

कुछ देर ऐसे ही चोदने के बाद मैंने पायल को घोड़ी बनाया और पीछे से लण्ड उसकी चूत की गहराई में उतार दिया और पूरे जोश के साथ पायल की चुदाई करने लगा।

बीस मिनट तक बिस्तर पर भूचाल आया रहा और फिर मेरा लण्ड भी पायल की चूत को प्रेमरस से भरने के लिए तैयार हो गया। मैंने पायल से पूछा- मैं झड़ने वाला हूँ तो?

उसने मुझे चूत में ही झड़ने के लिए कहा। फिर मैं ज्यादा देर अपने आप को रोक नहीं पाया और तेज तेज धक्के लगाते हुए पायल की चूत में झड़ने लगा। ढेर सारा प्रेम रस यानि वीर्य मैंने पायल की चूत में भर दिया। पायल लण्ड अंदर लिए लिए ही नीचे लेट गई और मैं भी उसके ऊपर लेट गया। हम दोनों ही लम्बी लम्बी साँसें ले रहे थे।

कुछ देर ऐसे ही लेटे रहने के बाद हम दोनों अलग हुए। पायल के चेहरे पर संतुष्टि के भाव स्पष्ट पढ़े जा सकते थे। वो आँखें बंद किये कुछ देर पहले हुई चुदाई के आनन्द सागर में गोते लगा रही थी।

मैंने पायल को हिला कर उठाया। वो उठी और मेज़ पर से नेपकिन उठा कर मेरा लण्ड और अपनी चूत साफ़ करने लगी। यह पायल के हाथों का ही जादू था कि पायल के हाथ में जाते ही लण्ड एक बार फिर से सर उठाने लगा। पायल मेरी तरफ देख कर मुस्कुराई और बोली- तुम्हारा लण्ड बहुत शैतान है... अभी अभी मेरी मुनिया की कुटाई की है और अब देखो फिर से कैसे अंगडाई ले रहा है।

"तो पकड़ कर साले के बल निकाल दो ना मेरी जान..."

पायल मुस्कुराई और फिर कुछ सोच कर लण्ड को अपने मुँह में भर लिया।

लण्ड ने खड़ा होने में बिल्कुल भी देर नहीं लगाई और कुछ ही देर में एक बार फिर से चुदाई के लिए तैयार हो गया।

पायल ने मुझे नीचे लेटाया और खुद ऊपर आकर मेरे लण्ड पर अपनी चूत रख कर बैठ गई। लण्ड पायल की चूत में ऐसे घुस गया जैसे माखन में चाकू। पूरा लण्ड अंदर लेने के बाद पायल ऊपर नीचे होकर लण्ड अंदर-बाहर करने लगी और मैं उसके अपने सीने पर झूलते मोटे मोटे खरबूजों को मसलने और चूसने लगा।

अगले आधे घंटे तक मस्त चुदाई चली। कभी पायल ऊपर कभी मैं ऊपर। पायल तीन बार और झड़ चुकी थी और अब उसमें उठने की भी ताकत नहीं बची थी।

मैंने भी एक बार फिर से पायल की चूत को अपने गर्म गर्म वीर्य से भर दिया और एक दूसरे को बाहों में लिए लेटे रहे। तभी घड़ी पर नजर गई तो पाँच बजने में दस मिनट बाकी थे। मैंने पायल को उठाया और तैयार होने के लिए कहा।

पायल बाथरूम में जाकर फ्रेश होकर आई और फिर मेरे सामने ही खड़ी होकर तैयार होने लगी। मैंने भी अपने कपड़े पहन लिए थे।

साढ़ पाँच बजे हम दोनों तैयार होकर निकले।

जब हम पैलेस पर पहुँचे तो विदाई का कार्यक्रम चल रहा था। हम दोनों ने भी गाड़ी डोली की गाड़ी के पीछे पीछे लगा दी और बारात के साथ साथ घर पहुँच गए। महक को छोड़ कर किसी को भी शक नहीं हुआ था।

अगले दिन दिनभर सोने के बाद रात को मैं वापिस दिल्ली के लिए तैयार हो गया तो पायल भी मेरे साथ ही तैयार हो गई। विक्रम से विदा लेकर मैं बस स्टैंड पर जाने के लिए निकला तो विक्रम अपनी गाड़ी में मुझे और पायल को छोड़ने हमारे साथ आया। बस स्टैंड पर छोड़ कर विक्रम वापिस चला गया।

मैंने पायल से पूछा- क्या प्रोग्राम है?

तो वो बोली- बस पकड़ कर चलना है और क्या?

पर मेरे होंठों की मुस्कान देख कर वो मेरा इरादा समझ गई। फिर हम दोनों बस स्टैंड के पास के ही एक होटल में चले गए और रात को दो बजे तक दो बार चुदाई का आनन्द लिया और फिर अढ़ाई बजे रात को हम दिल्ली की बस में सवार हो गए।

उसके बाद पायल मुझे दिल्ली में बहुत बार मिली और हम दोनों ने चुदाई का भरपूर आनन्द लिया।

दोस्तों जवानी सिर्फ चार दिन की है और मैं अपने ये चार दिन भरपूर मस्ती में बिताना चाहता हूँ और बिता भी रहा हूँ। आगे भी अपने और किस्से आप लोगों तक पहुँचाता रहूँगा। ये किस्सा कैसा लगा मेल लिख कर जरूर बताएँ।

आपका अपना राज

मेल आईडी तो याद है ना दोस्तो...

sharmarajesh96@gmail.com

sexygirl4uonly16@gmail.com

असली चुदाई का मज़ा

Posted: 13 Feb 2013 08:02 PM PST

मैं दिल्ली की रहने वाली हूँ। जो किस्सा मैं आपको सुनाने जा रही हूँ, वोह कुछ साल पहले मेरे साथ मेरे कॉलेज के प्रथम वर्ष में हुआ था।

कॉलेज शुरू करने पर मेरा बस से आना जाना बढ़ गया। कॉलेज का पहला साल था। स्कूल से निकल कर मिली हुई आज़ादी का पहला पहला स्वाद था। दिल्ली की बसों में चलने की आदत भी पड़ने लगी, और मज़ा भी आने लगा। वैसे तो दिल्ली की बसें लड़कियों के लिए मुसीबत भरी होती हैं, इतनी भीड़ होती है, ऊपर से भीड़ में हर मर्द आशिक बन जाता है।

वैसे तो कॉलेज जाना शुरु होने से पहले से ही दिल्ली की बसों में कोई न कोई अंकल हमेशा कभी मेरे मम्मे दबा देते, तो कभी मेरी चूत सहला देते।

लेकिन कॉलेज के पहले साल तक मुझे इस मुसीबत में मज़ा आने लगा था। मेरी जवानी खुद ही गर्मी खा रही थी। दिल्ली की बसों में मर्दों के भूखे हाथ अच्छे लगने लगे थे।

जब सहेलियों के साथ होती तब तो सीधी रहती लेकिन जब अकेली कॉलेज जा रही होती तो अगर कोई बस में मेरे मम्मे दबाता, तो बजाये उसे मना करने के या दूर हटने के, मैं चुपचाप अनजान बनी रहती। उसकी हिम्मत बढ़ती और वह रास्ते भर मेरी चूचियाँ दबाता, या फिर मेरी चूत सहलाता।

कभी कोई लड़का अपना खड़ा लण्ड मेरी चूत या गांड से सटा के दबाता। कोई कोई तो इतनी बेरहमी से चूचियाँ मरोड़ता था कि सीधे बिजली की तरह चूत में कर्रेंट लग जाता। मुझे इतना मज़ा आने लगा था कि कभी कभी जानबूझ कर बिना ब्रा और पैन्टी पहने कॉलेज जाती। ब्रा और पन्टी बैग में रख लेती, कॉलेज पहुँच कर पहनने के लिए।

बिना ब्रा के जब कोई मर्द मेरे मम्मे पकड़ता और दबाता, ऐसा लगता जैसे मैं नंगी हूँ और उसके खुरदुरे हाथ चोदने से पहले मेरी चूचियों का आनन्द ले रहे हैं। बिना पैन्टी के जब किसी का खड़ा लण्ड मेरी चूत से टकराता तो बस उसकी पैंट और मेरी स्कर्ट के पतले कपड़े के अलावा बीच में कुछ नहीं होता।

और लड़कियाँ कभी कभी बस में सफ़र करने से शिकायत करती थीं, पर मुझे तो दिल्ली की बसों में सफ़र करना बहुत भाता था।

एक दिन ऐसा ही हुआ कि मैं बस में कॉलेज जा रही थी। पहली क्लास थोड़ी देर से थी, लेकिन बस ठसाठस भरी हुई थी।

बस एक स्टॉप पर रुकी और दो लड़के बस में चढ़े। अन्दर जगह नहीं थी, पर जगह बनाते हुए वे अन्दर आ गए। उनमें से एक की नज़र मुझ से मिली, और न जाने क्यों उसने मेरी तरफ बढ़ना शुरू कर दिया। भीड़ को चीरते हुए, वह बस में अन्दर आता रहा और मेरे पास आकर रुक गया।

दूसरा लड़का भी उसके पीछे पीछे जगह बनता हुआ पास में आ गया। पहला लड़का ऊंचा और गोरा था, दूसरा लड़का साधारण ऊँचाई और रंग का था। दोनों मेरे पास थोड़ी देर तक चुपचाप खड़े रहे। बस चलती रही और उसके तेज़ मोड़ और धक्के बार-बार मुझे उस ऊंचे लड़के से टकराने पर मजबूर कर रहे थे। शायद उस लड़के को मेरे मम्मों के उछाल से समझ में आ गया कि मैंने ब्रा नहीं पहनी है। वह ध्यान से मेरे सीने की ओर देखने लगा और फिर थोड़ा और आगे बढ़ कर मेरे और करीब आ गया।

अब तो मेरी नाक उसकी छाती से टकरा रही थी। अगली बार जब बस का धक्का लगा, तो मैं करीब करीब उसके ऊपर गिर ही पड़ी। संभलने में मेरी मदद करते हुए उसने मेरे दोनों चूचियों को पूरी तरह जकड़ लिया। इतनी भीड़ थी और हम इतने करीब थे कि मेरे सीने पर उसके हाथ और मेरी चूचियों का बेदर्दी से मसलना कोई और नहीं देख सकता था। मेरे सारे शरीर में कर्रेंट दौड़ गया, अपनी चूत में मुझे अचानक तेज़ गर्मी महसूस होने लगी। इतना सुख महसूस हो रहा था कि दर्द होने के बावजूद मैंने उसे रोका नहीं।

बस फिर क्या था, उसकी समझ में आ गया कि मैं कुछ नहीं बोलूंगी। फिर तो वह और भी पास आ गया और मेरे मम्मे सहलाने लगा। मेरी चूचियाँ तन कर खड़ी हो गई थी, वह उनको मरोड़ता और सहलाता। मेरी आँखें बंद होने लगी, मैं तो स्वर्ग में थी !

तभी मुझे एहसास हुआ कि पीछे से भी एक हाथ आ गया है जो मेरे मम्मे दबा रहा है। दूसरा लड़का मेरे पीछे आकर सट कर खड़ा हो गया था। उसका लण्ड खड़ा था और मेरी गांड से टकरा रहा था।

अब मैं उस दोनों के बीच में सैंडविच हो गई थी, दोनों बहुत ही करीब खड़े थे और मुझे घेर रखा था। इतने में पहले लड़के ने अपना हाथ नीचे से मेरी टी-शर्ट में डाल दिया। उसका हाथ मेरे नंगे बंदन पर चलता हुआ मेरे मम्मों के तरफ बढ़ने लगा।

मेरी सांस रुकने लगी, मन कर रहा था की चीख कर अपनी टी-शर्ट उतार दूँ और उसके दोनों हाथ अपने नंगे सीने पर रख लूँ।

आखिर उसके हाथ मेरी नंगी चूचियों तक पहुँच ही गए। अब तो मेरी वासना बेकाबू हुए जा रही थी।

पीछे खड़े हुए लड़के ने भी अपना हाथ मेरी टी-शर्ट के अन्दर डाल दिया। अब तो मैं सैंडविच बन कर खड़ी थी, मेरे एक मम्मे पर पीछे वाले का हाथ था, और दूसरे को आगे वाले ने दबोच रखा था।

तभी आगे वाले लड़के ने अपना मुँह मेरे कान के पास ला कर कहा,"मज़ा आ रहा है न?"

मैंने कोई जवाब नहीं दिया। मुँह में ज़ुबान ही नहीं थी।

उसने फुसफुसा के कहा,"थोड़ी टाँगे फैला दे तो और भी मज़ा दूंगा।"

मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा। लेकिन वासना की आग इतनी तेज़ जल चुकी थी कि अपने को रोक न पाई, बिना कुछ कहे मैंने अपने टाँगें थोड़ी फैला दीउसने अपना एक हाथ मेरे मम्मे पर रखा, और दूसरा मेरी स्कर्ट में घुसा दिया। उसकी उँगलियाँ मेरी कोमल कुंवारी चूत तक पहुँच गई।

जैसे ही उसके हाथ मेरी चूत के हल्के बालों से टकराए, वह चौंक गया, फिर अपने दोस्त से फुसफुसा कर बोला,"साली ने पैन्टी भी नहीं पहनी है। यह तो चुदने के लिए बस में चढ़ी है।"

फिर अपनी उंगलिओं से मेरी चूत की फांकें अलग करके उसने एक उंगली मेरी गीली चूत में घुसानी चाही, लेकिन उसको रास्ता नहीं मिला।

अब वह दुबारा चौंका और मुझसे ऐसी आवाज़ में बोला कि बस मैं और उसका दोस्त ही सुन सकते थे,"रानी, इतनी बेताब हो चुदने के लिए लेकिन अभी तक तुम्हारी चूत की सील भी नहीं टूटी है। अगर तुम चाहो तो हम तुम्हारी चूत का ताला अपनी चाभी घुसा कर खोल देते हैं, फिर चाहे कितना भी मज़ा करना।"

उसके दोस्त ने मेरी चूची को नोच कर मेरे दूसरे कान में मदहोश करने वाले तरीके से फुसफुसा के कहा,"छुआ छुई में जो मज़ा है, रानी, असली चुदाई में उस से कहीं ज्यादा मज़ा आएगा। और हम तुझे चोदेंगे भी बहुत प्यार से। तीनों मिल के मौज करेंगे और फिर तुझे हिफाज़त से छोड़ देंगे।"

पता नहीं तब तक मेरी बुद्धि कहाँ जा चुकी थी, मेरी चूत से नदी बह रही थी, मम्मे और चूचियाँ बुरी तरह दुःख रहे थे लेकिन उनका मीठा मीठा दर्द मेरे शरीर में आग लगा रहा था, मैंने धीरे से पूछा,"कहाँ और कैसे?"

बस, फिर क्या था, दोनों की आँखों में चमक आ गई। लम्बे कद वाला लड़का बोला,"जे एन यू में उतर जाते हैं। उसका कैम्पस बड़ा है, और वहाँ काफी जंगल है। मुझे एक दो जगह मालूम हैं, वहाँ कहीं अपना काम बन जाएगा।"

जे एन यू तो अगला ही स्टॉप था !

सोचने या संभलने का मौका मिले, इससे पहले ही मैं उनके साथ बस से उतर चुकी थी।

जैसे ही बस हमें उतार कर चली गई, मुझे थोड़ा होश आया। यह मैं क्या कर रही थी? पर तब तक लम्बा लड़का एक ऑटो रोक चुका था और हम तीनों उस ऑटो में सवार हो गए।

उसने ऑटो वाले को रास्ता बताया। इतने में दूसरे लड़के ने मुझे बीच में बैठा कर मेरा बैग मेरे घुटनों पर रख दिया। इस तरह ऑटो वाले की निगाह बचा कर उसने फिर मेरे मम्मे और चूचियाँ मसलने शुरू कर दिए। मेरे बदन में फिर से गर्मी आने लगी, पर तब तक डर भी लगने लगा था। मैं एक नहीं, दो बिल्कुल अनजाने मर्दों से चुदने जा रही थी, मुझे तो यह भी पता नहीं था कि यह कंडोम लाये हैं या नहीं।

ऑटो चले जा रहा था और रास्ता सुनसान हो गया था। सड़क पतली थी। आखिर हिम्मत जुटा कर मैंने लम्बे लड़के से फुसफुसा के कहा "आज नहीं करते, कभी और करवा लूँगी, आज जाने दो।"

उसने बोला,"ऐसा मत बोल, रानी, आज बात बन रही है, इसे तोड़ मत। इतना आगे आकर पीछे मत हट।"

मैंने कहा,"देखो मैंने पहले कभी नहीं किया है। मेरे साथ ऐसा मत करो, मुझे जाने दो।"

हमारी बातों से ऑटो ड्राईवर को शायद शक हो गया। उसने अचानक ऑटो किनारे पर रोक के बोला,"तुम लोग इस लड़की को जानते हो?"

मुझे आशा बंधी कि ऑटो ड्राईवर के होते ये लड़के मेरे साथ कुछ नहीं कर सकते, मैंने कहा, "हम बस में मिले थे और यह मुझे बेवक़ूफ़ बना कर यहाँ लाये हैं। कृपया मुझे वापस ले चलिए।"

यह सुन कर दूसरा लड़का बोला,"चुप साली ! बस में तो टांगें चौड़ी कर रही थी, मम्मे दबवा रही थी और चुदने को रजामंद होकर हमारे साथ यहाँ आई, और अब बात से फिरती है?"

फिर ऑटो ड्राईवर से बोला,"देख चुप चाप चला चल। इसकी चूत तो आज हम फाड़ेंगे ही, चाहे कुछ भी हो जाए। अगर तू बीच में पड़ेगा तो पिटेगा। अगर साथ देगा तो तू भी इसकी ले लेना।"

यह कह कर उसने मेरा बैग हटा दिया, और मेरी टी-शर्ट पूरी तरह उतार दी। ऑटो ड्राईवर के भूखी निगाहें मेरे सीने पर गड़ गईं। लम्बे लड़के ने उसके सामने मेरे मम्मे मसलने शुरू कर दिए। ऑटो ड्राईवर ने हाथ बढ़ा कर मेरे नंगे सीने को टटोला, मेरी चूचियाँ खींची और फिर दांत दिखा के बोला, "क्या माल लाये हो! किराया भी मत देना।"

बस, फिर तो मैं समझ गई कि आज चूत खाली खुलेगी ही नहीं, चौड़ी भी होगी।

ऑटो चल पड़ा, और थोड़ी देर में एक कच्चे रास्ते पर उतर गया। थोड़ी और देर के बाद ऑटो को रोक कर तीनों उतर गए और मुझे भी उतरने के लिए कहा। चुदने का समय आता देख कर मेरे मन में रोमांच पैदा होने लगा पर दिखावे के लिए मैंने उनको मना भी किया लेकिन कोई असर नहीं हुआ।

लम्बा लड़का बोला, "देख, खड़े लण्ड पर लात मत मार। चुपचाप चुदवा ले तो प्यार से चोदेंगे, खूब मज़ा देंगे तुझे !"

दूसरा लड़का बोला,"राकेश, इसका उद्घाटन मैं करूंगा !"

तो लम्बा लड़का बोला, "नहीं रे, इस कलि का गुलाब तो मेरे लण्ड से बनेगा। मैंने इसे पटाया था, इसकी चूत मैं लूँगा।"

यह कह के राकेश ने मेरी स्कर्ट खींच के उतर दी, और मैं पूरी नंगी हो गई।

ऑटो ड्राईवर बोला, "बाबा रे बाबा, पैन्टी भी नहीं पहनी है। तुम लोग ठीक कह रहे थे, यह साली शरीफ बनती है पर रंडी है।"

फिर वे मुझे पेड़ों के बीच एक झुरमुट में ले गए, एक झटके में उन्होंने मुझे ज़मीन पर लिटा दिया। तीनों अपने कपड़े उतारने लगे और मुझे पर टूट पड़े, मेरे मम्मों और चूचियों को नोचने लगे, अपनी ज़ुबान मेरे मुँह में घुसाने लगे और मेरी टांगें चौड़ी करके मेरी चूत चाटने लगे।

"साली तेरी चूत तो इतनी गीली है और बोल रही है कि चुदवाना नहीं चाहती। इसमें मेरा लण्ड ऐसा जायेगा जैसे मक्खन में छुरी ! आज तो तुझे ऐसा चोदूँगा रांड की तेरी सारी प्यास बुझ जायेगी।"

मुझे मज़ा आ रहा था, डर लग रहा था और सचमुच में आज चुदाई होगी इस ख्याल से रोमांच भी हो रहा था।

एक साथ तीन मर्द मेरे बदन को आज बेरहमी से इस्तेमाल करने वाले थे। मैंने कई बार खीरा और गाजर चूत में घुसाने की कोशिश की थी, लेकिन इतना दर्द होता था कि आगे बढ़ नहीं पाती थी। अपने हाथ से चूत की सील तोडना मुश्किल है, पर ये लड़के तो बिना घुसाए मानेंगें नहीं। आज तो यह होना ही था। मैं यही सब सोच रही थी कि अचानक मैंने महसूस किया कि राकेश ने अपने लण्ड का सुपारा मेरी चूत पर रख दिया और धीरे धीरे धक्का लगाना शुरू कर दिया था।

वह मेरे ऊपर लेटा हुआ था और मेरी टांगें जितनी फैल सकती थी, फैला रखी थी।

मैं अभी इस बात को समझ ही रही थी कि दूसरे लड़के ने अपना लण्ड मेरे मुँह में ठूंस दिया और अन्दरबाहर करने लगा। राकेश ने लण्ड पर जोर डालना शुरू कर दिया था। मुझे दर्द होने लगा, जैसे कोई डण्डा अन्दर जा रहा हो लेकिन मुंह में लण्ड होने की वजह से कोई आवाज़ नहीं कर सकती थी।

राकेश जोर डालता रहा और धीरे धीरे उसका लण्ड मेरी चूत के अन्दर जाने लगा। हर थोड़ी देर में वोह कुछ सेकंड को रुक कर पीछे खींचता और फिर आगे दबाता। ऐसा लगा जैसे यह अनंत काल तक चला हो।राकेश का लण्ड अब मेरी चूत में जड़ तक घुस चुका था। एक मिनट रुक के राकेश ने धक्के लगाने शुरू कर दिए। अब भी दर्द से बुरा हाल था लेकिन उसके धक्के तेज़ होने लगे। मेरी चूत थोड़ी ढीली हुई तो राकेश ने धक्के लम्बे कर दिए। उधर उसका दोस्त ताबड़तोड़ मेरे मुँह को चोद रहा था। ऑटो वाला मेरे मम्मे और चूचियाँ मसलने में मस्त था।

राकेश के धक्के अब मुझे अच्छे लग रहे थे, मेरी चूत से फच फच की आवाज़ आ रही थी।

"अबे देख कैसे गांड उठा उठा कर चुदवा रही है !" यह सुन कर मैं शर्म से पानी हो गई, सचमुच मैं चुदाई का मज़ा लेने लगी थी।

ऑटो वाले के हाथों और मुँह में लण्ड के होने से चूत की चुदाई और भी मज़ेदार लग रही थी।

अचानक मुझे राकेश के धक्के बहुत ही तेज़ होते महसूस हुए। मेरी आँखें बंद थी और मेरी नाक में झाटों के बाल थे, इसलिए कुछ देख नहीं पा रही थी। तभी राकेश रुक गया। उसने अपना लण्ड मेरी चूत में जड़ तक घुसेड़ दिया और मुझे अहसास हुआ कि वह अपना पानी मेरी चूत में छोड़ रहा है।

मैं चिल्ला पड़ी,"प्लीज़ अपना लण्ड निकाल लो। मेरा बच्चा हो गया तो क्या होगा? प्लीज़ ऐसा मत करो।"लेकिन राकेश ने अपना लण्ड निकालने की जगह मेरी चूत में और थोड़ा घुसा दिया।

दूसरा लड़का बोला,"साली रांड, चुदने के लिए मर रही थी और अब बक रही है?"

जैसे ही राकेश झड़ कर मेरी टांगों के बीच से उठा, उसका दोस्त मेरी फैली टांगों के बीच में आ गया। एक झटके में उसने मेरी टांगें उठा कर अपने कन्धों पर रख लीं और बोला, "इस मुद्रा में लण्ड चूत में खूब गहरा जाता है। जब तेरी चूत में मैं अपना वीर्य छोडूंगा तो सीधे तेरी बच्चेदानी में जाएगा।"

इससे पहले कि मैं कुछ भी कहती, उसने एक झटके में अपना लण्ड मेरी चूत में उतार दिया। मैं चिल्ला पड़ी तो ऑटो ड्राईवर ने मेरे खुले मुंह में अपना लण्ड घुसा कर मेरी आवाज़ बंद कर दी।

एक बार फिर मेरी डबल चुदाई शुरू हो गई। मेरी टांगें अब करीब करीब मेरे सर तक पहुँच चुकी थी और मेरी चूत के पूरी गहराई में लण्ड जा रहा था। दूसरे लड़के ने भी अपना पानी मेरी चूत में छोड़ दिया।

मैं अब तक थक चुकी थी, मुँह थक गया था, चूत दुःख रही थी और शरीर पसीने, मिटटी और वीर्य से लथपथ था। लेकिन अभी अंत कहाँ?

अब ऑटो वाले की बारी थी। उसने मुझे उठा कर घुटने के बल झुकने को कहा। दिमाग तो काम ही नहीं कर रहा था, न शरीर में दम था। मैं चुपचाप उसकी बात मान गई। फिर उसने मेरे पीछे जाकर पीछे से मेरी चूत में अपना लण्ड डाला। मेरे सर को उसने ज़मीन की तरफ किया और कुतिया बना कर मुझे चोदने लगा।

मैंने देखा कि राकेश और उसके दोस्त ने कपडे पहनने शुरू कर दिए थे। कम से कम ये दोनों मुझे कई बार नहीं चोदेंगे। ऑटो वाले के हर झटके के साथ उसका पूरा लण्ड मेरी चूत में जाता और मुझे उसकी झाटें अपनी गांड पर महसूस होतीं। घोड़ी बनाकर वह चोदते हुए मेरे मम्मे भी दबा रहा था।

मुझे अहसास हुआ कि मुझे मज़ा आ रहा था। मैं थक गई थी और दर्द हो रहा था, लेकिन घोड़ी बन कर चुदना मेरी सबसे मनपसंद पोजीशन है।

ऑटो ड्राईवर ने भी अपना पानी मेरी चूत में छोड़ा और फिर अपना लण्ड निकाल लिया। राकेश और उसका दोस्त कपड़े पहन चुके थे। उन्हों मेरी टी-शर्ट और स्कर्ट मेरी ओर उछालते हुए कहा,"जल्दी से पहन लो, यहाँ से निकलते हैं।"

पाँच मिनट बाद हम वापस उसी बस स्टैंड पहुँच गए। मेरा बैग मुझे पकड़ा कर राकेश और उसका दोस्त किसी और बस में चढ़ गए, और ऑटो रिक्शा कोई सवारी ले कर चला गया।

मैं थोड़ी देर तक बस स्टैंड पर बैठ कर अपने टांगों के बीच में बहते वीर्य, अपने मम्मों के ज़ख़्म और चूत के दर्द को महसूस करती रही, फिर मुझे राकेश की बात याद आई,"...हम तुम्हारी चूत का ताला अपनी चाभी घुसा कर खोल देते हैं, फिर चाहे कितना भी मज़ा करना..."

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डौली और जौली चुदाई की -2

Posted: 13 Feb 2013 07:27 AM PST

सुबह उठ कर मैं अपने घर आ गया।

दोपहर में फिर डौली के घर गया। उसे अपने बाहों में लेकर चूम ही रहा था कि अचानक छोटी बहन जौली सामने आ गई।

मैंने तो डर कर उसे जल्दी से छोड़ा। हम दोनों को इस हाल में देख कर वह दूसरे कमरे में चली गई। हम दोनों ही बहुत घबरा गए थे। बाद में डौली बोली- जौली एक घंटा पहले ही आई है। इसे पता चला कि घर पर कोई नहीं है तो एक सप्ताह के लिए यहाँ रहने आई है। मैंने वहाँ से जाना ही उचित समझा। डौली को यह बोलते हुए कि फोन करना है, मैं अपने घर आ गया।

घर आ कर मैं बहुत ही तनाव में था। सोच रहा था कि पता नहीं जौली क्या पूछ रही होगी डौली से।

फिर रात के नौ बजे के लगभग में डौली का फोन आया, बोली- क्या सोने नहीं आओगे?

मैंने पूछा- जौली क्या बोली? क्या वह गुस्से में है?

वह बोली- कुछ नहीं बोली और वह नाराज भी नहीं है। अगर नाराज रहती तो क्या हम तुमको सोने के लिए बुलाते?

मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि हम दोनों को इस तरह से देखने के बाद भी जौली नाराज नहीं है। खैर मैं भी तुरंत उनके घर पहुँच गया, देखा दोनों नाईटी पहने टीवी देख रही थी।

मैंने पूछा- क्या बात है, आज बहुत जल्दी तुम लोगों को नींद आ रही है?

डौली बोली- हाँ, मैं तो सोने चली। तुम लोग बातें करो।

और वह उठ कर दूसरे कमरे में सोने चली गई।

मैं घबरा गया।

कुछ देर के बाद जौली ने ही चुप्पी तोड़ी- और क्या हाल है?

"ठीक हूँ।" मैंने कहा- क्या तुम नाराज हो मुझसे?

जौली बोली- नहीं तो ! नाराज क्यों होऊँगी? अब तो हम दोनों का नया रिश्ता बन गया है।

"क्या मतलब?" मैंने पूछा।

मतलब यह कि आपको और दीदी को जिस हाल में मैंने देखा, उस हिसाब से तो अब मैं आपकी बहन नहीं साली हुई।

मैं उसका मुँह ताक रहा था।

वह बोली- क्यों जीजा जी?

और वह मेरे पास आकर बैठ गई।

मैंने कहा- जैसा तुम समझो... लेकिन जब हम तीनों साथ रहें तब, सबके सामने नहीं।

वह बोली- और जब हम दोनों ही रहें तो?

"मैं समझा नहीं...?"

"जीजा जी... साली के प्रति भी जरा सोचा करो...!" बोलते हुए मेरे गले में उसने अपनी बाँहें डाल दी।

मैं कुछ समझ पाता, इससे पहले ही वह मेरे ओंठों को चूसने लगी।

मुझे भी अच्छा लगने लगा, मैंने कहा- यार, तेरी दीदी देख लेगी।

"मैंने आप दोनों को देखा तो कुछ बोला?"

"नही... लेकिन क्या तुम अपने पति से सन्तुष्ट नहीं हो?"

"जीजू डार्लिंग ! आप मुझे सन्तुष्ट करो ना... छोड़ो ना किसी और को...!"

मैंने भी उसकी नाईटी उतार दी। वह बिल्कुल नंगी हो गई थी क्योंकि उसने अंदर में एक भी कपड़ा नहीं पहना था। लग रहा था कि वह मुझसे चुदवाने के लिए तैयार थी।

मैं उसकी चुची को दबाते हुए ओंठ को चूसने लगा। उसने भी चुदक्कड़ की तरह मेरे कपड़े उतार कर मेरे बदन को खूब चूमा। ऐसा लग रहा था कि काफी दिनों से चुदी नहीं है या पति उसे संतुष्ट नहीं रख रहा है।

वह बदहवास जैसी बके जा रही थी– डार्लिंग... अपना लण्ड हमारी बुर में डालो ना जल्दी से... आह जान, तुम्हारा लण्ड बड़ा प्यारा है। मेरी गाण्ड भी मारना.... जान मेरी बुर अपने लण्ड से फाड़ दो...!

और वह मुझे बिछावन पर पटक कर मेरे ऊपर लेट गई और अपनी बुर मेरे लण्ड पर रगड़ने लगी।

मैं भी उसकी गाण्ड पकड़ कर अपने तरफ जोर जोर से खींच रहा था। फिर उसने अपने हाथ से मेरा लण्ड पकड़ कर अपनी बुर में सटा ली और जोर से धक्का मार कर मेरा पूरा का पूरा लण्ड अपने बुर में घुसवा ली। सात ईंच का मेरा लण्ड उसके बुर को चीरते हुए अन्दर गया तो हम दोनों जन्नत की सैर करने लगे। अब हम दोनों अपना अपने चूतड़ उछाल उछाल कर चोदा चोदी का खेल घंटों तक खेलते रहे। वह पूरी तरह से मदहोश होकर गंदी गंदी बातें बोल रही थी- मेरी जान, आज मेरी बुर का यार मिल गया... अपने लण्ड का सारा रस मेरी बुर को पिला दो... और मेरी बुर के रस से अपना लण्ड को नहला दो... आह जान... आह... आह... फाड़ दो बुर... आह... आह... मेरी गाण्ड भी चोद के फाड़ दो... आह आह... जान चोद... चोद ना जान... आह... आह... हमको चोद चोद के रण्डी बना दो जान... तुम अपनी रखैल बना के रखना जान ... हम तो तुमसे ही चोदवाएँगें... चोदोगे ना जान?

"हाँ जान, तुमको खूब चोदेंगें... तुम मेरी रखैल बनना और मैं तुम्हें रखैल बनाऊँआ अपनी।" मैंने कहा।

इस तरह की बातें करने में बहुत मजा आ रहा था। लगभग एक घंटा चुदवाने के बाद जौली उसी तरह नंगी ही मेरे साथ सो गई। सुबह में उठने के बाद उसने एक बार फिर से चुदवाया मुझसे।

इस तरह एक सप्ताह तक रोज दोनों बहनों को मैंने खूब चोदा। आज भी जब भी मौका मिलता है दोनों को खूब चोदता हूँ। जौली को चोदने में ज्यादा मजा आता है।

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जवानी चार दिनों की-2

Posted: 13 Feb 2013 06:57 AM PST

"लगता है तुम्हें भी ठण्ड लग रही है...!" वो मेरे कान में फुसफुसाई और बिना मुझसे पूछे ही उसने अपनी शाल मुझ पर भी ओढ़ा दी।

मैंने हाथ बढ़ा कर अपना हाथ उसके हाथ पर रखा तो उसने भी मेरा हाथ पकड़ लिया। अब कोई गुंजाइश नहीं बची थी। मैं कुछ देर उसका हाथ सहलाता रहा और फिर मेरा हाथ आगे बढ़ने लगा और उसके गोल गोल मस्त मुलायम ब्रा में कसी हुई चूचियों पर पहुँच गया।

वो कुछ नहीं बोली।

मैं भी ब्रा के ऊपर से ही उसके पहाड़ों की ऊचाईयाँ नापने लगा और हल्के हल्के दबाने लगा। उसके बदन की सरसराहट मुझे महसूस हो रही थी। वो भी कसमसा कर मुझ से लिपटती जा रही थी।

मैंने उसका हाथ पकड़ कर अपने लण्ड पर रख दिया तो पहले तो उसने हाथ ऐसे ही रखे रखा और फिर धीरे धीरे लण्ड को पैंट के ऊपर से ही सहलाने लगी। मैं उसकी चूचियाँ मसल रहा था और वो मेरे कंधे पर सर को रखे मेरे लण्ड को सहलाते हुए मज़ा ले रही थी।

मैंने बस में चारों तरफ देखा, सब सो रहे थे। मैंने मौके का फायदा उठाया और शॉल के अंदर सर करके पायल के होंठों पर अपने होंठ रख दिए। पहले तो वो घबराई पर फिर जब मैंने बताया कि सब सो रहे है तो वो भी चुम्बन में मेरा साथ देने लगी।

रात के लगभग तीन बज चुके थे और हम लुधियाना पहुँच चुके थे। बस में थोड़ी हलचल हुई तो हम भी अलग होकर बैठ गए। अब लगभग एक घंटे भर का सफर ही बाकी था। बस में इस से ज्यादा कुछ हो भी नहीं सकता था। सो बस ऐसे ही शाल में लिपटे हुए सफर का मज़ा ले रहे थे।

मन ही मन प्रोग्राम बना रहा था कि जालंधर पहुँच कर कैसे पायल की चूत को अपने लण्ड की गर्मी से मस्त पानी पानी करना है।

बस जालंधर पहुँच गई थी, बस स्टैंड पर उतर कर पायल ने मुझ से मेरा मोबाइल माँगा। वो विक्रम को फोन करना चाहती थी। पर मैं कुछ देर और पायल के साथ अकेला रहना चाहता था क्यूंकि शादी वाले घर में तो जाते ही पायल रिश्तेदारों की भीड़ में खो जाती।

मौसम में सुबह सुबह की ठंडक और तरावट भरी हुई थी। बस स्टैंड पर ही एक चाय वाले की दुकान खुली ही थी तो हम तीनों दुकान पर पहुँच गए और चाय आर्डर कर दी।

महक फ्रेश होना चाहती थी तो वो बस स्टैंड पर ही बने सुलभ शौचालय में चली गई।

पायल और मैं एक ही बेंच पर बैठे थे।

"पायल... तुमने तो मुझे अपना दीवाना बना दिया है... आई लव यू पायल..."

पायल मेरी आँखों में देखते हुए मुस्कुराई और फिर 'लव यु टू राज... पर !'

उसने अपनी बात अधूरी छोड़ी तो मैंने पूछा– पर क्या....?

"राज... मैं शादीशुदा हूँ... और तुम समझ सकते हो कि एक शादीशुदा को किसी पराये मर्द से प्यार करने का कोई हक नहीं होता।"

"पर तुम मेरे दिल में बस गई हो पायल और अब तुम्हारे बिना रहना मेरे लिए मुश्किल होगा... और फिर भगवान ने भी कुछ सोच कर ही हम दोनों को मिलवाया होगा !"

"तुम बहुत अच्छे हो राज..." वो कहकर मुस्कुराई और फिर से मेरे कंधे से लग गई।

तभी महक और चाय दोनों एक साथ आ गई। पायल सीधे होकर बैठ गई।

पूरे सफर में महक अपने आप में ही मस्त थी। उसने सिर्फ एक बार पायल से मेरे बारे में पूछा था और उसके बाद अब वो मेरे सामने थी। उसने भी शाल ओढ़ रखी थी। वो हमारे सामने बैठ कर चाय पीने लगी।

मैंने तब पहली बार महक को ध्यान से देखा। वो मुँह-हाथ धो कर आई थी और बाल भी ठीक कर लिए थे तो एक चमक सी थी चेहरे पर। मैंने महक को देखा तो महसूस किया कि महक पायल से किसी भी मायने में कम नहीं थी। वो भी बहुत खूबसूरत थी और जवानी की निशानियाँ उसकी भी गजब की थी।

चाय पीने के बाद मैंने विक्रम को फोन किया तो दो-तीन बार में उसने फोन उठाया। जब मैंने उसे बताया कि हम जालंधर बस-स्टैंड पर है तो उसने गाड़ी भेजने का बोल कर फोन काट दिया।

गाड़ी करीब आधे घंटे बाद आई। तब तक पायल मेरे कंधे पर सर रखे बैठी रही। महक चुपचाप बैठी पायल की तरफ देखती रही। मैं थोड़ा हैरान था कि पायल कैसे अपनी बहन के सामने ही एक पराये मर्द के साथ लिपट कर बैठी हुई थी।

जब हम विक्रम के घर पहुँचे तो सुबह के लगभग साढ़े पाँच बज चुके थे और घर के बहुत से लोग जाग चुके थे। विक्रम अभी सो रहा था। वो काम के कारण रात को देर से सोया था। मैंने उसको जाकर उठाया तो वो खुश हो गया और फिर मैं भी वही उसके बेड पर लेट गया और सारी रात की नींद से थकी आँखें कब बंद हो गई पता ही नहीं चला।

जब उठा तो दोपहर का करीब एक बज रहा था। मुझे किसी ने पकड़ कर हिलाया तो मेरी नींद खुली और आँख खोलते ही सामने मेरी नई महबूबा पायल खड़ी थी।

"उठो मेरे राजा जी... शादी में आये हो या नींद पूरी करने...?" कहकर वो हंस पड़ी।

मैं हड़बड़ा कर उठा तो देखा कि कमरे में पायल और मैं ही थे। मैं उठ खड़ा हुआ और एक ही झटके में पायल को अपनी बाहों में लेकर उसके होंठों पर एक जोरदार किस कर दिया।

पायल मुझ से छुड़वा कर अलग हो गई- तुम पागल हो क्या...? यह शादी वाला घर है मिस्टर...!

मैंने उसको एक फ़्लाइंग किस किया और फिर बाथरूम में घुस गया। बाथरूम का दरवाजा बंद करते हुए मैंने देखा पायल वहीं खड़ी मुस्कुरा रही थी।

उसके बाद शादी की रस्में शुरू हो गई और फिर पायल और मैं अकेले नहीं मिल पाए। पायल मेरे आसपास ही मंडरा रही थी और जब वो आँखों से ओझल होती तो मैं भी उसको ढूंढने के लिए बेचैन हो उठता। ऐसे ही सारा दिन निकल गया। हम दोनों शादी की भीड़ में भी एक दूसरे में खोये हुए थे। मैं तो मौके की तलाश में था कि कब मुझे मौका मिले और मैं पायल के मस्त बदन का मज़ा ले सकूँ। पायल को चोदने के लिए मेरा लण्ड बेकरार था।

रात को बारात थी। प्रोग्राम विक्रम के घर से कुछ ही दूरी पर एक मैरिज-पैलेस में था। शाम को करीब सात बजे सब सजधज कर नाचते कूदते घर से निकले। मैं भी मस्ती में था। पंजाबी शादी में शराब-कवाब की कोई कमी नहीं होती। मैंने भी दो-तीन पैग चढ़ा लिए थे और मैं भी पूरी मस्ती में नाच रहा था और अपने दोस्त की शादी को एन्जॉय कर रहा था।

पायल भी दूसरी औरतों के साथ अलग नाच रही थी। भीड़ में मेरी नजर पायल पर ही टिकी हुई थी। बारात कुछ आगे बढ़ी तो आदमी और औरतें सब एक साथ नाचने लगे। बस इसी बीच मुझे भी मौका मिल गया अपनी नई महबूबा संग नाचने का। पायल और मैं दोनों एक दूसरे का हाथ हाथ में लेकर नाचने लगे।

"पायल... इस ड्रेस में तो क़यामत लग रही हो।"

"तुम भी बहुत हेंडसम लग रहे हो... देखो तो शादी में कितनी लड़कियों की नजर सिर्फ तुम पर ही है।" कहकर वो खिलखिला कर हंस पड़ी।

बारात अपने निर्धारित स्थान पर पहुँच गई थी। फिर गेट पर रिबन का प्रोग्राम हुआ और सबने खूब मस्ती की। अंदर जाकर डी.जे. पर खूब मस्ती हुई। खूब दिल खोल कर नाचे और पैसे लुटाए। थक हार कर फिर खाना खाने लगे। विक्रम फेरे लेने के लिए चला गया और मैं पायल संग खाना खाने चला गया।

"पायल... तुम्हें चूमने का बहुत दिल कर रहा है... प्लीज एक किस दो ना..!"

"तुम पागल हो... सब लोगों के बीच में किस...? मिस्टर होश करो..."

तभी मुझे याद आया कि विक्रम की गाड़ी की चाबी मेरे पास है। मैंने पायल को बाहर गेट पर आने को कहा और खुद गाड़ी निकालने चल पड़ा।

जब पार्किंग से गाड़ी निकल कर बाहर आया तो देखा पायल गेट पर ही खड़ी थी। मैंने उसको गाड़ी में बुलाया तो वो आकर बैठ गई और मैंने भी गाड़ी सड़क पर दौड़ा दी।

"राज... सब लोग क्या सोचेंगे यार... अगर किसी को पता लग गया तो कि मैं तुम्हारे साथ ऐसे अकेली गाड़ी में घूम रही हूँ तो...?"

"पायल, यह रात फिर नहीं मिलेगी मेरी जान... बस अब कुछ ना कहो !"

"पर हम जा कहाँ रहे हैं?"

"देखते हैं कोई तो जगह मिल ही जायेगी दो दीवानों को प्यार करने के लिए !"

मैं गाड़ी हाइवे पर ले आया और सामने ही मुझे एक गेस्ट हाउस नजर आया। रात के दो बज रहे थे। मैंने गाड़ी रोकी तो चौकीदार दौड़ कर आया। मैंने उसको पचास का नोट दिया और कमरे के बारे में पूछा तो उसने अंदर आने को कहा।

अंदर जाकर बोला- सर... कमरा तो कोई खाली नहीं है।

"तो साले तूने बाहर क्यों नहीं बताया...?"

"सर वो ऐसा है कि एक कमरा है तो पर वो गेस्ट हाउस के मालिक का है... अगर आप लोग सुबह पाँच बजे से पहले खाली कर दो तो वो कमरा मैं आप लोगो के लिए खोल सकता हूँ पर पाँच सौ रुपये लगेंगे।"

मैंने बिना देर किये गाँधी छाप पाँच सौ का नोट निकल कर उसके हाथ पर रखा और उसने बिना देर किये कमरा खोल दिया। पायल चुपचाप यह सब देख रही थी पर बोल कुछ नहीं रही थी।

कमरा शानदार था। आखिर गेस्ट हाउस के मालिक का था। बिल्कुल साफ़ सुथरा। एक साइड में सोफा और मेज लगी थी और दूसरी साइड में एक बड़े वाला सिंगल बेड था। पर हमें कौन सा यहाँ सोना था।

चौकीदार के जाते ही मैंने दरवाजा अंदर से बंद किया और पकड़ कर पायल को अपनी बाहों में भर लिया।

"बहुत बेताब हो मुझे चोदने के लिए...?"

पायल के मुख से यह 'चोदना' शब्द सुन एक पल को तो मैं हैरान रह गया लेकिन...

कहानी जारी रहेगी।

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डौली और जौली चुदाई की -1

Posted: 13 Feb 2013 06:09 AM PST

मैं हरी पटना से, मेरी उम्र 35 वर्ष है। मैं एक दूर के चाचा के लड़के के साथ बिजनेस करता हूँ जो हमारे घर के बगल में ही रहते हैं।इस कारण चाचा के घर मेरा रोज का आना जाना लगा रहता है। चाचा की दो बेटियाँ हैं, दोनों की शादी हो चुकी है। सबसे बड़ी बेटी ही है जिसका नाम डौली है। डौली मुझसे तीन साल की छोटी है। छोटी बेटी का नाम जौली है जो अपने ससुराल में ही रहती है और वह मुझसे पाँच साल छोटी है।

डौली का अपने पति के साथ कुछ लड़ाई हो जाने के कारण अब अपने मायके में ही रहना हो रहा है। मैं और डौली शुरू से दोस्तों की तरह रहते थे। दोनों ही एक दूसरे का दु:ख-सुख का ख्याल रखते थे और यह अभी तक बरकरार है।

उसके पति से अलग होने के कारण उसके प्रति मैं थोड़ा ज्यादा ही ध्यान रखता था। इस कारण हम लोगों में कुछ और नजदीकियाँ बढ़ गई। उसकी आँखों में वासना साफ दिखती थी लेकिन कुछ बोलने से वह डरती थी, लेकिन उसकी बोली एवं मेरे सामने रहने के ढंग में बहुत परिवर्तन दिखता था। अब मेरा भी मन उसके प्रति डोलने लगा था लेकिन एक डर हमारे मन में भी था, यानि वासना की आग दोनों तरफ बराबर लगी थी लेकिन दोनों एक दूसरे से कहने में डर रहे थे।

वह जब भी अब मेरे सामने आती तो अपना दुपट्टा नहीं ओढ़ती थी। उसके वक्ष का उभार देखकर हमारा मन करता कि अभी उसके चूचों को खूब मसलने लगूँ। वह जानबूझ कर हमारे सामने किसी बहाने झुक कर बात करती। उसके अन्दर का माल देखकर मेरा लण्ड लोहे की तरह कड़ा हो जाता, लगता कि अभी पटक कर चोद दूँ लेकिन डर कर कुछ नहीं कर पाता था।

एक बार किसी बात पर हम दोनों में शर्त लगी।

डौली बोली- अगर तुम शर्त हार गए तो मुझे कहीं घुमाने ले जाओगे।

मैंने कहा– ठीक है। लेकिन मैं जीत गया तो?

डौली बोली– तुम जो चाहो।

मैंने कहा– सोच लो।

डौली बोली- मैंने सोच लिया। तुम जो बोलोगे मैं वही करूँगी। वैसे तुम क्या चाहते हो?

मैंने बोला– नाराज तो नहीं होगी?

डौली– नहीं।

मैंने कहा- तुम्हारे ओंठों को मैं काटूँगा।

डौली- धत्त ! कोई देख लेगा तो हम दोनों बदनाम हो जाएँगे।

मैंने कहा- घर पर तो कोई है ही नहीं, तो देखेगा कौन?

वह बोली- ठीक है।

और वह जानबूझ कर शर्त हार गई। मैंने उसे अपने बाहों में लेकर उसके ओंठ को अपने दांतों से हल्का सा दबाया। वह मदहोश होने लगी। फिर मैं उसके ओंठों को चूसने लगा, वह भी मेरा साथ दे रही थी।

धीरे धीरे वह भी हमारे ओंठों को पागल की तरह चूसने लगी। हम दोनों एक दूसरे को काफी देर तक चूसते रहे। एक दूसरे की जीभ भी एक दूसरे के मुँह में डालते रहे। फिर मैं अपने दोनों हाथों से उसकी चूची को दबाने लगा। उसने भी अपनी चूचियाँ खूब मलवाई।

फिर मैंने उससे कहा- डौली, तुम बहुत सेक्सी हो। तुम्हारे ओंठ बहुत रसीले हैं।

डौली बोली- तुम भी तो बहुत सेक्सी हो। तुम्हारे ओंठ भी बहुत रसीले हैं।

मैंने कहा- तुम्हारी चूची बहुत ही मस्त हैं।

वह शरमा गई।

मैंने कहा- डौली क्या तुम मुझसे चुदवाओगी?

इस पर उसने मना कर दिया, बोली- अभी नहीं हरी, बाद में। तुम मेरे साथ ऊपर-ऊपर कुछ भी कर सकते हो। हमसे कुछ भी बात कर सकते हो।

मैं भी मान गया। लेकिन उस दिन के बाद हम दोनों गन्दी गन्दी बात के अलावा एक दूसरे के खूब ओंठ चूसना और वह अपने चूचे मुझसे खूब मलवाने लगी। लेकिन इतना से मन भरता नहीं था। कल्पना में मैं उसे खूब चोदता और उसे बताता भी था।

वह भी खूब मजा लेकर सुनती थी।

लेकिन भगवान ने हमारी एक दिन सुन ली। मेरी बीवी एक महीने से ससुराल में रह रही है क्योंकि उसे बच्चा होने वाला है। इधर डौली का भाई एवम् उसके माँ-पापा एक रिश्तेदार के यहाँ शादी में एक सप्ताह के लिए रांची चले गए, यह कह कर कि डौली का ध्यान रखना और रात में यहीं आकर सो जाना।

मैंने भी झट से हाँ कह दिया और रात होने की इंतजार करने लगा। अपने घर पर खाना खा कर रात नौ बजे डौली के पास पहुँचा। दरवाजा ठीक से बंद करने के बाद पहले उसे अपने बांहों में भर लिया। कुछ देर इधर उधर की बातें करने के बाद हम दोनों एक ही बिस्तर पर लेट गए।

फिर वह बोली- मैं आती हूँ पेशाब करके और कपड़े बदल कर।

दस मिनट में वह एक नाईटी पहन कर आई और मेरे ऊपर लेटकर मेरे ओंठों को चूसने लगी। कभी मैं उसके ऊपर तो कभी वो मेरे ऊपर हो कर एक दूसरे के ओंठ चूस रहे थे। एक दूसरे के ऊपर नीचे होने से उसकी नाईटी कमर के ऊपर हो गई थी।

मैंने कहा- अपनी नाईटी उतार दो।

वह अपनी नाईटी उतारते हुए बोली- तु्म भी अपने कपड़े उतार दो।

अब वह लाल ब्रा और लाल पैंटी में गजब की सेक्सी लग रही थी। मैं भी केवल अंडरवियर में उसके ऊपर चढ़ कर उसकी चूचियों को खूब मल रहा था। फिर मैंने उसकी ब्रा को उससे अलग किया और अपना हाथ उसकी पैंटी में डाल कर उससे कहा- आज मुझसे चुदवाओगी ना?

उसने शरमा कर अपना मुँह मेरे सीने में छुपा लिया।

अब मुझसे बरदाश्त नहीं हो रहा था, मैंने उसकी पैंटी भी उतार दी और अपना अंडरवियर भी। अब हम दोनों नंगे थे। मैंने उसे बिछावन पर लेटा कर उसके दोनों पैरों को फैला कर अपने दोनों अंगुठों से उसकी बुर को फैला कर अपना लंड उसमें रगड़ने लगा।

वह पागल की तरह सिसकारने लगी- आह मेरी जान ! डाल दो ना अपना लण्ड मेरी बुर में... बहुत तड़पाते हो। आह... आह...

मैंने भी उसके ऊपर झुक कर दोनों हाथों से उसके उरोजों को मलते हुए उसके ओंठों को चूसते हुए कहा- मेरी रानी, तुमने भी तो मुझे बहुत तड़पाया है।

"....अब डालो ना जान.... मेरे राजा.... मेरे चोदने वाले जान !"

"....हाँ मेरी जान.... मेरी रानी ! मेरी जान !"

फिर मैं अपना लंड उसकी बुर में घुसाने लगा। वह भी अपना कमर को ऊपर नीचे कर के चुदवाने लगी। मैंने भी उसकी बुर की खूबचुदाई की।

लगभग आधा घंटे में मेरे लंड से गर्म-गर्म रस से उसकी बुर भर गई। उस रात हम लोगों ने दो बार चोदा-चोदी का खेल खेला।

सुबह उठ कर मैं अपने घर आ गया।

कहानी जारी रहेगी।

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शिखा की चूत मारी

Posted: 13 Feb 2013 05:43 AM PST

मेरा नाम अंकित है, मैं अपनी पहली कहानी लिखने जा रहा हूँ जो एक तरह से मुझे मेरे जीवन की दुर्घटना लगती है।

बात उन दिनों की है जब मैंने अपनी स्नातिकी की परीक्षा दी थी, नौकरी की तलाश में था और मैं ज्यादातर समय घर पर ही बोर होता था। मैं अपने घर में अकेला रहता था, पापा और मम्मी जॉब पर चले जाते थे और मैं घर में कंप्यूटर पर ब्लू फिल्में देखता था और हमेशा इस तलाश में रहता था कि कहीं से कोई लड़की पटा ली जाये जिससे मेरी सेक्स की जरुरत पूरी हो सके।

एक दिन घर पर पापा के पास चाचा जी का फ़ोन आया कि उनकी बेटी शिखा दिल्ली आ रही है मल्टीमीडिया का कोर्स करने के लिए, आप अगर उसको अपने पास रख लें तो उसको दिल्ली में कोई परेशानी नहीं होगी, कुछ दिनों बाद वो वहाँ तो खुद ही कहीं न कहीं घर ढूंढ लेगी।

इस पर मेरे पापा ने उन्हें कह दिया- वो जब तक चाहे हमारे यहाँ रह सकती है, हमारा घर भी बड़ा है, हमें कोई परेशानी नहीं है।

एक हफ्ते बाद मैं उसे लेने नई दिल्ली स्टेशन गया जहाँ मैं उसे देख कर दंग रह गया। गाँव की होने के बावजूद वो किसी भी शहर की लड़की को पीछे छोड़ रही थी, उसका फ़ीगर मुझे किसी मॉडल से कम नहीं लग रहा था और उसकी लम्बाई भी पांच फुट से ज्यादा थी। पर मैंने अपने आप को संभाला क्योंकि वो थी तो मेरी चचेरी बहन ही !

उसके बाद मैंने शिखा का सामान उठया और ऑटो लेकर हम घर आ गए। पापा-मम्मी से मिलने के बाद वो थकी होने के कारण फ्रेश होकर आराम करने लगी।

फिर शाम को खाने के समय पर उसने खाना बनाने में मम्मी की मदद भी की क्योंकि गाँव की लड़कियाँ घर वालों का काम में ज्यादा हाथ बंटाती हैं।

फिर खाना खाने के बाद पापा ने कहा- अंकित, शिखा का सामान ऊपर अपने साथ वाले कमरे में रख दो, यह वहीं पर रहेगी। और शिखा अगर तुम्हें कोई परेशानी हो तो हमसे बतलाना, यह तुम्हारा अपना ही घर है और कहीं बाहर जाना हो तो अंकित को अपने साथ ले जाना क्योंकि यहाँ अभी तुम नई हो, यह वैसे भी खाली बैठा है।

इस पर वो हंसने लगी।

मैं उसका सामान ऊपर ले गया और उसे उसका कमरा दिखाया जिसमें सिर्फ एक पलंग और कूलर के अलावा कुछ भी नहीं था।

मैंने उससे पूछा- तुम नीचे हंसी क्यों थी?

तो उसने कहा- जब बड़े पापा ने तुम्हें मेरा बॉडीगार्ड बनाया इसलिए !

इस पर मैं भी हंस पड़ा, पर मैंने उसे बोल ही दिया कि दिल्ली में लड़कियाँ सुरक्षित नहीं हैं, लड़के उन्हें छेड़ने की कोशिश करते रहते हैं।

इस बात पर उसने कहा- गाँव में कई लड़कों को मैंने ठीक कर दिया है।

और वो मुझसे थोड़ी खुलने लगी।

मैंने पूछा- ऐसा क्या कर दिया उन लड़कों ने तुम्हारे साथ और तुमने उनके साथ?

वो बोली- कुछ नहीं, रहने दो उन बातों को और यह बताओ कि मैं टीवी कैसे देखूँगी? सोते वक्त मुझे टीवी देखने की आदत है।

हमारे घर में दो टीवी थे एक नीचे पापा के कमरे में और एक मेरे कमरे में ! तो मैंने उसे कह दिया- या तो मेरे कमरे में टीवी देखने आ जाया करो या टीवी देखे बिना सोने की आदत डाल लो !

और फिर गुडनाईट कह कर मैं सोने चला गया और उसके बारे में सोचते हुए मुझे कब नींद आ गई पता भी नहीं चला।

अगले दिन एक अच्छे से इंस्टिट्यूट का पता लगा कर मैंने उसका दाखिला करा दिया और उसके बाद उसे दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर घुमाने ले गया जहाँ हमने काफी मजे किए। उसे वो जगह बहुत अच्छी लगी।

फिर शाम तक हम घर पर थे और मम्मी के आने से पहले उसने खाना भी बना लिया जिससे मम्मी को भी घर के काम से आराम मिल गया और अब वो रोज शाम का खाना बनाती थी हम सबके लिए।

इस बीच मेरी भी एक पार्ट टाइम जॉब लग गई और मैं अपनी जॉब पर ध्यान देने लगा। इस तरह दो महीने बीत गए और मैं और शिखा काफी अच्छे दोस्त बन गए थे जो सारी बाते एक दूसरे से शेयर करते थे पर एक लिमिट में।

एक दिन मैंने शिखा को एक लड़के के साथ बाइक पर देखा और मुझे शिखा के दोस्तों से पता चला कि क्लास के बाद वो उस लड़के के साथ घूमने भी जाती है।

फिर मैंने अपनी जॉब का टाइम बदलवा लिया और उस समय पर मैं घर पर होता था जब शिखा क्लास खत्म करके घर पर आती थी।

जब मैंने उसके लेट आने की वजह पूछी तो उसने एक्स्ट्रा क्लास का बहाना बना दिया पर मुझे उस लड़के के बारे में कुछ नहीं बताया जिसके साथ मैंने उसे देखा था।

मैंने उसे कुछ नहीं कहा।

एक दिन मैं जब सोफे पर बैठ कर अखबार पढ़ रहा था और शिखा घर में झाड़ू लगा रही थी तभी मैंने उसकी चूचियों के बीच में एक पैकेट सा देखा जो नीचे गिर गया पर उसे पता नहीं चला। वो मैंने उठा लिया वो एक कण्डोम का पैक था।

अब मैं सारी बात समझ गया था।

क्लास के लिए जाते समय वो जब उसे ढूंढने लगी तो मैंने पूछा- क्या कुछ ग़ुम हो गया है?

तो उसने जवाब नहीं दिया।

इस पर मैंने वो कण्डोम अपनी जेब से निकाल कर मेज पर रख दिया और उसने वो उठा लिया।

जब मैंने उससे इसके बारे में पूछा तो वो मुझ पर बरस पड़ी और मुझे धमकी देने लगी कि इस बारे में मैंने अगर किसी को कुछ बताया तो वो मुझे फंसा देगी यह कह कर कि मैं उसके साथ जबरदस्ती करता हूँ, मेरे मना करने पर अंकित मुझे बदनाम कर रहा है और मुझे सब शरीफ समझते है इसलिए सब मेरी बात को ही सच मानेंगे।

वक़्त की नजाकत समझते हुए मैंने उसे कुछ नहीं कहा और जाते हुए मुझे वो यह भी बोल गई कि मेरे दोस्तों से तुमने जिस लड़के के बारे में सुना है वो मेरा बॉयफ़्रेन्ड है और आज मैं उसके घर जा रही हूँ उसके साथ सेक्स करने ! बड़े दिनों बाद आज मुझे मौका मिला है जो मैं खाली नहीं जाने देना चाहती।

शाम को वो जब घर आई तो थोड़ा लंगड़ा कर चल रही थी क्योंकि पहली बार सेक्स करने के बाद लड़की को चलने में थोड़ी तकलीफ होती है ऐसा मैंने सुना था।

मैंने उससे पूछा- क्या हुआ?

तो वो अपने कमरे में चली गई बिना कुछ कहे और शाम को खाना भी नहीं खाया। उसके बाद मैं अपने कमरे में सोने चला गया पर मुझे नींद नहीं आ रही थी, मैं उसी के बारे में सोच रहा था कि किस तरह उसने सेक्स किया होगा, उसे कितना मजा आया होगा और अब मैं भी सब कुछ भूल के उसके साथ सेक्स करना चाहता था, मैं बस उसे चोदना चाहता था।

तभी मेरे कमरे का दरवाज़ खुला, सामने शिखा खड़ी थी अपनी नाईटड्रेस में !

वो अन्दर आ गई और दरवाज़ा बन्द कर दिया।

इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता वो मेरे लगे लग गई और अंकित सॉरी कह कर मुझे चूमने लगी।

मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि जो लड़की दिन में मुझे फ़ंसाने की बात कर रही थी, वो रात को मेरे कमरे में मुझे चूमे जा रही है।

शिखा ने कहा- तुम जानना चाहता हो ना कि मेरे बॉयफ़्रेन्ड के घर पर क्या हुआ था? पहले वो मेरे ओंठों की चूमता रहा और मैं उसके !

वो ऐसा ही मेरे साथ करने लगी।

फिर उसने कहा- अंकित, फिर उसने मेरे चूचे दबाने चालू किये ! उसके बाद मेरा कमीज उतार कर मेरी ब्रा के ऊपर से मेरे चूचे दबाए, फ़िर मेरी ब्रा खोल दी।

और मैं भी उसी तरह किए जा रहा था जैसा शिखा बोल रही थी।

उसके चूचों का आकार देख कर मेरा लण्ड मेरी पैंट फाड़ने लगा।

फिर उसने कहा- इतने में दरवाजे की घण्टी बज गई और उसकी मम्मी आ गई।

फिर मैं अपने कपड़े समेट कर वहाँ से भागने लगी जिससे मेरी टांग में मेज से चोट लग गई !

और यह कहते हुए उसने खुद ही नीचे के कपड़े भी उतार दिए और अपने टांग पर लगी चोट मुझे दिखाने लगी। अब वो मेरे सामने सिर्फ पैंटी में थी और मैं पूरे कपड़ों में !

फिर मैंने उससे कहा- आज मैं तुम्हारे और अपने दोनों के जिस्म की भूख मिटा दूँगा। पर यह काम थोड़ा पहले भी हो सकता था अगर तुम मेरा साथ देती तो ! चलो देर आये दुरुस्त आये !

उसने मेरे सारे कपड़े उतार दिए और मेरे लौड़े को हिलाने लगी। मैंने उसे मुँह में लेने को कहा तो उसने मना कर दिया पर मैंने बुरा नहीं माना और उसे उठा कर पलंग पर ले गया। मेरा लण्ड उसकी गांड पर रगड़ खा रहा था।

पलंग पर मैं उसके चूचों को चूसने लगा और जोर जोर से अपने हाथों से दबाने लगा। उसके चूचे लाल हो गए थे और उसे दर्द होने लगा जिस पर वो बोली- अंकित, तुम सुबह का बदला तो नहीं ले रहे मुझसे? मैं पहले ही सॉरी बोल चुकी हूँ तुम्हें !

मैंने कहा- ऐसी कोई बात नहीं है, बस पहली बार इतना सुंदर सामान मिला है इसलिए कण्ट्रोल नहीं कर पा रहा हूँ !

और मैं उसकी चूत पर अपना लण्ड रगड़ने लगा और एक हाथ से उसकी चूची मसलने लगा। मैंने भी ब्लू फिल्मों में चूत चाटते देखा था जिससे लड़की को जोश चढ़ता है पर जानबूझ कर मैंने भी उसकी चूत नहीं चाटी क्योंकि उसने मेरा लण्ड चाटने से मना किया था।

फिर मैं उसकी टांगों के बीच आ गया और अपना लण्ड उसकी बिना बालों वाली चूत के छेद पर रख दिया और उसको चूमने लगा।

पर वो तो अन्दर डलवाने के लिए तड़प रही थी और अपने चूतड़ों और चूत को ऊपर उठा रही थी कि मेरा लण्ड उसमें घुस जाये पर मैं उसे और ऊपर कर ले रहा था जिससे उसकी चूत और मेरा लण्ड के बीच दूरी बन जा रही थी। मैं उससे पिछले दो महीनों का बदला ले रहा था।

वो रोने लगी- प्लीज़, इसे अंदर डाल दो !

मैंने इस पर एक शर्त रखी कि उसे मेरा लण्ड अपने मुँह में लेना होगा।

वो मान गई पर बोली- इस अंदर डालने के बाद दूसरी बार करेंगे !

तब मैंने कहा- जान पहले पहली बार तो झेल लो !

और अपने लण्ड पर उसका दिया हुआ कंडोम चढ़ा कर उसकी चूत में घुसाने लगा पर लण्ड अभी थोड़ा सा ही अन्दर गया था कि उसने मुझे अपने ऊपर से धकेल दिया और बोली- दर्द हो रहा है ! मुझे नहीं करवाना यह सब !

फिर मैंने उसे समझाया- पहली बार थोड़ा दर्द होता है, उसके बाद कुछ नहीं होगा। और कभी ना कभी तो यह करना ही है तो आज ही क्यों नहीं !

और मैंने कहा- अब मैं इससे भी धीरे करूँगा, तुम्हें कोई दर्द नहीं होगा।

पर मेरे मन में कुछ और ही था और मैं उसको लिटा कर उसकी टांगों के बीच में आ गया। वो पहले वाला कण्डोम फट गया था, उसने मुझे दूसरा दिया पर मैंने उसे यह कहकर मना कर दिया कि इसे लगाने से ज्यादा दर्द होता है, और कुछ होगा तो मैं देख लूँगा।

और वो बिना कण्डोम के ही मेरा लण्ड लेने को तैयार हो गई।

मैंने अपनी टाँगें उसकी टांगों में लपेट ली, अपने हाथों से उसके हाथ पकड़ लिए और उसके ओंठों को चूसने लगा और अपने लण्ड उसकी चूत के छेद पर लाकर एक बारी में पूरा अन्दर दे दिया।

उसकी चूत बिल्कुल गीली हो चुकी थी जिसका मुझे थोड़ा फ़ायदा हो गया और मेरा पूरा लण्ड उसकी चूत के अन्दर समा चुका था। इस बीच शिखा ने मुझसे छुटने की काफी कोशिश की पर मेरी पकड़ के आगे सब बेकार था, मैंने उसके ओंठ चूस कर उसे चिल्लाने का कोई मौका भी नहीं दिया, थोड़ी देर तक उसके ऊपर लेटा रहा और पूछा- मजा आ रहा है?

पर उसने कहा- छोड़ दो, मुझे बहुत दर्द हो रहा है !

पर मैंने कहा- अब दर्द नहीं, मज़े की बारी है ! थोड़ी देर और रुक जा !

और मैं धीरे धीरे झटके मारने लगा। थोड़ी देर बाद वो भी सामान्य हो गई और और नीचे से उछल-उछल कर मेरा साथ देने लगी।

करीब बीस मिनट बाद हम दोनों झड़ गए और मैंने अपना लण्ड उसकी चूत में खाली कर दिया।

उसके बाद उसने मेरा लण्ड भी चूसा और मैंने उसकी चूत भी चाटी और रात में चार बार सेक्स किया।

अगले दिन मैंने उसे दवाई लाकर दे दी जिससे बच्चा ठहरने का डर ना रहे !

और इस तरह उसके साथ हर रोज या एक दो दिन छोड़ कर मैं सेक्स करने लगा और इस बीच उसकी गलती की वजह से मैं दो बार उसका बच्चा भी गिरवा चुका हूँ।

उसका कोर्स ख़त्म होने के बाद अपने गाँव जाने की जगह उसने यहीं पर नौकरी शुरू कर दी है और मेरे साथ ही रहना चाहती है और मुझे कई बार घर से भाग चलने को कहती है पर मैं ऐसा नहीं कर सकता, मैं घर में अकेला हूँ, मैं अपनी मम्मी-पापा को छोड़ कर नहीं जा सकता और इससे पीछा छुड़ाना चाहता हूँ।

मैं यह करके रहूँगा, ये मेरे जैसे शातिर दिमाग के लिए कोई बड़ी बात नहीं है।

आपको मेरी ज़िन्दगी की घटना कैसी लगी, मेल करके बताएँ !

मुझे आपकी मेल का इंतज़ार रहेगा।

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जवानी चार दिनों की-1

Posted: 13 Feb 2013 05:42 AM PST

दोस्तो, मैं राज एक बार फिर से आपके पास अपनी मस्ती की दास्ताँ लेकर आया हूँ। कहानी ज्यादा पुरानी नहीं है। जैसे भगवान पहले छप्पर फाड़ कर देता था इस बार भी दिया। कहानी की शुरुआत तब हुई जब मैं अपने एक दोस्त की शादी में जालंधर (पँजाब) गया था।

तो दोस्तों हुआ कुछ यूँ था...

22 नवम्बर की रात को मैंने दिल्ली से जालंधर जाने के लिए बस पकड़ी। रात का सफर थोड़ा सुविधाजनक भी था क्यूंकि लम्बा सफर था। दिल्ली बस स्टैंड से निकलने के बाद करीब आधे घंटे में बस करनाल बाईपास पर पहुँची तो कुछ सवारियाँ बस में चढ़ी। मैंने देखा की उन सवारियों में दो महिलायें थी। मेरे बगल में एक सीट खाली थी तो मन में सोचा कि इन में से अगर एक मेरे पास बैठ जाए तो सफर का आनन्द आ जाए।

भगवान ने मेरी मुराद पूरी की और वो करीब पच्चीस छब्बीस साल की गदराए बदन की मालकिन मेरे पास आकर बैठ गई। मैं तो उसको देखता ही रह गया। क्या फुरसत से घड़ा था ऊपर वाले ने उसको। एक एक अंग जैसे सांचे में ढाल कर चिपकाया गया था। सबसे पहले नजर चेहरे पर गई। एकदम गोरा रंग, बड़ी बड़ी गोल गोल आँखें, सुतवाँ नाक और गुलाब की पंखुड़ियों जैसे गुलाबी गुलाबी होंठ जो उसकी खूबसूरती को चार चार चंद लगा रहे थे।

नजर जैसे ही थोड़ा और नीचे गई तो दिल धाड़-धाड़ बजने लगा। दिल की धड़कने तेज हो गई जब मेरी नजर उस हसीना की छाती की शोभा बढ़ाती उसकी चूचियों पर गई। आप तो जानते ही हैं कि मैंने पहले ही बहुत सी चू्तों और चूतवालियों को चखा हुआ है पर यकीनन यह उन सबसे ऊपर के दर्जे की खूबसूरत क़यामत थी।

अभी मैं उसकी खूबसूरती में ही खोया हुआ था कि टिकट कंडेक्टर टिकट काटने आ गया। मेरे अंदर यह लालसा जाग गई कि देखूँ यह क़यामत कब तक मेरे सानिध्य को सुशोभित करेगी। और जब उसने जालंधर के दो टिकेट माँगे तो मैं ऊपर वाले की मेहरबानी पर नतमस्तक हो गया।

सफर शुरू हुआ, बस अपनी गति से चल रही थी पर मेरे दिल की धड़कन उस से कहीं ज्यादा तेज चल रही थी। मैं तो उस हसीना की खूबसूरती में खोया हुआ था, तभी वो मुझ से मुखातिब होकर बोली– आप कहाँ तक जा रहे हैं?

"मैं जालंधर तक जा रहा हूँ !" मैंने जवाब दिया।

फिर तो जैसे बातचीत का सिलसिला चल निकला। बातों ही बातों में उसने बताया कि वो भी जालंधर एक शादी में शामिल होने जा रही है। बातों बातों में कब पानीपत आ गया पता ही नहीं चला। पानीपत से बस चली तो रात के करीब ग्यारह बज चुके थे। तभी उसने मुझसे मेरा मोबाइल माँगा क्यूंकि उसके मोबाइल की बैटरी खत्म हो गई थी। उसने एक नम्बर मिला कर बात की और बताया कि वो सुबह चार बजे तक पहुँच जाएगी।

उसने मुझे मेरा फोन वापिस किया और बोली– आपका नाम राज है?

"हाँ.. आपको कैसे पता?"

"क्या आप विक्रम की शादी में जा रहे हैं?"

"हाँ.. पर आपको यह सब कैसे पता?"

मैं हैरान था कि तभी मैंने फोन में डायल किया हुआ नम्बर देखा तो उस हसीना ने विक्रम का ही नम्बर डायल किया हुआ था। मुझे सारा माजरा समझ में आ गया था।

"आप विक्रम की क्या लगती हैं?"

"विक्रम मेरे मामा जी का बेटा है" उसने जवाब दिया।

"ओह... तो आप विक्रम के बुआ की बेटी महक हैं?"

"नहीं... महक मेरी छोटी बहन का नाम है.. मैं पायल हूँ... महक वो आगे बैठी है।" उसने अपना परिचय दिया।

फिर काफी देर तक हम बातें करते रहे और करीब साढ़े बारह बजे बस पिपली बस स्टैंड पर रुकी और ड्राईवर चाय पीने चला गया। पायल उठी और मुझे बोली- प्लीज, मेरे साथ चलो, मुझे टॉयलेट जाना है।

बाहर अँधेरा था तो मैं उसके साथ चल दिया। बाथरूम की तरफ गए तो देखा उस पर ताला लटका हुआ था। मैंने उसे कहा कि वो उधर अँधेरे में जाकर फ्रेश हो ले।

पहले तो वो डर के मारे मना करती रही पर फिर वो मुझ से थोड़ी दूरी पर ही अपनी सलवार और पेंटी नीचे करके पेशाब करने लगी। हल्की हल्की लाइट में उसके गोरे गोरे कूल्हे संगमरमर की तरह चमक उठे थे जिन्हें मैं देखता ही रह गया।

पेशाब करने के बाद मैंने पानी की बोतल से उसके हाथ धुलवाए। उसकी गोरी गोरी गांड देख कर मेरे लण्ड में भी तनाव आ गया था और मुझे भी पेशाब का जोर हो गया था सो मैंने उसे बस में जाने को कहा और ठीक उसी जगह पर जाकर लण्ड बाहर निकाल कर पेशाब करने लगा। जब पेशाब करके वापिस मुड़ा तो देखा वो वहीं पर खड़ी थी।

"गई नहीं अभी तक...?"

"नहीं... बस तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही थी।"

"क्यों...?"

"तुमने भी तो मेरा इंतज़ार किया था...!"

मैंने उसकी आँखों में देखा तो वो हल्के से मुस्कुराई। उसकी मुस्कुराहट देख कर मैं भी मुस्कुराए बिना ना रह सका।

फिर साथ साथ चलते चलते हम दोनों चाय के स्टाल पर गए और तीन चाय लेकर बस में चढ़ गए। बस में भीड़ अभी भी कम नहीं हुई थी। अक्सर देर रात वाली बसों में लम्बी दूरी की सवारियाँ ही होती हैं। करीब बीस मिनट के बाद बस एक बार फिर चल पड़ी।

कुछ दूर चलने के बाद पायल नींद की झपकी लेने लगी और बार बार आगे की तरफ गिर रही थी। मैंने थोड़ा साहस दिखाते हुए उसका सर पकड़ कर अपने कंधे पर रख लिया। उसने एक बार आँख खोल कर मेरी तरफ देखा और फिर मुस्कुरा कर आँखें बंद कर ली। बस अपनी गति से चलती जा रही थी। बाहर का मौसम ठंडा हो गया था पर पायल का स्पर्श मेरे अंदर गर्मी भरता जा रहा था। मैंने एक बार महक की तरफ देखा। वो भी नींद के आगोश में जा चुकी थी। लगभग आधी से ज्यादा सवारियाँ अब तक या तो सो चुकी थी या फिर नींद की झपकियाँ लेते हुए झूल रही थी।

शायद मैं ही अकेला ऐसा था जिसकी आँखों से नींद कोसों दूर थी।

मैंने पायल के नींद में खोये मासूम से चेहरे को देखा तो मेरा मन हुआ कि मैं अभी एक प्यारा सा चुम्बन दे दूँ, पर जल्दबाजी ठीक नहीं थी। फिर भी मैंने थोड़ा साहस और किया और अपना हाथ पायल के कंधे पर रख कर उसको थोड़ा सा अपनी ओर खींचा तो पायल भी मुझ से लिपटती चली गई।

कुछ देर बाद बस अम्बाला रुकी। पायल ने आँखें खोली और बाहर देखने लगी पर मैंने देखा कि उसने मेरा हाथ नहीं हटाया था। बस दुबारा चली तो उसने फिर से अपना सर मेरे कंधे पर रख लिया और आँखें बंद कर ली पर फिर अचानक उठी और बोली- राज, मुझे ठण्ड लग रही है।

उसके बैग में शाल थी तो उसने वो निकाल कर अपने ऊपर ओढ़ ली और फिर से मेरे कंधे पर सर रख कर बैठ गई।

"राज... तुम्हें नींद नहीं आ रही है...?"

"आप जैसी खूबसूरत और हसीन लड़की अगर बगल में हो तो किस कमबख्त को नींद आएगी।"

उसने एक मुक्का मारा और मेरे कान के पास फुसफुसाते हुए बोली,"शैतान !"

मेरी बात सुन कर उसके होंठों पर जो मुस्कान आई उसने मेरे हौंसले को कई गुणा बढ़ा दिया। मामला लगभग पट चुका था और अब तो मुझे जल्दी से जालंधर पहुँचने का इंतज़ार था। मेरे हाथों का दबाव अब पायल के कंधे पर थोड़ा और ज्यादा बढ़ गया था और कुछ ही देर में मेरा हाथ नीचे के तरफ सरकने लगा जिसे शायद पायल ने भी महसूस कर लिया था।

"लगता है तुम्हे भी ठण्ड लग रही है...!" वो मेरे कान में फुसफुसाई और बिना मुझसे पूछे ही उसने अपनी शाल मुझ पर भी ओढ़ा दी।

मैंने हाथ बढ़ा कर अपना हाथ उसके हाथ पर रखा तो उसने भी मेरा हाथ पकड़ लिया। अब कोई गुंजाइश नहीं बची थी। मैं कुछ देर उसका हाथ सहलाता रहा और फिर मेरा हाथ आगे बढ़ने लगा और उसके गोल गोल मस्त मुलायम ब्रा में कसी हुई चूचियों पर पहुँच गया।

कहानी जारी रहेगी।

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