हिंदी सेक्सी कहानियां



हिंदी सेक्सी कहानियां


मुझे बस एक बच्चा चाहिए

Posted: 19 Feb 2013 07:45 PM PST


मैं अपनी नई कहानी पर आता हूँ।

एक मेरी दोस्त है उसके घर में एक दिन पार्टी थी, काफी लोग आये थे, ज्यादतर लड़कियाँ ही थी। उसकी एक सहेली आयशा के साथ उसकी बड़ी बहन रूपा भी आई थी, वो मुस्लिम थे। रूपा का नाम जैसा ही रूप था और छोटी भी ठीक थी।

बातों बातों में हमारी भी बात होने लगी और उसने मेरा नंबर लिया और इमेल भी लिया। उसके बाद हम चले गए अपने अपने घर।

अगले दिन एक इमेल आया था जिसमें लिखा था- आई ऍम रूपा ! पर आप तो छुपे रुस्तम निकले?

मैंने उसका उत्तर लिखा- क्या? कैसा छुपा रुस्तम? मैंने क्या छुपाया?

उसके बाद ऑनलाइन बात हुई तो उसने कहा- छुपाया नहीं तो बताया भी तो नहीं !

मैंने कहा- क्या नहीं बताया?

उसने कहा- यही कि आप कहानियाँ लिखते हैं?

मुझे थोड़ा अजीब सा लगा, मैं ऑफलाइन हो गया। आधे घंटे बाद उसका कॉल आया।

रूपा- चले क्यों गए? मुझे तो आपसे और बात करनी थी काम की।

मैं- क्या काम है?

रूपा- अरे डरो मत ! मिलो तो ! बताती हूँ।

फिर उसने मुझे एक मॉल में मिलने को बुलाया अगले दिन।

मैं समय से 15 मिनट देर में पहुँचा। उसने आते ही मुझे गले से लगाया और बैठने को बोला। गले लगते ही उसकी 36 की नरम चूचियाँ मेरे सीने में चुभ गई।

फिर उसने कहा- मैंने भी आपकी कहानियाँ पढ़ी हैं, सभी अच्छी है। आपकी कहानियों से लगता है कि आप सेक्स से ज्यादा दिल के रिश्तो को मानते हैं। आपसे उस दिन भी बात की जिससे पता चला कि बात बहुत अच्छे इंसान भी हैं।

फिर कुछ सॉफ्ट-ड्रिंक्स आई, हमने पी। फिर उसने कहा- मेरी शादी को एक साल हो गया है। मेरे पति मुझे संतुष्ट नहीं कर पाते और न ही मुझे अब तक बच्चा ही दे पाए हैं। मेरे जेठ भी मुझ पर लाइन मारते थे तो एक दिन उनसे भी कर लिया पर वो भी ऐसे ही थे। हाथ में जैसे ही लिया निकल गया। मुझे और कुछ नहीं बस एक बच्चा चाहिए।

पहले तो मैंने उसे थोड़ा समझाया कि ऐसे नहीं हो रहा तो गोद ले लो।

तो वो कहने लगी- नहीं, मेरे घर वालों को मेरे से ही बच्चा चाहिए। और उल्टा मेरे में ही कमी निकालते हैं। आप एक अच्छे इंसान है और भरोसे वाले भी हो, इसलिए मैं चाहती हूँ कि आप मेरी मदद करो।

फिर मैंने बोला- मुझे सोचने का वक्त चाहिए।

उसने कहा- मैं कल अपने पति के घर चली जाऊँगी। फिर एक हफ्ते बाद आऊँगी।

मैं घर गया तो एक मैसेज आया था रूपा का- प्लीज मेरी हेल्प कर दो।

उसमें मुझे उसका दर्द भी दिखाई दिया उसके जाने से पहले ही मैंने हा कर दी। वो भी सुनकर खुश हो गई। अपने पति के घर जाकर भी मुझसे फोन पर बातें करती थी, एक दो बार फोन सेक्स भी किया।

एक हफ्ता बीत गया। उसने आकर एक दिन बाद मुझे अपने घर बुलाया, कहा- घर पर आज कोई नहीं है, आ जाना दिन में और शाम को चले जाना।

7-8 घंटे थे हमारे पास में। मैं उस दिन उसके बताये समय यानि 11 बजे उसके यहाँ पहुच गया।

जैसे ही बेल बजाई, वैसे ही आयशा ने दरवाजा खोला, मैं हैरान था। उसने मुझे बैठाया, मेरे लिए पानी लाई और कहा- राजवीर थैंक्स, जो कुछ तुम मेरी दीदी के साथ करोगे, उसकी लाइफ में खुशियाँ आ जाएँगी।

मैंने पूछा- तुम्हारी दीदी कहाँ हैं?

तभी वो नहा कर बाहर आई, गुलाबी सूट पहना हुआ था। उसके आते ही आयशा उठी और बोली- दीदी, मैं सहेली के घर जा रही हूँ, शाम तक आऊँगी।

और चली गई।

अब घर में सिर्फ़ मैं और रूपा थे। फिर रूपा कुछ खाने का लाई और कहा- वीर आप कुछ पीते भी हैं?

मैंने कहा- पी तो लूँगा पर आपका साथ चाहिए।

तो वो एक गिलास ले आई।

मैंने पूछा- एक ही गिलास क्यों?

तो रूपा ने कहा- एक से ही पीयेंगे।

रूपा ने एक पेग बनाया और चिकन तो था ही। पहले मैंने आधा पीया फिर वही पेग रूपा ने नाक बंद करके पिया, कहा- वीर जी, हम पीते नहीं हैं, बस आपका साथ है तो जहर भी पी लेंगे।

फिर ऐसे ही दूसरा पेग भी पिया, इस बार रूपा ने अपने हाथ से पिलाया और उसको मैंने अपने हाथ से।

खाना ख़त्म हो गया, फिर मैंने उसे खींच कर अपनी गोद में बैठा लिया और गालों से चूमता हुआ गर्दन तक और फिर होंठों पर होंठ रख दिए। फिर उसकी कमीज़ उतार दी और ब्रा भी ! एकदम गोरी गोरी चूचियाँ ! मैं उन्हें सहलाने-दबाने लगा और चूसने लगा। कभी एक तो कभी दूसरी। आधे घंटे तक मैं चूसता रहा जिससे उसकी योनि गीली हो गई और मेरी पैंट भी गीली हो गई।

मैंने उसकी सलवार और पेंटी भी उतार दी, उसने मेरे कपड़े भी उतार दिए। मेरा तन्नाया लंड देखते ही वो नीचे बैठ कर मेरा लंड चूसने लगी, मैं उसकी चूचियों से खेलने लगा।

अब उससे रहा नहीं जा रहा था, उसने कहा- अब जल्दी से मुझे चोद दो, दे दो अपना पानी मेरी चूत में और बना दो मुझे माँ, मेरी जिंदगी में खुशियाँ दे दो।

फिर मैंने देर न करते हुए उसकी चूत में लंड डाल दिया। लंड आराम से अंदर चला गया, फिर मैंने धक्के लगाने शुरू किये।

वो कहती जा रही थी- खूब चोदो ! और चोदो ! और तेज !

मैं भी उसको तेज तेज धक्के लगा रहा था, बाहर निकाल निकाल कर चोद रहा था। उसकी सिसकारियाँ कमरे में गूंजने लगी और उसका पानी निकल गया।

मैं अभी भी उसे चोद रहा था, 5 मिनट बाद मैं भी उसकी चूत में निकल गया। फिर मैं उसके ऊपर ही लेटा रहा। कुछ देर बाद मैं उसके ऊपर से हट कर बगल में लेट गया। वो मेरे ऊपर आ गई और उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

मैंने प्यार से उसे समझाया और माथे पर चूमा।

फिर उस दिन मैंने उसे 3 बार चोदा, तीनो बार मैंने उसकी चूत में पानी निकाला। तीन दिन बाद फिर मैं उसके घर गया। वो मेरा ही इन्तजार कर रही थी, काले रंग का सूट पहन रखा था उसने, क्या गजब लग रही थी वो !

मेरे जाते ही उसने मुझे खींच लिया और गले से लगा लिया। फिर उसने अपने हाथ से बनाया खाना अपने हाथ से खिलाया और कहने लगी- जो चाहिए वो मांग लो आज !

मैंने कहा- बस अपने दिल में दोस्ती की जगह बनाये रखना।

यह सुन कर वो मेरी गोद में बैठ गई और मुझे गले से लगा लिया।

थोड़ी देर ख़ामोशी तोड़ते हुए मैंने कह ही दिया- हाँ अगर देना है वो आज आगे भी और थोड़ा पीछे से भी ले लूँ।

"धत्त ! वहाँ नहीं ! वहाँ दर्द होता है, मैंने सुना है ऐसा !"

मैंने कहा- सुना है न, किया तो नहीं? आज कर के देख लो, दर्द तो आगे से भी हुआ होगा पहली बार? लेकिन बाद में मजा आया था न?

उसने कहा- चलो ठीक है, आपकी जो मर्जी ! आप मेरे साथ जो करो, सब मंजूर है, मैं तो अभी आपकी ही हूँ।

फिर मैंने उसके होंठों पे होंठ रख दिए और फ्रेंच किस की और साथ में अपना हाथ उसकी चूचियों पर ले आया और दबाने लगा।

उसने मेरी टीशर्ट उतार दी और मेरी छाती पर चूमने लगी, निप्पल चूसने लगी।

मैंने भी थोड़ी देर बाद उसका कमीज और साथ में ब्रा उतार दी। फिर मैं उसकी चूचियो से खेलने लगा और कस के दबाने लगा। वो सिसकारियाँ लिए जा रही थी- और जोर से ! और करो ! अह्ह्ह राजवीर और जोर से !

चूचियाँ चूसते चूसते मैंने उसकी सलवार भी उतार दी और पेंटी में हाथ डाल दिया और उसकी भग्नासा को रगड़ दिया। उसने बहुत तेज सिसकारी ली और पूरे कमरे में उसकी आवाज गूंज गई।

फिर मैंने दो उंगलियाँ उसकी चूत में डाल दी और आगे पीछे करने लगा। वो गांड उठा उठा कर मेरी उंगली अपनी चूत में ले रही थी। फिर मैंने उसकी पेंटी उतार कर, पैरों को उठा कर अपना मुँह उसकी गीली चूत पे लगा दिया। वो भी अपने हाथ से मेरा सर पकड़ के चूत पर सर को दबा रही थी। उसकी चूत पानी छोड़े जा रही थी जिससे उसकी गांड गीली हो गई।

मैंने एक उंगली उसकी गांड में डाल दी, पहले उसने गांड भीच लिया फिर ढीला छोड़ दिया। मैं उंगली को गोल गोल घुमा के गांड में जगह बना रहा था, फिर मैंने अपनी पैंट खोल दी और उसने मेरा अंडरवियर और मेरे शैतान को मुँह में लेकर बुरी तरह चूसने लगी।

5 मिनट में चूस के लंड को पूरा खड़ा कर दिया। मैंने तेल लिया और उसकी गांड में उंगली डाल के अन्दर तक तेल लगाया और अपने लंड पर भी अच्छे से लगा लिया और गांड के छेद पर रख कर एक धक्का दिया।

रूपा- आह्ह प्लीज़ आराम से !

मैंने बिना कुछ बोले दूसरा धक्का लगाया, फिर तीसरा !

उसकी आँखों में आँसू आ गए तो मैं रुक गया, उसके गालों को चूमा और पूछा- अगर दर्द हो रहा है तो निकाल लूँ?

उसने कहा- नहीं, आपके लिए दर्द भी मंजूर है, डाल दो पूरा।

मैंने फिर थोड़ी देर रुक के दो धक्के और दिए और पूरा लंड उसकी गांड में जा चुका था।

मैं धीरे धीरे धक्के लगा रहा था, उसे भी मजा आने लगा और मेरा साथ देने लगी, पूरे कमरे में सिसकारियाँ गूंजने लगी, 15 मिनट बाद वो झर गई, मैं भी आने वाला था।

उसने कहा- गाण्ड में नहीं, मेरी चूत में निकालो !

मैंने गांड से लंड निकाला, पक से आवाज आई निकलते समय और दो झटके में चूत में डाल दिया और धक्के लगाने शुरू किया और एक मिनट में उसकी चूत में झर गया और उसके ऊपर लेट गया।

उसने मेरे गालों पर पप्पियों की बारिश कर दी और गले से लगा के एकदम चिपक गई। कुछ देर ऐसे ही रहने के बाद मैंने उसके होंठों पर होंठ रख दिए और लंड तो चूत के पास था ही। किस करते करते लंड भी खड़ा हो गया। इस बार वो मेरे ऊपर आ गई और लंड को चूत में पूरा समां लिया और उछल-उछल कर चुदने लगी। मैं भी उसकी चूचियों को पकड़ कर दबाने लगा। उसे और मुझे दोनों को मजा आने लगा।

कुछ देर में मैं बैठ गया और उसे गोद में बैठा कर चोदने लगा।

20 मिनट में वो दो बार झर गई मैं भी आने वाला था तो उसे लेटा दिया और पूरा माल उसकी चूत में डाल दिया और उसके ऊपर लेट गया।

फिर हमने थोड़ी ड्रिंक ली और फिर शुरू हो गए। वो मेरा लंड चूस रही थी मैं उसकी चूत चाट रहा था। हम 69 पोजीशन में थे। वो मेरे लंड को गले तक उतार के चूस रही थी, मैं भी उसकी चूत में जीभ डाल के चोदे जा रहा था और और गांड में उंगली भी डाली हुई थी जिसे आगे पीछे कर रहा था।

कुछ देर में उसने कहा- अब चोद दो राजवीर, बना दो मुझे अपने बच्चे की माँ !

मैंने उसको घोड़ी बनने को कहा, पीछे से उसकी चूत में लंड डाल दिया और धक्के लगाने लगा।

एक इंच अन्दर रखता और पूरा बाहर निकाल के झटके से डालता, जिससे मेरा लंड उसके बच्चेदानी से टकराता और वो मजे से तेज आवाज में चीखती और सिसकारी लेती।

ऐसे करते हुए 15 मिनट हुए और वो और मैं एक साथ झर गए। मैं उसकी पीठ पर लेट गया।

रूपा- राजवीर, आज जो तुमने मेरे को जो सुख दिया उसके लिए मैं तुम्हारा एहसान कभी नहीं भूल पाऊँगी।

मैं- एहसान किस बात का? एक तरह से हेल्प की है बस और क्या ! दोस्त हो तो दोस्ती नहीं निभाऊँगा क्या?

और चला गया।

फिर उसी दिन वो अपने ससुराल चली गई और अपने पति से चुदवाया कि किसी को शक न हो और कुछ दिन बाद उसने मुझे बताया कि वो माँ बनने वाली है।

अब देखो लड़का होता है या लड़की।

उसने मुझे 10000 देने चाहे लेकिन मैंने लिए नहीं, बस 'वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई' फिल्म का डायलोग- अजय देवगन जो बोलता है- दुआ में याद रखना।

उसने मुझे कहा- आपने जो मुझे ख़ुशी दी है उसकी कीमत मैं नहीं दे सकती।

और दो बूँद आंसू उसकी आँखों में आ गए।

मैंने उसे गले लगाते हुए कहा- आपके दो बूँद आंसू ही मेरी कीमत समझ ले।

तो दोस्तो बताना कि आपको मेरी आपबीती कैसी लगी?

veerudada33@gmail.com

लंड और चूत में कुश्ती -2

Posted: 19 Feb 2013 07:31 PM PST


उसके पेट को थोड़ा और दबाते हुए मैंने अपने मुँह को उसकी गर्दन के पास ले जाकर उसे कान में धीरे से पूछा- मैडम, वट डू यू वान्ट?

और उसने अपने दायें हाथ को पीछे ले जाकर मेरे लिंग को पकड़ लिया और उसे दबाकर बोली- आई वान्ट दिस !

उसका इतना कहना था कि मेरा जोश सौ गुना बढ़ गया। मैंने खड़े खड़े ही उसके कान पे हल्का सा दांत लगाया और एक हाथ सीधे उसकी योनि पर ले गया और उसे उसके शॉर्ट्स के ऊपर से ही मसलने लगा। अब उसके हाथ से उसके कपड़े गिर गए और वह भी पूरा आनन्द लेने लगी। उसकी मेरे लिंग पर पकड़ बहुत ही कष्टकारी हो गई जो कि आनन्ददायक भी थी। इस तरह थोड़ी देर खड़े खड़े आनन्द लेने के बाद हम दोनों अलग हो गए और हम दोनों की आँखें मिली, पयस्विनी ने अपने होंठों को काटते हुए मुझे एक बहुत ही उत्तेजक मुस्कान दी जिसने मेरा जोश और बढ़ा दिया।

मैंने पयस्विनी से कहा- जब हम इतने अच्छे दोस्त बन गए हैं तो अब ये कपड़ों का पर्दा कैसा? और वैसे भी ये मेरे कपड़े हैं इसलिए अब मुझे मेरे कपड़े वापस दे दो। पयस्विनी ने कहा- खुद ही ले लो !

और हम दोनों बेड से नीचे आ गए, हम दोनों अब कालीन पर खड़े थे जो बेड के पास ही बिछा हुआ था, मैंने पयस्विनी को बेड पर बैठ कर पैर नीचे रख कर अपनी पीठ मेरी तरफ करने को कहा।

अब क्षमा चाहूँगा मित्रों कहानी के इस भाग से अब आगे कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग करूँगा जो अत्यधिक आनन्ददायक है पर यह तथाकथित समाज उन्हें अश्लील कहता है।अब उसकी शानदार गांड मेरे सामने थी और अपने दर्शन करवाने को तैयार थी, मैंने आगे बढ़कर एक बार दोनों हाथ उसकी कमर पर रखे और उसी अवस्था में पयस्विनी के बिल्कुल पीछे बैठ गया, मेरा लंड उसकी गांड को बिल्कुल छू रहा था, बस बीच में दो कपड़े थे, मैंने पयस्विनी को हल्का सा अपने लंड की तरफ दबा दिया और एक झुरझुरी सी दोनों के बदनों में छूट गई। अब मैंने पयस्विनी को घुमा दिया, मैं खुद बेड बेड पर बैठ गया और पयस्विनी मेरी गोद में बैठी थी, मेरे बाएँ हाथ की तर्जनी उंगली पयस्विनी के मुंह में थी और दायाँ हाथ जगह तलाशते हुए एक निपुण गोताखोर की तरह पयस्विनी की पेंटी तक पहुँच गया जो हल्की गीली हो चुकी थी।

हालाँकि हम दोनों की आँखें बंद थी पर मैं पयस्विनी की चूत को साफ़ महसूस कर सकता था। हल्के-हल्के बालों के बीच में एक नरम सा उभरा हुआ अहसास मेरी उत्तेजना को लाख गुना बढ़ा रहा था। ध्यान करने वाले सन्यासी-ध्यानी को भी आँख बंद करके ध्यान लगाने में वो आनन्द नहीं आता होगा जो मुझे पयस्विनी की चूत का ध्यान करके आ रहा था, ऐसा लग रहा था जैसे हजारों सूर्यों का ताप भी उस परमपिता की इस छोटी सी रचना चूत के ताप के आगे एक दिये का ताप ही होगा।

तो इस तरह आनन्द के सागर में गोते लगाते हुए मैं तो एकदम सम्भोग से पूर्व ही समाधि की अवस्था में चला गया था। पयस्विनी के हाथों को मैंने अपने लंड पर महसूस किया और मेरा ध्यान भंग हो गया। मैंने फटाफट से पयस्विनी के शॉर्ट्स को नीचे किया और हम दोनों अलग हो गए अब मेरे सामने पयस्विनी पेंटी और टीशर्ट में खड़ी थी। इस स्थिति में पयस्विनी कीआधी पेंटी दिख रही थी, अब वो मेरी तरफ बढ़ी और जोर से मेरे लंड को दबा दिया, फिर एकदम से मेरे शॉर्ट्स को नीचे खींच लिया। अब मैं भी अंडरवियर में खड़ा था और मेरा लंड साफ़ साफ़ उभरा हुआ दिख रहा था।

पयस्विनी ने बिना कोई इन्तजार किये मेरा अंडरवियर भी खींच लिया इसकी प्रतिक्रिया में मैने उसकी गुलाबी पीली पेंटी जिस पर गुलाबी फूल बने हुए थे को उसकी नाभि के बीच से पकड़ कर दोनों भागों को विपरीत दिशा में खींच कर एक ही झटके में फाड़ दिया अब पयस्विनी अपनी हलकी लालिमा लिए अपनी मखमली चूत के साथ मेरे सामने खड़ी थी। उसकी चूत क्या थी दोनों जांघों के बीच में उभार लिए हुए एक हल्की लकीर थी जिसके दोनों तरफ हल्के-हल्के से बाल थे।

मुझसे रहा नहीं गया और मैं पयस्विनी कि तरफ बढ़ा ही था कि पयस्विनी ने एक ही झटके में मेरा अंडरवियर खींच लिया।

अब हम दोनों लंड चूत लिए एक दूसरे के सामने खड़े थे। मैं थोड़ा आगे की तरफ आया, दोनों हाथ उसके चूतड़ों पर रखे और उसे उठाकर मैंने बेड पर इस तरह पटका कि उसके पैर नीचे लटकते रहे।

अब मैं पयस्विनी के ऊपर चढ़ गया, अपने सीने से उसके बड़े बड़े बोबों को दबा दिया मुझे उसके उभरे हुए निप्पल साफ़ महसूस हो रहे थे और मैं उसकी गर्दन के आस-पास चूमने लगा। पयस्विनी भी यौनानन्द में रत होकर बहुत ही उत्तेजक आवाजें निकाल रही थी। मेरा लंड उसकी दोनों जांघों के बीच में था, मेरी जांघों को पयस्विनी ने अपनी जांघों में कस लिया था, पयस्विनी के होंठ सामान्य से हल्के मोटे थे जो मुझे बहुत पसंद हैं और अब हम एक दूसरे में गुत्थम-गुत्था हो रहे थे जबकि दोनों को होंठ आपस में जुड़े हुए थे और एक दूसरे का रसपान कर रहे थे। पयस्विनी ने अपने दांतों से मेरा निचला होंठ हल्का सा काट लिया, अब पयस्विनी की जीभ मेरे होठों के बीच में घूम रही थी और दोनों एक दूसरे के रस का आदान-प्रदान कर रहे थे। पयस्विनी की तेज तेज साँसों के कारण उसके बोबे इतनी जोर से ऊपर नीचे हो रहे थे कि लग रहा थी कि ये टीशर्ट फाड़ कर बाहर आ जायेंगे। अचानक से पयस्विनी ने मुझे अपनी भुजाओं में कस के हल्की सी ताक़त लगाई और और अब हम दोनों अपने एक कंधे के बल पर बेड पर थे, पयस्विनी की जांघों ने मुझे इस कदर कस लिया था कि मुझे आश्चर्य हुआ, इस लड़की में इतनी ताक़त आई कहाँ से !

अगले ही पल मैं नीचे था और पयस्विनी मेरे ऊपर थी।और अब वो मेरे लंड के ऊपर बैठी हुई थी मेरा लंड उसकी चूत का स्पर्श पाकर सनसना रहा था कि पयस्विनी सीधी हुई और उसने अपनी टीशर्ट उतार फेंकी। पहली बार मैंने किसी लड़की के बोबों के इतने पास से देखा था, इससे पहले तो पोर्न मूवीज में ही देखा था।

पयस्विनी के बोबे उसकी उम्र की लड़कियों से काफी बड़े और पूर्ण विकसित थे। मैंने अचानक से हाथ बढ़ाया और उसकी ब्रा को भी एकदम खींच लिया। अब उसके बोबों का दृश्य देखते ही बनता था, बिल्कुल सफ़ेद बोबो के ऊपर हल्की सी लालिमा हुए निप्प्ल गुलाबी मोती जैसे लग रहे थे। मैंने मेरे दाएं हाथ से उसके बाएं बोबे को हल्का सा मसला तो पयस्विनी के मुँह से आह निकल गई।उसके चूचे इतने बड़े थे कि मेरे एक हाथ में एक स्तन नहीं आ रहा था। अचानक से मुझे एक आईडिया आया, मैंने पयस्विनी से कहा- चलो, कोई खेल खेलते हैं।

तो उसने कहा- कैसा खेल?

मैंने कहा- चलो, कुश्ती करते हैं, देखते हैं ज्यादा ताक़त किसमें है?कुश्ती किसे लड़नी थी, हमने तो मजे करने थे और एक घर में जवान लड़का-लड़की वो भी बिना कपड़ों के तो अब रुकने का तो कोई सवाल ही नहीं था।

हम दोनों बेड से नीचे कालीन पर आ गये और एक दूसरे की तरफ थोड़ा झुकते हुए दोनों ने एक दूसरे की गर्दन के पीछे हाथ डाल दिए। अचानक से मैंने पयस्विनी को थोड़ा सा अपनी तरफ खींचा और अपने बाएँ घुटने को पयस्विनी के पैरों के बीच में डाल कर दायें हाथ को पयस्विनी के दोनों पैरों के बीच में डाल कर हवा में उठा दिया और बाएं हाथ से पयस्विनी को अपनी गर्दन के ऊपर से खींचते हुए धीरे धीरे जमीन पर गिरा दिया। चूंकि अगर कंधे अगर जमीन को छू हो जाते तो पयस्विनी हार जाती इसलिए फुर्ती से पयस्विनी जमीन पर मुँह के बल उलटी लेट गई उसके हाथ उसके दोनों स्तनों के नीचे थे और उठे हुए कूल्हे मेरे सामने !

उसके क्या कूल्हे थे, ऐसा लग रहा था कि दो बड़े से तरबूज हों !

मैं तो कुश्ती भूल कर उसके चूतड़ों का दीदार करने में लग गया और पता नहीं कब मेरी जीभ उसकी गांड के आस-पास पहुँच गई और मैं उसकी गांड को चाटने लगा। गांड चाटते चाटते मैं स्वर्ग के द्वार तक पहुँच गया जहाँ से हल्का हल्का आब-ए-चूतम रिस रहा था।

मैं तो अपनी धुन में मस्त होकर आब-ए-चूतम के स्वाद का मजा ले रहा था कि अचानक पयस्विनी ने मुझे धक्का देकर मेरे कंधे जमीन पर छुआ दिए, मुझे कुश्ती में उसने हरा दिया था पर असली कुश्ती तो अभी बाकी थी।

मेरा सर पयस्विनी के जांघों की तरफ था, पयस्विनी घुटनों के बल खड़ी थी कि अचानक मैंने थोड़ा सा आगे खिसक कर फिर उसकी चूत में अपना मुँह दे दिया। अब मैं जमीन पर था और पयस्विनी मेरे ऊपर लेटी लेटी मेरे लंड तक पहुँच गई और मेरे लंड को मसलने लगी। मेरे हाथ पयस्विनी के चूतड़ों के चारों तरफ कसे हुए थे और मुँह पयस्विनी की हल्की रोयेंदार चूत में था।

थोड़ी देर में मैंने अपने लंड पर हलकी सी गर्माहट और गीलापन महसूस किया, पयस्विनी ने बिना मेरे कहे ही मेरा लंड अपने मुंह में ले लिया। चूंकि घर में कोई नहीं था इसलिए हम जोर जोर से आवाजें निकाल रहे थे, पयस्विनी की पानीदार आवाज़ माहौल को और भी मादक बना रही थी।

इस तरह थोड़ी देर में हम दोनों का स्खलन हो गया।

थोड़ी देर हम दोनों एक दूसरे के ऊपर लेटे रहे, इसके बाद हम अलग अलग हुए।

थोड़ी देर में हमारी सांस सामान्य हुई तब तक हम फिर तैयार हो गए। आँखों आँखों में हमारी बात हुई और पयस्विनी पास में रखे सोफे के पास पहुँच गई। अब मैंने पयस्विनी की चूत को हल्के हाथ से मसला तो उसके मुंह से हल्की-हल्की आवाज़ें निकलने लगी।

मैंने कहा- पानीपत के चौथे जंग के लिए तैयार?

तो उसने कहा- तैयार !

मैं बाथरूम में गया और जेली ले आया और अपने लंड पर लगा दी। फिर मैं धीरे धीरे लंड को उसकी चूत पर मारने लगा जिससे पयस्विनी की बेचैनी बहुत ज्यादा बढ़ गई, उसने कहा- अब देर नहीं, डू इट राईट नाऊ ! और मैंने धीरे-धीरे अपने लंड को उसकी चूत में प्रवेश करवा दिया। क्योंकि हम दोनों ही प्रथम-सम्भोग करने वाले थे इसलिए ज्यादा कुछ पता नहीं था पर पोर्न मूवीज के कारण मैं थोड़ा ज्ञानी था तो उसी थ्योरी वाले ज्ञान को आज अप्लाई करने का समय आ गया था, मैं पीछे कैसे हटता?

थोड़ा सा अन्दर डालकर मैंने हल्के-हल्के धक्के लगाने चालू किये। अन्दर उसकी चूत का तापमान बहुत ज्यादा था, ऐसा लग रहा था कि मैने अपने लंड को किसी रसदार इलेक्ट्रोनिक भट्टी में डाल दिया हो और कसावट इतनी जबरदस्त थी अगर इतना किसी के गले को कस दिया जाये तो एक मिनट में ही उस आदमी की दम घुटने से मौत हो जाये।

मैं उसकी चूत की आन्तरिक रचना को साफ़ महसूस कर सकता था, हालांकि अभी लंड केवल दो इंच अन्दर गया था और मैं हल्के- हल्के धक्के लगा रहा था। अचानक मैंने जोर का धक्का लगाया और लंड 5 इंच तक अन्दर हो गया था, पयस्विनी अचानक बुरी तरह से चीखी और उसने मेरी पीठ को जबरदस्त तरीके से कस लिया।

मुझे अपने लंड पर कुछ गर्माहट महसूस हुई, थोड़ी देर में मैंने देखा कि पयस्विनी का कुंवारापन चूत के रास्ते खून के साथ बहता हुआ बाहर आ रहा है पयस्विनी की आँखों से आँसू आ गए तो मैंने उसके उसकी गांड के सहारे उठाते हुए बेड पर लिटा दिया। लंड अभी अन्दर ही था और मैं पयस्विनी को होठों पर चूमने लगा। पयस्विनी के आँसू से गीले उसके होठों से नमकीन सा स्वाद आ रहा था।

मैंने उसके हल्के-हल्के धक्के लगाना जारी रखा, थोड़ी देर बाद पयस्विनी भी अपनी गांड उठाकर प्रत्युत्तर देने लगी। मैंने एक जोर का धक्का लगाया और मेरा लंड 6 इंच तक अन्दर चला गया, दोनों के होंठ एक दूसरे का रसपान कर रहे थे तो लंड चूत के साथ मजे कर रहा था। अब मैंने भी धक्कों की गति बढ़ा दी, हर धक्के के साथ उतनी ही ताकत से पयस्विनी का भी जवाब आता, वो अपनी गांड उठा उठाकर मजे ले रही थी। ऐसे ही एक धक्के का जवाब पयस्विनी दूसरे धक्के से देती और धक्के पर धक्का, धक्के पे धक्का !

इस धक्कम पेल से अचानक पयस्विनी की चूत में कसावट आ गई और मुझे लगने लगा कि अब तो लंका लुटने वाली है कि पयस्विनी की जबरदस्त आनन्ददायक आवाज आई, उसका पूरा शरीर ढीला पड़ गया और मेरे लंड के पास बहकर उसका जवानी का रस नीचे की तरफ बहने लगा। इस सब से मेरा भी जोश बहुत बढ़ गया, 8-10 धक्कों के बाद मुझे भी दिन में सितारे दिखने लगे और तड़ाक-तड़ाक-तड़ाक ! मेरे लंड से भी एक के बाद एक फायर होने लगे, मैं पयस्विनी की चूत के अन्दर ही झड़ ही गया और थोड़ी देर के लिए मुझे कुछ भी दिखना बंद हो गया। आत्मा का परमात्मा से मिलन हो गया।

थोड़ी देर तक हम ऐसे ही एक दूसरे के ऊपर पड़े रहे फिर, एक दूसरे को सहारा दिया, मैंने पयस्विनी से अन्दर झड़ने के लिए सॉरी कहा तो उसने कहा- मैं अभी पीरियड्स में हूँ इसलिए नो प्रॉब्लम !

मैं भी खुश हो गया।

इसके बाद हम दोनों बाथरूम में गए और साथ में नहाये और अगले एक महीने तक जब तक रामसिंह नहीं आ गया, चोदम-चुदाई करते रहे और उसके बाद भी जब भी मौका मिला एक दूसरे को मजे देते रहे।

मेरी कहानी पढ़ने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

आपके विचारों की प्रतीक्षा में आपका अपना 'मानव'

manavvaladun@gmail.com

साली की चुदाई -2

Posted: 19 Feb 2013 07:19 PM PST


उसने मेरी कमर पर अपनी टाँग रख दी और मुझसे लिपट कर सोने लगी।

मैंने कहा- यह क्या कर रही हो?

उसने कहा- जीजाजी, मैं तो ऐसे ही सोती हूँ ! अपने घर में भी और दीदी को भी ऐसे ही पकड़ कर सोती हूँ !

मैंने कहा- ठीक है !

फिर मैं धीरे-धीरे उसके चूचे दबाने लगा, वो कुछ नहीं बोल रही थी, उसे भी अच्छा लग रहा था।

उसने कहा- सो जाओ जीजा जी !

मैंने कहा- अब नींद किसे आएगी मेरी साली जी !

और मैं जोर-जोर से उसकी चूचियाँ दबाने लगा। वो धीरे-धीरे गर्म होने लगी थी। मैंने उसकी कमीज़ उतार दी और अब वो मेरी सामने सिर्फ ब्रा में थी। तब पहली बार उसे मैंने इस हालत में देखा था। कसम से, क्या माल लग रही थी सुप्रिया ! मस्त चूचियाँ थी साली की !

फिर मैंने उसकी ब्रा भी उतार दी। उसने मना तो किया पर ज्यादा विरोध नहीं किया।

फिर मैंने उसकी सलवार भी उतारने के लिए जैसे ही हाथ उसके नाड़े तक लगाया, उसने मेरा हाथ पकड़ किया और कहने लगी- प्लीज, इसे तो रहने दो !

पर मैं नहीं माना और उसकी सलवार भी उतार दी। तब वो मेरे सामने पैंटी और ब्रा में थी, मस्त परी की तरह लग रही थी !

फिर मैं उसके दोनों स्तनों को बारी-बारी मुंह में लेकर चूसने लगा।

उसे मजा आने लगा और वो और गर्म होती जा रही थी !

और फिर मैं उसकी बुर के पास उंगली ले गया और उसके बूर के दाने को रगड़ने लगा।

उसके मुंह से सिसकारियाँ निकल रही थी- सीई ईईइ आअआ !

और मैं उसकी बुर में अपना मुंह लगा कर उसकी बुर चाटने लगा।

क्या स्वाद था उसकी बूर का ! नमकीन की तरह !

मैंने थोड़ी देर ही उसकी बूर चाटी थी और वह झड़ गई ! और ढेर सारा पानी मेरे मुंह में आ गया। मैंने उसका पानी चाट लिया और उसकी बुर साफ़ कर दी।

अब मैंने उससे पूछा- सुप्रिया, मजा आया?

उसने कुछ नहीं कहा और शरमा कर मुस्कुरा दी।

फिर मैंने कहा- सुप्रिया, अब जरा मेरे लण्ड को अपने मुंह में ले कर के मेरी भी प्यास बुझा दो !

उसने मेरा लण्ड मुंह में लेने से मना कर दिया।

मैंने कहा- देखो, मैंने भी तो तुम्हारी बुर चाटी है ! क्या तुम अपने जीजा जी के लिए इतना भी नहीं कर सकती?

इस पर उसने मेरा मोटा लण्ड अपने मुंह में लिया और उसे चूसने लगी और मैं उसकी धीरे-धीरे फिर चूचियाँ चूसने लगा और वो फिर से गर्म हो गई और मेरा लण्ड जोर जोर से लॉलीपोप की तरह चूसने लगी।

अब सुप्रिया पूरी गर्म हो गई फिर से !

फिर मैंने उसके चूत में अपनी जुबान लगा दी और चाटने लगा वो सीईई ईइ अह ! आह ! करने लगी और बोली- जीजा जी, प्लीज, ऐसा मत करो !

वो मेरा लण्ड पकड़ कर जोर जोर से दबाने लगी। फिर मैंने उसकी टांगों को थोड़ा उठाया और अपने कंधे पर रख कर और अपने लण्ड पर ढेर सारा थूक लगा कर उसकी योनि के अंदर जैसे ही थोड़ा लण्ड घुसाने की कोशिश की, वो छटापटाने लगी और बोली- रहने दीजिये !

पर मैंने उसे कहा- सुप्रिया, कुछ नहीं होगा तुम्हें !

वो बोलने लगी- दर्द हो रहा है !

फिर मैंने लिपगार्ड अपने बैग में से निकाला और अपने लण्ड और उसकी बुर पर काफ़ी सारा लगा दिया जिससे उसकी कुंवारी बुर और चमकदार हो गई। मैंने उसे बातों में उलझा दिया और जोर से एक झटका मारा।

वो चिल्ला पड़ी और रोने लगी, कहने लगी- प्लीज मुझे छोड़ दो ! बहुत दर्द हो रहा है !

और मुझसे कहने लगी- क्या इसी काम के लिए मुझे यहाँ लाये थे?

और वो जोर-जोर से रोने लगी।

मैंने उसे समझाया और कहा- प्लीज रोना नहीं ! नहीं तो होटल वाले सुन लेंगे तो बदनाम हो जाएंगे !

मैं उसकी बुर में ही लण्ड रखे-रखे उसे समझा रहा था, उसके होंठों को चूस रहा था और उससे कह रहा था- सुप्रिया, थोड़ी देर बाद तुम्हें भी मजा आएगा ! देखना !

और ऐसे बातें करते-करते दस मिनट के बाद उसका दर्द कम हुआ, फिर उसने कहा- जीजा जी, दर्द कम हो गया है !

फिर मैंने और एक जोर का धक्का दिया और पूरा का पूरा लण्ड उसकी बूर में पेल दिया।

वो इस बार भी चिल्लाई पर मैंने उसके होंठ अपने होंठों में ले लिए थे क्योंकि मुझे पता था कि वो चिल्लाएगी, उसकी सील जो टूट रही थी !

और ढेर सारा खून मेरे लण्ड पर लग गया था।

वो कहने लगी- आप तो कह रहे थे कि मजा आएगा ! मजा कहाँ आ रहा है? यहाँ तो सिर्फ दर्द ही दर्द हो रहा है?

फिर मैंने कहा- थोड़ी देर और रुको ! फिर देखना !

मैंने लण्ड उसकी बुर में ही रखे रखा था और उसकी चूचियों को जोर-जोर से चूस रहा था। फिर थोड़ी देर के बाद सुप्रिया का दर्द कम हो गया और वो भी नीचे से होले-होले अपनी कमर हिलाने लगी।

मैंने कहा- क्यों सुप्रिया? दर्द कहाँ गया?

सुप्रिया ने कहा- जीजा जी, अब दर्द ना जाने कहाँ चला गया ! जोर से करिए ना !

फिर मैंने अपनी गति बढ़ा दी और जोर-जोर से उसे पेलने लगा। वो सिसकारियाँ ले ले कर चुदवा रही थी- वूऊऊओ आआआअ हाआआआअ हईईईईए ! और जोर से जीजा जी ! सिसीईईईइ ! बहुत मजा आ रहा है ! सच में ! आपने कहा था कि बहुत मजा आएगा ! मुझे बहुत मजा आ रहा है ! हाय जीजा जी ! ऐसे ही करो ना ! बहुत मजा आ रहा है ! सिसीईईईईईई उईईईई हयईईईई !

ऐसे वो सीत्कार कर कर के मुझसे चुदवा रही थी और अपनी कमर जोर जोर से हिला रही थी।

करीब दस मिनट चुदवाने के बाद उसका शरीर अकड़ने लगा, मैं समझ गया कि वो झड़ने वाली है।

उसने कहा- जीजा जी, और जोर से ! और जोर से पेलो !

और उसने मुझे जोर से पकड़ लिया और वो झड़ गई।

पर मेरा लण्ड अभी भी खड़ा था और उसकी चुदाई कर रहा था। करीब 30 मिनट की चुदाई के दौरान वो तीन बार झड़ गई थी और अब मेरी भी बारी थी। मैं उसे जोर जोर से पेलने लगा, वो जोर जोर से सीई ईई ईईई इआ आह आअ उईईई हईई कर रही थी।

अब मुझे लगा कि वो फिर से झड़ने वाली है और अब मैं भी झड़ने वाला था, मैं उसे जोर जोर से चोदने लगा, मैंने उससे कहा- हाय मेरी साली, मैं झड़ने वाला हूँ !

तो उसने कहा- जीजा जी, मैं भी झड़ने वाली हूँ !

मैंने कहा- कहाँ करूँ?

उसने कहा- आपकी मर्जी !

फिर मैं उसे जोर जोर से चोदने लगा और वो भी जोर जोर से नीचे से अपनी कमर हिला रही थी। फिर हम दोनों एक साथ झड़ गए, उसने मुझे अपनी बाहों में भर लिया और एक जोर से चुम्बन मेरे गाल पर कर दिया।

चादर देखी तो खून से लाल हुई पड़ी थी। हमने चादर हटा दी और दोनों नंगे बिस्तर पर लेट गए।

उस रात मैंने उसकी पाँच बार चुदाई की, कभी कुतिया बना कर, कभी गोद में लेकर, कभी वो मेरे ऊपर हो गई। हमने अलग-अलग तरीके से चुदाई की, पूरी रात आनन्द लिया।

अगली कहानी बाद में कि मैंने सुप्रिया और उसकी छोटी बहन को एक साथ कैसे चोदा !

आपको मेरी सत्य कथा कैसी लगी, मुझे मेल करिएगा !

harrybaweja_83@rediffmail.com

लंड चूत में कुश्ती

Posted: 19 Feb 2013 09:30 AM PST

मैं आपको मेरे जीवन की उस घटना के बारे में बताना चाहता हूँ जब एक सुंदरी को मैंने काम सुख प्रदान किया था तथा बदले में उससे रति सुख लिया था।

तो बात को ज्यादा लम्बा न खींचते हुए सीधा उस लड़की का परिचय करवाता हूँ- उसका नाम पयस्विनी है, पयस्विनी का मतलब ही दूध देने वाली होता है तो यह तो असंभव ही है कि उसके पास दुग्ध को एकत्रित करने के लिए विशाल पात्र न हों। कहने का तात्पर्य यह कि पयस्विनी स्तनों के मामले में संपन्न थी, उसे परमपिता परमेश्वर ने सामान्य से बड़े स्तन दिए थे कम से कम उनका विस्तार 35 इंच तक तो होगा ही तथा उसी अनुपात में उसके नितम्ब भी थे, जब वो चलती थी तो बरबस ही उसे गजगामिनी की उपमा देने का मन होता था, उसका कद भी अच्छा था यही कोई लगभग 5'8"।

मैं चूंकि मेरे घर से दूर हॉस्टल में रह कर पढ़ता था। जब मैं दिवाली की छुट्टी में घर आया तब पहली बार उसे देखा था, हुआ यूँ कि हमारा परिवार काफी संपन्न है तथा ब्रिटिश काल में हम ज़मींदार हुआ करते थे जिनकी शान अभी भी बाकी है, बड़ा सा किले नुमा घर तथा काफी मात्रा में घर पर गायें भी हैं जिन्हें चरवाहे चरा कर शाम को घर छोड़ देते हैं तथा दूध भी निकाल कर घर पर दे देते हैं।

तो मूल बात अब शुरू होती है जब मैं द्वितीय वर्ष में था, मैं दिवाली की छुट्टी में आया तो मैंने देखा कि हमारे पुराने मुंशी जी का निधन हो जाने के कारण नए मुंशी जी केशव बाबू आये हैं, केशव बाबू की पत्नी का निधन बहुत पहले ही हो गया था, उनकी केवल एक पुत्री थी जो हमारी कहानी की नायिका है पयस्विनी। पयस्विनी भी द्वितीय वर्ष मैं ही पढ़ती थी तथा वह भी छुट्टियों में घर पर आई थी। वैसे तो केशव बाबू को रहने के लिए हमारे घर के परिसर में ही जगह दे दी गई थी तथा उनके लिए खाना भी भिजवा दिया जाता था परंतु पयस्विनी के आने के बाद वही खाना बनाती थी।

एक दिन की बात है, मैं सुबह सुबह बाहर अहाते में पिताजी के साथ बैठ कर समाचार पत्र पढ़ रहा था, तभी मैंने पयस्विनी को पहली बार देखा था, सुबह सुबह वह नहा कर आई थी, उसने सफ़ेद रंग के कसे हुए सलवार-कुरता पहने हुए थे उसके बाल गीले थे, इन सब में उसका कसा हुआ शरीर गजब ढा रहा था, उसके शरीर का एक एक उभार स्पष्ट दिख रहा था वह किसी स्वर्गिक अप्सरा के समान लग रही थी। अन्दर मेरी मां नहीं थी इसलिए उसे हम लोगों के पास आना पड़ा। जैसे ही वो मेरे पास आई, मेरी श्वास-गति सामान्य नहीं रही, जैसे ही उसने बोलने के लिए अपना मुख खोला तो उसके मुँह से पहला शब्द 'दूध' निकला। इस शब्द को बोलने के लिए उसके दोनों ओंठ गोलाकार आकृति में बदल गए जो मदन-मंदिर के समान लग रहे थे। उसकी वाणी में जो मधुरता थी, उसके तो क्या कहने ! वास्तव में उसके पिता का कोई आयुर्वेदिक इलाज चल रहा था इसलिए उसे गाय के शुद्ध दूध की जरूरत थी, एकबारगी तो मैं अचकचा गया था, परंतु पिताजी के समीप ही बैठे होने कारण मैंने अपने आपको संभाला और तुरंत अन्दर जाकर उसे दूध दे दिया।

तो यह थी हमारी पहली मुलाक़ात ! इसके बाद मैं कॉलेज चला गया, वह भी अपने कॉलेज चली गई परंतु मेरे मन उसके प्रति एक आकर्षण उत्पन्न हो गया था, हो भी क्यूँ ना, उसे देख कर मुर्दे का भी लिंग जागृत हो जायेगा, फिर मैं तो जीता जगता इंसान हूँ।

परीक्षा समाप्त होने के बाद जब मैं वापस घर आया तो इस बार मैं कुछ तैयार हो कर आया था। मेरे माता पिता थोड़े धार्मिक प्रवृत्ति के हैं अतः उन्होंने बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर हरिद्वार जाने का कार्यक्रम बनाया। वे वहाँ पर लगभग दो महीने रहने वाले थे, मेरी मां ने मुझे भी चलने के लिए कहा पर मैंने कहा कि मुझे पढ़ाई करनी है इसलिए आप लोग जाओ, मैं यहीं रहकर पढ़ूगा तो इस प्रकार मेरे माता रवाना हो गए थे।

बरसात का मौसम आने वाला था, इसलिए ज्यादातर नौकर भी अपने गाँव चले गए थे केवल एक नौकर बचा जो कि मेरा खाना बनाता था। इस प्रकार हमारे दिन निकल रहे थे। पयस्विनी रोज़ दूध लेने के लिए आती और मैं उसे दे देता था। इसी प्रकार हमारी थोड़ी थोड़ी बातचीत शुरु हुई और अब हम काफी घुलमिल भी गए थे। ऐसे ही हमें एक हफ्ता हो गया था, जमीन से सम्बंधित कोई जरूरी कागजात पर पिताजी के हस्ताक्षर बहुत जरूरी थे इसलिए पिताजी ने मुंशी जी को वो कागजात लेकर हरिद्वार बुला लिया। मुंशी जी जाने से पहले मेरे पास आये तो मैंने कहा- आप चिंता क्यों करते हैं, आप आराम से हरिद्वार जाएँ, दो दिन की ही तो बात है, पयस्विनी यहीं पर रह लेगी और उसे खाना बनाने की क्या जरूरत है, नौकर बना देगा और फिर दो ही दिन की तो बात है, आप वापस तो आ ही रहे हैं, थोड़ा बहुत मेरे साथ पढ़ भी लेगी।

इससे मुंशी जी को थोड़ी संतुष्टि मिली। फिर मैं उन्हें ट्रेन तक छोड़ने चला गया। वापस घर लौटते लौटते मुझे कुछ देर हो गई और मैं शाम को सूरज के छिपने के बाद घर पहुँच पाया और काफी थकान होने के कारण जल्दी ही मुझे नींद आ गई। अगले दिन सुबह मुझे लगा कि कोई मुझे झकझोर रहा है और उनींदी आँखों से मैंने देखा कि यह तो पयस्विनी है वो नहाने के बाद मुझे नाश्ते के लिए जगाने आई थी। पर मैं तो उसके गीले बालों, जो कि खुले हुए थे और उसके नितम्बों तक आ रहे थे, के बीच में उसके चेहरे को ही देखने में खो गया। नयन-नक्श एकदम किसी रोमन देवी के समान और स्तन और नितम्बों का विकास तो किसी पुनरजागरण कालीन यूरोपियन मूर्ति का आभास करवा रहे थे। जब उसने मुझ से दूसरी बार पूछा तब मेरी चेतना लौटी और हकलाते हुए मैंने कहा- आप यहाँ?

तो उसने कहा- रामसिंह (कुक) के परिवार में किसी का निधन हो गया है और इस कारण आज घर पर आप और मैं दो लोग हैं इसलिए नाश्ता और खाना मैं ही बनाऊँगी।

मैंने अचकचाते हुए कहा- ठीक है !और पयस्विनी के जाने का इंतजार करने लगा क्योंकि मैंने नीचे केवल अंडरवियर पहना हुआ था और अपने शरीर को कम्बल से ढका हुआ था और कम्बल नहीं हटाने का कारण तो आप जानते ही हैं, अन्दर पप्पू मेरे अंडरवियर को तम्बू बना रहा था। मैंने बैठे बैठे ही कहा- आप चलिए, मैं फ्रेश होकर डायनिंग टेबल पर आता हूँ।

तो वो जाने लगी पर जैसे ही वो मुड़ी मेरी हालत तो और ख़राब हो गई क्योंकि जब वो चल रही थी तो उसका एक नितम्ब दूसरे से टकरा कर आपस में विपरीत गति उत्पन्न कर रहे थे, ऐसा लग रहा था जैसे अपने बीच में आने वाली किसी भी चीज़ को पीस कर रख देंगे।

जैसे तैसे मैं आपको नियंत्रित करते हुए बाथरूम में पहुँचा, जल्दी से फ्रेश हुआ और नहा धोकर डायनिंग टेबल पर पहुँच गया। हालाँकि डायनिंग टेबल बिल्कुल तैयार थी पर पयस्विनी को वहाँ न पाकर मैं रसोई में गया तो देखा कि वह घुटनों के बल उकड़ू बैठी है, उसका चेहरा आगे की तरफ झुका हुआ है और वह नीचे सिलेंडर को चेक कर रही है, उसकी पीठ मेरी तरफ थी और इसलिए उसे नहीं ध्यान था कि मैं उसके पीछे खड़ा होकर उसके वस्त्रों का चक्षु भेदन कर रहा हूँ।

अब आप ही बताइए कि एक स्वस्थ युवा के लिए यह कैसे संभव है कि सामने एक अतुलनीय सुंदरी अपने नितम्बों को दिखाती हुई खड़ी हो और वो निष्पाप होने का दावा करे।

वास्तव में पाप-निष्पाप भी कुछ नहीं होता, हर घटना, हर वस्तु का केवल होना ही होता है, उसके अच्छे या बुरे होने का निर्धारण तो हर कोई अपनी अपनी सुविधानुसार करता है।

जो भी हो पयस्विनी को पहले ही दिन देख कर मेरे मन में और नीचे कुछ कुछ होने लगा था और अब जब हम दोनों अकेले थे तो मेरी इस इच्छा ने आकार लेना आरम्भ कर दिया था..

अचानक से पयस्विनी मुड़ी और मेरी आँखों से उसकी आँखें मिली तो उसने फिर अपनी आँखें लज्जावश नीचे झुका ली।

मैंने मदद के लिए पूछा तो उसने कहा- शायद सिलेंडर में गैस ख़त्म हो गई है। मैंने कहा- मैं देखता हूँ।

और मैंने नीचे झुककर जैसे ही सिलेंडर को छूने का प्रयास किया मेरा हाथ पयस्विनी के हाथ से छू गया और इस प्रथम स्पर्श ने मेरे पूरे शरीर में झुरझुरी उत्पन्न कर दी पर अभी भी जबकि इस घटना को दो वर्ष बीत गए हैं, मैं उस कोमल स्पर्श की अनुभूति से बाहर नहीं आ पाया हूँ। मैंने उससे कहा- सिलेंडर को बाद में देखते हैं, पहले नाश्ता कर लिया जाये क्योंकि बहुत जोर की भूख लगी है, कल रात को भी बिना कुछ खाए ही सो गया था।

तो उसने कहा- ठीक है।

और हम दोनों नाश्ते की मेज पर पहुँच गए। नाश्ता भी उसने बहुत ही लजीज बनाया था, पूरा नाश्ता उसकी पाक प्रवीणता की प्रशंसा करते करते ही किया और हर बार उसके चेहरे पर एक लालिमा सी आ जाती जो मुझे बहुत ही अच्छी लग रही थी।

नाश्ता करने के बाद मैं अपने कमरे में चला गया और कुछ पढ़ने लगा और पयस्विनी ने मुझे कमरे में आकर कहा कि वह भी रसोई का काम निपटा कर अपने घर चली जाएगी। उसका घर वहीं परिसर में था तो मैंने कहा- घर में तुम अकेले बोर हो जाओगी इसलिए अपनी बुक्स लेकर यहीं आ जाओ, साथ में बैठ पढ़ेंगे।

उसने कहा- ठीक है।मुझे अपने कमरे में आकर बैठे हुए अभी कुछ देर ही हुई थी कि पिताजी का फ़ोन आया और कहा- मुंशी जी भी कुछ दिन यहीं रहेंगे हमारे साथ, आखिर उनकी भी तो तीर्थयात्रा करने की उम्र हो गई है..

मैंने उन्हें नहीं बताया कि रामसिंह भी छुट्टी लेकर अपने गाँव चला गया है और घर पर हम दोनों अकेले हैं। मैं मन ही मन लड्डू फ़ोड़ते हुए एक पुस्तक खोलकर बैठ गया पर आज मन नहीं लग रहा था, थोड़ी ही देर में पयस्विनी भी अपनी पुस्तकें लेकर आ गई।

मैंने उसको अपनी ही स्टडी टेबल पर सामने की तरफ बैठने के लिए कह दिया। थोड़ी देर तक तो दोनों पढ़ते रहे पर मेरा मन तो कहीं और ही घूम रहा था इसलिए मैंने ऐसे ही उससे बातें करनी शुरु कर दी। मैंने उससे उसकी पढ़ाई के बारे में पूछा तो पता चला कि वो दिल्ली के एक प्रतिष्ठित महिला कॉलेज में पढ़ती है।

मैंने आश्चर्य से कहा- मैं भी दिल्ली में ही पढ़ता हूँ।

और इस तरह हमारा बातों का सफ़र आगे बढ़ा। मैंने उससे उसकी स्टडी के बारे में पूछा तो पता चला कि वह संस्कृत साहित्य की विद्यार्थी है और संस्कृत में बी.ए. ऑनर्स कर रही है।

शायद इसी कारण उसमे वो बात थी जो मुझे और लड़कियों में नहीं दिखती। एक अपूर्व तन की स्वामिनी होते हुए भी वह बिल्कुल निर्मल और अबोध लगती थी जैसे उसे अपने शरीर के बारे में कुछ ध्यान ही न हो।

यहाँ से मुझे ऐसे लगने लगा था कि शायद कुछ काम बन जाये। हालाँकि मैं राजनीति शास्त्र का विद्यार्थी हूँ। पर मुझे संस्कृत काफी आनन्ददायक लगती है इसलिए मैं थोड़ा-बहुत हाथ-पैर संस्कृत में भी चला लेता हूँ और बात को आगे बढ़ाते हुए मैंने कथासरित्सागर नामक एक प्राचीन संस्कृत ग्रन्थ का उल्लेख किया जो मैंने कुछ वर्ष पहले पढ़ा था, तो तुरंत पयस्विनी ने कहा- कथासरित्सागर तो अश्लील है।

मैंने इसका प्रतिवाद किया और पूछा- अश्लीलता क्या होती है?

उसने सीधा कोई उत्तर नहीं दिया तो मैंने बताया कि जिसे तुम अश्लील साहित्य कह रही हो वो हमारे स्वर्ण काल में लिखा गया था। वास्तव में प्रगतिशील समाजों में यौनानंद को लेकर कोई शंका नहीं होती है जैसे कि आज के पश्चिमी यूरोप और अमेरिका हैं। प्राचीन काल में यौनानन्द को लेकर समाज में निषेध की भावनाएँ नहीं थी, इसे एक आवश्यक और सामान्य क्रियाकलाप की तरह लिया जाता था। और इसके बाद आया हमारा अन्धकाल ! जब हमने अपने सब प्राचीन परम्पराओं को भुला दिया या हमारे उन प्राचीन प्रतीकों को पश्चिम से आने वाले जाहिल मूर्तिपूजा विरोधियों ने नष्ट भ्रष्ट करना आरम्भ कर दिया। इस प्रकार हम हमारी प्राचीन परम्परा से दूर होते गए और धीरे धीरे हम भी नाम से भारतीय बचे बाकी मानसिकता हमारी भी उन मूर्तिपूजा जाहिलों जैसी हो गई जो यौन कुंठाओं के शिकार थे, और इसीलिए हमने श्लील और अश्लील जैसे शब्दों का आविष्कार किया और कुछ गतिविधियों को अश्लीलता के कॉलम में डालकर उन्हें समाज के लिए निषेध कर दिया गया।

इस उद्बोधन का पयस्विनी पर काफी प्रभाव पड़ा और वह मुझसे कुछ-कुछ सहमत भी हो रही थी।

माहौल को कुछ हल्का करने के लिए मैंने उससे बातों बातों में पूछा- क्या तुम टेबल टेनिस खेलना जानती हो?

तो उसने हामी भरी तो हमने तय किया कि टेबल टेनिस खेला जाये। घर में टेबल-टेनिस खेलने का सारा इन्तजाम पहले से ही था क्योंकि मैं टेबल टेनिस का राष्ट्रीय खिलाड़ी हूँ तो हम दोनों ने टेबल टेनिस खेलना आरम्भ कर दिया। खेल की शुरुआत से ही मुझे लगा कि वह अपने कपड़ों की वजह से खेल में पूर ध्यान नहीं दे पा रही है क्योंकि उसकी थोड़ा बहुत इधर उधर मूव करते ही उसकी चुन्नी अस्त व्यस्त हो जाती और मुझे उसके वक्ष के दर्शन हो जाते। इस प्रकार पहला गेम मैं जीत गया।

गेम की समाप्ति के बाद मैंने उससे कहा की यदि उसे सलवार कुरते में खेलने से परेशानी हो रही हो तो मेरे शॉर्ट्स और टीशर्ट पहन सकती है तो उसने शरमाते हुए कहा- मैं शॉर्ट्स और टी शर्ट कैसे पहन सकती हूँ।

तो मैंने कहा- क्यों मैंने भी तो पहने हुए हैं!

मैंने कहा- वैसे भी यहाँ हम दोनों के अलावा कौन है जो तुम्हें शॉर्ट और टीशर्ट में देख लेगा?

तो उसने कहा- ठीक है।

और मित्रो, हम दोनों वापस मेरे बेडरूम में गए, मैंने अपने शॉर्ट्स और टीशर्ट उसको दिए।

हालाँकि वो कुछ शरमा रही थी पर मैंने उसको प्रोत्साहित करते हुए कहा- ऐसे क्या गाँव वालों की तरह बर्ताव करती हो, जल्दी से चेंज करके आओ।

तो वो मेरे बाथरूम की तरफ बढ़ गई, थोड़ी देर बाद जब वो बाहर निकली तो सफ़ेद शॉर्ट और टीशर्ट में जबरदस्त आकर्षक लग रही थी, बस टीशर्ट कुछ ज्यादा ही बड़ा था जो शॉर्ट्स को लगभग ढक ही रहा था और फ़िर मैंने मेरे पप्पू को नियंत्रित करते हुए उसे वापस टेनिस टेबल पर चलने को कहा।

अब हमने खेल पुनः आरम्भ किया, इस बार टॉस पयस्विनी जीती, उसने पहले सर्विस करने का फैसला किया और एक तेज सर्विस मेरी तरफ की।हालाँकि मैं चाहता तो उस सर्विस को वापस खेल सकता था पर मैंने जानबूझ कर उसे जाने दिया और इस ख़ुशी में पयस्विनी एकदम से उछल पड़ी जिसके कारण उसके स्तन भी उसके साथ उछले और मेरे नीचे कुछ होने लगा।

अगली बार मैंने एक तेज शोट मारा जो टेबल के बिल्कुल बाएं हिस्से पर लग कर नीचे गिर गया। पयस्विनी इस शोट को काउंटर करने के लिए तेजी से एकदम आगे बढ़ी पर गेंद काफी आगे थी और इस कारण पयस्विनी का संतुलन बिगड़ गया और वह टेबल पर एकदम झुक गई, उसने पूरी कोशिश की सँभालने की पर उसके स्तन टेबल पर छू ही गए, पयस्विनी एकदम झेंप से गई पर मैंने माहौल को हल्का बनाते हुए वापस सर्विस करने को कहा।

और इस तरह हमारा खेल चलता रहा।

इस बार मुकाबला कांटे का था, पयस्विनी भी काफी सक्रिय लग रही थी। आप तो जानते ही हैं कि टेबल टेनिस एक फुर्ती वाला खेल है और इसे खेलने वाला अगर ढंग से खेले तो पूरा शरीर कुछ ही देर में पसीने से भीग जाता है।

ऐसा ही हमारे साथ हुआ, थोड़ी ही देर में हम दोनों के कपड़े हमारे शरीर से चिपक गए थे। जैसा कि हमारे भारत में आम है कि गाँव के लोगों को बिजली की सप्लाई सरकार बहुत कम करती है, इस कारण लाइट भी थोड़ी देर में चली गई, अब जनरेटर चलने का समय तो हमारे पास था नहीं, हम खेलने में मशगूल थे, थोड़ी ही देर में मैंने तो गर्मी से परेशान होते हुए अपने टीशर्ट उतार कर रख दिया और खेलने लगे।

हालाँकि मैं खेल तो रहा था पर इस बार मेरा ध्यान टेबल टेनिस की छोटी सी गेंद पर कम और पयस्विनी की विशाल गेंदों पर ज्यादा था इसलिए इस बार का गेम मैं हार गया।

पयस्विनी की ख़ुशी मुझे उसके स्तनों के ऊपर नीचे होने से दिख रही थी।

खैर खेलते खेलते काफी देर हो गई थी और पयस्विनी काफी थक भी गई थी इसलिए मैंने कहा- चलो, अब खेल बंद करते हैं, मेरे रूम में चलते हैं, रूम में जाकर मैं बेड पर बैठ गया और पयस्विनी पास में कुर्सी पर बैठ गई।

तो मैंने कहा- यहाँ आराम से बैठो न बेड पर ! यह इस तरह परहेज रखना ठीक बात नहीं है, आखिर हम दोनों दोस्त हैं।

तो पयस्विनी भी वहीं बेड पर आकर बैठ गई।

इस तरह बैठे बैठे उसने कहा कि अब वो कपड़े चेंज कर लेती है तो मैंने कहा- क्या जरुरत है? तुम इनमें भी अच्छी लग रही हो !

तो उसने कहा कि नहीं वो चेंज करेगी और उठकर बाथरूम की तरफ जाने लगी। उसकी मंशा समझते हुए मैं फुर्ती से उठकर गया और उससे पहले बाथरूम में जाकर उसके कपड़े उठा लिए, पयस्विनी भी पीछे पीछे बाथरूम में ही आ गई और मुझसे अपने कपड़े मांगने लगी।

मैंने कहा- खुद ले लो !

जैसे ही उसने हाथ आगे बढ़ाया, मैं वहाँ से हट गया और इस तरह हमारे बीच छीना-झपटी का खेल चालू हो गया। अचानक पयस्विनी ने अपने हाथ मेरे पीछे की तरफ ले जाकर मेरा दायाँ हाथ पकड़ने की कोशिश की पर इस प्रयास में उसका दायाँ स्तन मेरे बाएं कंधे से जबरदस्त रगड़ खा गया।

अब मेरा बायाँ पाँव पयस्विनी के दोनों पैरों के बीच था, मेरा बायाँ हाथ पयस्विनी कीदाहिनी जांघ के पास उसके नितम्ब को छू रहा था और मेरे दाहिने हाथ से मैंने पयस्विनी के बायें कंधे को हल्का सा धक्का देकर बाथरूम से बाहर आ गया, पीछे पीछे पयस्विनी भी आ गई।

अब वास्तव में कपड़े लेना तो बहाना थे, हम दोनों को इस छीना-झपटी में आनन्द आ रहा था। चूंकि इन सब गतिविधियों के कारण मेरा पप्पू कुछ कुछ उत्तेजित हो गया था जो बिना टीशर्ट के शॉर्ट्स में छुपाना असंभव हो गया था, पयस्विनी ने भी पप्पू के दीदार कर लिए थे और उसकी आँखों में मुझे अब परिवर्तन नजर आ रहा था और इसी कारण अब वो भी थोड़ा ज्यादा सक्रिय होकर इस छीना-झपटी का आनन्द ले रही थी, मैं दौड़ कर बेड के ऊपर चढ़ गया था और पयस्विनी भी बेड पर चढ़ गई और मेरे हाथ से अपने कपड़े छीन लिए जैसे ही वो अपने कपड़े लेकर मुड़ी मैंने पीछे उसे पकड़ कर अपनी तरफ खींच लिया। मेरे हाथ उसके स्तनों और कमर के बीच में थे, मैंने उसे अपने बाहुपाश में कसके अपनी तरफ खींच लिया। अब उसके नितम्ब मेरी जाँघों को छू रहे थे और पप्पू अपने पूर्ण विकसित रूप में आकर में उसके दोनों नितम्बों के बीच में था। उसकी बढ़ी हुई धड़कनों को मैं साफ़ महसूस कर रहा था। शॉर्ट्स पहने हुए होने के कारण उसकी पिंडलियाँ मेरी पिंडलियों से छू रही थी और इतनी देर की उछल कूद ने हमारे अन्दर जबरदस्त आवेश भर दिया था।

उसके पेट को थोड़ा और दबाते हुए मैंने अपने मुँह को उसकी गर्दन के पास ले जाकर उसे कान में धीरे से पूछा- मैडम, वट डू यू वान्ट?

और उसने अपने दायें हाथ को पीछे ले जाकर...

कहानी जारी रहेगी।

आप अपने विचार अवश्य लिखें !

manavvaladun@gmail.com

भाभी को दौड़ा-दौड़ा कर चोदा

Posted: 19 Feb 2013 08:48 AM PST

हिंदी सेक्सी कहानियां के सभी पढ़ने वालों को मेरा तहे दिल से नमस्कार !

मेरा नाम अरमान है और मैं जयपुर का रहने वाला हूँ, उम्र 23 साल है, रंग गोरा और लम्बाई 5'4" इंच है और मेरा लंड 7" लम्बा 3" मोटा एकदम लोहे की तरह कड़क !

मैं हिंदी सेक्सी कहानियां का बहुत बड़ा फैन हूँ इस में आई हर कहानी मैं नियमित रूप से पढ़ता हूँ।

दोस्तो, यह मेरे जिंदगी की सच्ची घटना है साथ ही यह "हिंदी सेक्सी कहानियां" पर मेरी पहली कहानी है।

यह बात उन दिनों की है जब मैं बी. टेक कर रहा था, मैं शुरु से ही सेक्स का भूखा हूँ, जब भी कोई सुन्दर लड़की या सुन्दर भाभी को देखता था तो मन करता था कि इसे पकड़ कर चोद डालूँ !

हमेशा से मैं किसी लड़की या भाभी की तलाश में रहता था जो मेरे साथ सेक्स करे लेकिन कोई मिलती नहीं थी।

जब मैं बी. टेक कर रहा था तो एक किराये का कमरा ले रखा था उस मकान में दूसरा कोई किरायेदार नहीं था।

उसमें सिर्फ मकान मालिक, उसकी बीवी, एक बेटी जो 16 साल की थी और उसका एक लड़का जिसकी शादी दो साल पहले हो चुकी थी। लड़की का नाम प्रिया था और भाभी भी कमाल की माल थी।

दो साल शादी को हो चुके थे मगर कोई बच्चा नहीं था। मैं तो प्रिया से ज्यादा भाभी पर लाइन मारने लगा। कयूंकि भाभी की गाण्ड, कमर और दो चूचियाँ गजब की क़यामत ढा रहे थे।

वह साड़ी में तो और सुंदर लगती थी, मैं तो कई बार भाभी को देख कर ही मुठ मार चुका था।

अब मैं आहिस्ता-आहिस्ता भाभी से दोस्ती बढ़ाने लगा था।

भैया सुबह 9 बजे काम पर जाते थे और रात 8-9 बजे तक आते थे। वह अपनी कम्पनी की मार्केटिंग का काम करते थे।उनके जाने के बाद जब मौका मिलता हम दोनों कभी कभी बात कर लेते थे।

एक दिन की बात है कि मैं देर रात तक अपने लैपटॉप पर कुछ नेट पर काम कर ने की वजह से जगा ही रह गया। तभी मैं उठा और बाथरूम के लिए।

कमरे से निकला, मैं जब बाथरूम के दरवाजे के पास गया तो देखा कि कोई अंदर है और दरवाजा थोड़ा खुला हुआ था। तभी मैंने देखा कि भाभी एक लम्बा बैंगन को अपनी चूत में अंदर-बाहर कर रही थी, अपनी चूची को खूब दबा रही थी और हल्की हल्की सिसकारी ले रही थी।

मैंने नजर दौड़ाई तो देखा कि घर के सारे लोग सो गए थे। अब तो मैं छुप कर भाभी की बैंगन-चुदाई देखने लगा मगर भाभी अपनी चुदाई में मदहोश थी, उनको जरा भी पता नहीं चला कि कोई देख रहा है।

कुछ देर बाद जब मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने दरवाजा खोल दिया, तब भाभी मुझे देख कर एकदम डर गई, मैं कुछ देर तक उनको देखता रहा, फिर अपने कमरे में आ गया अपना लंड को हिलाने लगा।

तभी भाभी मेरे कमरे में आई और बोली- तुम जो भी देख कर आए हो, किसी को मत बताना ! और इस के बदले में तुम जो कहोगे मैं मानूँगी।

फिर वह मेरे पास आकर मुझसे लिपट गई और मेरे होंट को चूसने लगी, फिर बोली- कोई जग गया तो मुसीबत हो जाएगी, हम फिर कभी करेंगे !

और चली गई।

उसके जाने के बाद उस रात में मैंने 3 बार मुठ मारी थी भाभी के नाम की !

"कहते हैं न कि भगवान सबको सब कुछ नहीं देता है !"

उसी तरह भाभी ने मुझे दूसरे दिन पूछने पर बताया- आपके भैया मुझे खुश नहीं कर पाते हैं, इसलिए मैं बैंगन या केले से अपनी चूत की प्यास बुझाती हूँ। भगवान ने मुझे सब कुछ दिया नाम, पैसा, दौलत लेकिन अच्छा पति नहीं ! मुझे बहुत तमन्ना है कि मुझे भी एक बच्चा होता !

और वह रोने लगी।

तो मैंने कहा- भाभी, आप फिकर मत करो, मैं आपका साथ दूँगा, मैं आपके जिस्म की प्यास बुझाऊँगा और औलाद की चाहत पूरी करूँगा। लेकिन इसके लिए मौका मिलेगा कब?

भाभी बोली- आपके भैया और पापा-मम्मी को दो दिन बाद एक रिश्तेदार के घर शादी में तीन दिन के लिए जाना है और घर पर मैं और प्रिया रहेंगे। जब प्रिया कॉलेज चली जाएगी तब हम दोनों अपना खेल खेलेंगे।

मैंने कहा- ठीक है भाभी, ऐसा ही करेंगे।

मैं दो दिन बीतने का इन्तजार करने लगा।

फिर दो दिन बीतने के बाद ठीक वैसा ही हुआ, भैया और उनके पापा मम्मी दिन के 9 बजे घर से चले गए और उनके जाने के बाद प्रिया भी अपने कॉलेज चली गई।

मैं तो मन ही मन खूब खुश था कि आज भाभी की जम कर चुदाई करूँगा और अपनी लंड की प्यास पहली बार बुझाऊँगा।

यह सब सोच कर मेरा तो बुरा हाल हो रहा था।

तभी भाभी मेरे कमरे में आई और बोली- सारे लोग चले गए, तुम मेरे कमरे में आ सकते हो।

तभी मैंने उठ कर भाभी को गले से लगा लिया और फिर उनके होंठ चूसने लगा, भाभी भी खूब साथ दे रही थी मेरा, कम से कम 5 मिनट तक यह चलता रहा, फिर भाभी अपने कमरे में चली गई।

तब मैं भी अपने सारे कपड़े उतर कर एकदम बिल्कुल नंगा उनके कमरे में चला गया और बोला- भाभी, यह जिस्म आपके लिए है।

भाभी मेरा लंड देख कर दंग रह गई- अरे इतना बड़ा और मोटा?

और आकर मेरे लंड से खेलने लगी, लंड को तो खूब गप गप मुंह में लिए जा रही थी।

तभी मैं भाभी के कपड़े उतारने लगा और कुछ ही पल में बिल्कुल नंगी कर दिया। मैं पहली बार किसी लड़की या औरत को नंगा देख रहा था।

मैं भाभी के प्यारे-प्यारे दोनों संतरे मसलने लगा और निप्पल चूसने लगा।

एक बार मैं फिर बता दूँ कि भाभी बहुत ही सुन्दर थी और मानो वह हुस्न की परी हो।

मैंने भाभी को बिस्तर पर लिटा दिया और चूत चाटने लगा 69 की अवस्था में और वो मेरे लंड को खूब चूसे जा रही थी, मैं अपने लंड को उनके मुँह में खूब पेले जा रहा था और साथ ही उसके चूत में अपनी जुबान पेले जा रहा था।

इस बीच भाभी एक बार झड़ गई।मैं भाभी से बोला- क्या मैं आपकी मालिश कर दूँ?

तो बोली- ठीक है, पहले बाथरूम से मूत कर आती हूँ, फिर क्रीम से मसाज कर देना।

मैंने कहा- ठीक है !

और बाथरूम मैं भी साथ चला गया, मैंने कहा- भाभी, आप खड़ी होकर मूतो ! मैं देखना चाहता हूँ।

और मैं भाभी की चूत के लबों को दोनों तरफ से फैला दिया और सारा मूत गिरने लगा। यह देख कर मुझे बहुत मजा आ रहा था और अपने हाथों से मूत के साथ-साथ चूत भी मसल रहा था।

फिर मैंने कहा- भाभी, मुझे भी मूतना है !तभी भाभी मेरा लंड पकड़ कर अपने मुँह में लेकर बोली- आज तुम्हारा मूत पीना है मुझे।

और सारा का सारा मूत गटक गई।

फिर हम दोनों कमरे में आ गए।

फिर मैंने भाभी की मालिश करनी चालू की, पहले तो उनकी चूचियों को खूब मसला, फिर उनके सारे जिस्म की मालिशकरने लगा तो वह तड़पने लगी और सिसकारी भरने लगी।

और मैं फिर उनकी चूत की भी खूब अच्छी तरह दोनों हाथों से मालिश करने लगा तो वो ओह आह...उहं... करने लगी और बोलने लगी- अब बस कर, अब बर्दाश्त नहीं होता, जल्दी से अपना लंड मेरी चूत में डाल और मेरी चूत को पेल-पेल कर फाड़ डाल ! जल्दी कर !

मैंने वैसा ही किया, भाभी दोनों पैरों फैलाया और उनकी चूत में अपना लंड घुसेड़ दिया।भाभी एकदम सिकुड़ गई, मानो कि मेरा पूरा शरीर उनकी चूत के अंदर घुस गया हो।

वह कराहने लगी और बोली- रुको !

फिर हम कम से कम दो मिनट तक रुके रहे, जब लगा कि दर्द कुछ कम हुआ तो आहिस्ता-आहिस्ता अपने लंड को अंदर-बाहर करने लगा और भाभी भी अब खूब मजे ले लेकर चुदने लगी।

मैं भी पहली बार चोद रहा था, अपने लंड की प्यास बुझा रहा था, मुझे बहुत मजा आ रहा था।

भाभी बोले जा रही थी- चोदो मुझे ! और जोर जोर से चोदो ! फाड़ दो मेरी चूत को ! तुम्हारे भैया तो फाड़ नहीं सके, तुम फाड़ दो मेरे राजा !

इस बीच भाभी दो बार झड़ चुकी थी और उनकी बुर एकदम लाल हो चुका थी।

और मैं भी तेजी से चोदे जा रहा था, तभी भाभी और मैं एक बार फिर झड़ गए और एक दूसरे से लिपटे रहे।

फिर 20 मिनट के बाद भाभी उठ कर मेरा लंड चूसने लगी, इस तरह दूसरा दौर चला। इस बार तो मैंने भाभी को कमरे से लेकर पूरे घर में दौड़ा-दौड़ा कर चोदा और हम दोनों खूब चुदाई करते रहे।

घर में कोई जगह नहीं बची थी जहाँ हम दोनों ने तरह-तरह के आसनों में चुदाई न की हो, पूरा घर फच-फच की आवाज से गूंज रहा था और मैं लगातार चोदे जा रहा था।

पता नहीं भाभी क्या क्या बड़बड़ा रही थी, मैं लगातार धक्के पे धक्के पेले जा रहा था और भाभी आह्ह उह औछ्ह् करते हुए झड़ गई, उनकी चूत से पानी निकलने लगा, फिर मैं और स्पीड से चोदने लगा।

मैं पाँच मिनट के बाद भाभी की चूत में ही झड़ गया, मैंने अपना सारा रस भाभी की चूत में ही डाल दिया।

करीब दस मिनट तक मैं उन्ही के ऊपर लेटा रहा फिर हम दोनों जाकर एक साथ स्नान करने लगे तो फिर से मेरा लंड खड़ा होने लगा।

तो भाभी बोली- अब कल करेंगे, प्रिया के आने का वक्त हो गया है।

हम दोनों ने नहाने के बाद खाना खाया और अपने अपने कमरे में चले गए।

मेरी यह सच्ची कहानी आपको कैसी लगी, आप मुझे मेल जरूर करना !

आपका अरमान !

khan_arman69@yahoo.com

साली की चुदाई -1

Posted: 19 Feb 2013 08:35 AM PST


मेरा नाम हैरी है, उम्र 28 साल है, जालंधर का रहने वाला हूँ। यह मेरी सच्ची कहानी है कि मैंने कैसे अपनी साली की चुदाई की।

बात उन दिनों की है जब मैं अपनी पत्नी की मामी के घर पटना गया था। उनकी एक लड़की है वो मुझसे बहुत बातें और मजाक करती थी। उसका नाम है सुप्रिया।

तब उसकी उम्र 18 साल की थी, नई नई जवान हो रही थी। वैसे वो बहुत ही सेक्सी थी, मस्त फिगर थी 30-32-30, उसकी चूचियाँ मस्त छोटे छोटे अनारों की तरह थी।

वैसे मेरे मन में उसके लिए कोई गलत भावना नहीं थी पर एक रात जब मैं सो गया तो वो मेरे ही पास में आकर सो गई। जब मैंने रात को करवट बदली तो देखा कि वो मेरे साथ सो रही है। यह देख कर मैं हैरान हो गया।

उसके बाद मुझे नीद नहीं आ रही थी। फिर मैंने धीरे से उसकी चूची पर हाथ रख दिया। क्या मस्त चूची थी उसकी ! एकदम गोल-गोल !

उसे छू कर मेरा लण्ड खड़ा हो गया और मैंने फिर धीरे-धीरे उसकी कमीज़ के अन्दर हाथ डालना चालू किया तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और कहने लगी- नींद नहीं आ रही है क्या?

मैंने कहा- नहीं !

मैं बार-बार उसकी कमीज के अन्दर हाथ डालता और वो हटा देती।

सारी रात ऐसा ही हुआ। मैंने उसे सारी रात परेशान किया और उसने मुझे !

उसने मुझे सिर्फ उसकी चूचियाँ ही दबाने दी और बीच बीच में मैं उसको चूमता भी रहा। और कोई चारा भी नहीं था मेरे पास क्योंकि उसकी माता जी हमारे बिस्तर से कुछ दूरी पर ही सोई हुई थी इसलिए मैं उस रात कुछ ज्यादा नहीं कर पाया, बस उसकी चूची और चुम्मी से ही मुझे गुजारा करना पड़ा।

कुछ दिनों बाद मैं वापस अपने घर आने वाला था तो उसने कहा- मैं भी दीदी से मिलने आपके साथ घर जाना चाहती हूँ !

मैंने कहा- अपनी मम्मी से पूछ लो ! शायद वो मना करें !

पर उसकी मम्मी ने मना नहीं किया जाने के लिए !

मेरी तो जैसे लाटरी लग गई और मैं और वो चलने की तैयारी करने लगे।

अगले दिन हम ट्रेन से पटना से जालंधर आने लगे। हमारी एक ही बर्थ कन्फर्म हुई थी और एक वेटिंग थी।

दिन जैसे-तैसे गुजर गया, जब रात हुई तो हम दोनों एक ही बर्थ पर लेट गए। ऊपर वाली बर्थ थी हमारी !

अब रात को चैन कहाँ थी दिल में?

उसके बदन की नजदीकी से उसे छूने, कुछ कर गुजरने की कामना उछालें मार रही थी।

हम दोनों साथ-साथ तो लेटे हुए थे ही, मैं उसकी चूचियाँ दबाने लगा और धीरे-धीरे उसकी चूत तक अपना हाथ ले गया। उसने कोई आपत्ति नहीं की।

थोड़ी ही देर में उसकी सलवार गीली गीली सी लगने लगी थी, उसकी चूत से पानी निकल रहा था, वो भी पूरी गर्म ही गई थी चुदवाने के लिए पर क्या करते, ट्रेन में कैसे चुदाई कर सकता था मैं !

अगले दिन हम जालंधर पहुँच गए।

मेरी पत्नी अपनी बहन से मिल कर बहुत खुश हुई और सारा दिन उससे बातें करती रही, रात को भी मुझे घर में चुदाई करने का कोई भी मौका नहीं मिला।

मुझे एक योजना सूझी, मैंने सुप्रिया को बोला- चलो, कहीं घूमने चलते हैं।

सुप्रिया तैयार हो गई।

मैंने पूछा- कहाँ जाने का मन है?

सुप्रिया बोली- जीजाजी, शिमला का बहुत नाम सुना है, शिमला घूमने की इच्छा है। कितनी दूर होगा?

मैंने कहा- काफ़ी दूर है। बस से चलते हैं।

मैंने अपने पत्नी से कहा- तुम भी चलो !

पर उसने कहा- नहीं ! आप दोनों चले जाओ, मैं नहीं जाऊँगी।

फिर मैं और सुप्रिया मोटर-साइकिल से चल दिए। सुप्रिया मेरी पीछे मेरी कमर पकड़े बैठी थी, उसकी चूचियाँ मेरी पीठ पर गड़ रही थी, मुझे बहुत मजा आ रहा था !

फिर मैंने मोटर-साइकिल स्टैंड में जमा करा दी और बस से शिमला चले गए। बस में भी हम मस्ती करते जा रहे थे। शिमला पहुँच कर हमने एक कमरा बुक करवाया और शाम को घूमने चले गए।

फिर रात को खाना खाने के बाद हम कमरे में आ गए।

आज इतने दिनों बाद सुप्रिया को पेलने की मेरी मनोकामना पूरी होती दिख रही थी।

सुप्रिया ने कहा- जीजाजी, आप थक गए होंगे, दीजिये आपके पैर दबा दूँ।मैंने कहा- नहीं, रहने दो ! तुम भी तो थक गई होगी।

सुप्रिया मुस्कुरा दी और वो मेरे पैर दबाने लगी।

सुप्रिया ने कहा- जीजाजी, पैंट उतार दो, दबाने में दिक्कत हो रही है।

मैंने कहा- तुम ही उतार दो।

मैंने अपनी पैंट खोल दी और सुप्रिया ने उसे खीच कर मेरे पैरों से जुदा कर दिया।

अब मैं सिर्फ अंडरवीयर में था, सुप्रिया मेरी टाँगें दबा रही थी और मेरा लण्ड अंडरवीयर में एकदम तना खड़ा था।

सुप्रिया बार-बार जानबूझ कर पैर दबाते दबाते मेरे लण्ड को छू लेती जिससे मेरा लण्ड और फर्राटे मारने लगता और वो मुस्कुरा देती।

तब मैंने कहा- चलो छोड़ो ! सो जाओ।

और हम दोनों सोने लगे। उसने मेरी कमर पर अपनी टाँग रख दी और मुझसे लिपट कर सोने लगी।

मैंने कहा- यह क्या कर रही हो?

उसने कहा- जीजाजी, मैं तो ऐसे ही सोती हूँ ! अपने घर में भी और दीदी को भी ऐसे ही पकड़ कर सोती हूँ !

मैंने कहा- ठीक है !

फिर मैं धीरे-धीरे उसके चूचे दबाने लगा, वो कुछ नहीं बोल रही थी, उसे भी अच्छा लग रहा था।

उसने कहा- सो जाओ जीजा जी !

मैंने कहा- अब नींद किसे आएगी मेरी साली जी !

और मैं जोर-जोर से उसकी चूचियाँ दबाने लगा। वो धीरे-धीरे गर्म होने लगी थी। मैंने उसकी कमीज़ उतार दी और अब वो मेरी सामने सिर्फ ब्रा में थी।

कहानी जारी रहेगी।

harrybaweja_83@rediffmail.com

मदहोश बरसात में चुदाई

Posted: 19 Feb 2013 08:23 AM PST

मैं दिल्ली का रहने वाला हूँ और दिखने में स्मार्ट हूँ।

बात उन दिनों की है जब मैं कॉलेज में पढ़ता था, 2-3 लड़कियों से मेरा चक्कर हमेशा रहता था लेकिन तब तक किसी को चोदा नहीं था, बस चूमना, चूची दबाना बस इतना ही किया था।

उन दिनों मेरे कॉलेज में एक लड़की आई जिसका नाम था शोभा ! दिखने में ठीक थी लेकिन उसके चूचे बहुत मस्त थे, 34 इन्च के होंगे उस के, कोई भी लड़का देख कर पागल हो जाये।

लेकिन थी वह भी चालू ! गहरे गले के कपड़े पहनती जिससे उसकी चूचियाँ दिखें और लड़के उसके पीछे पागल हो जायें।

सब लड़के उससे पटाने और चोदने के लिए सोचने लगे लेकिन मैंने उस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया।

कॉलेज की फ्रेशर पार्टी होने वाली थी, हमेशा की तरह मेरे ग्रुप ने ग्रुप-डांस में हिस्सा लेना था लेकिन एक डांस पार्टनर की कमी पड़ गई और हमने कॉलेज मैनेजमेंट को मना कर दिया कि हम डांस नहीं कर पायेंगे। हमारा ग्रुप-डांस हमेशा फर्स्ट आता था तो इसलिए मैनेजमेंट ने कहा कि वे पार्टनर का इन्तज़ाम कर देंगे और दो दिन बाद जब हम डांस के लिए जा रहे थे उस समय मुझे अध्यापक ने बुलाया और शोभा को दिखाते हुए कहा- यह तुम्हारी नई डांस पार्टनर है।

मैंने हाँ कर दी और वो हमारे साथ डांस अभ्यास करने लगी। मैंने देखा कि वो मुझमें ज्यादा ही रुचि ले रही है।

एक दिन बहुत जोर की बरसात हो रही थी और सब कॉलेज के दरवाज़े के पास बरसात के रुकने का इंतजार कर रहे थे, मैं पार्किंग में गया और कार स्टार्ट की। तभी किसी ने कार के शीशे पर खटखटाया, मैंने देखा कि वह शोभा थी।

उसने कहा- बाहर बहुत बारिश है और सड़क पर बहुत पानी है, क्या तुम मुझे ऑटो स्टैंड तक छोड़ दोगे? वहाँ से मुझे ऑटो मिल जाएगा घर तक के लिए।

मैंने कहा- ठीक है।और मेरे साथ बैठ गई। मेरी कार के शीशी काले होने की वजह से मैंने उन्हें पूरा बंद नहीं किया। हम बात करने लगे, थोड़ी दूर एक जगह पर बहुत पानी था तो मैं अपनी कार धीरे धीरे निकालने लगा।

तभी एक बाइक वाला बहुत तेज़ आया शोभा की तरफ से और काफी पानी कार के अंदर शोभा पर गिर गया और वो बचने के लिए मेरी गोद में आ गई जिससे उसकी चूचियाँ मेरे लंड को छू गई।

मेरा लण्ड लगा सलामी देने ! मेरी पैन्ट तम्बू बन गई।

वो हंस कर बोली- यह क्या हुआ?

मैंने कहा- यह मदहोश हो गया तुम्हारी जवानी के छूने से।

लेकिन शायद उसके मन में कुछ अलग ही था, वो तपाक से बोली- मुझे कब मदहोश करोगे?

और मेरे लण्ड पर हाथ रख दिया।

मैंने कहा- रानी, यह जगह और मौका सही नहीं ! वक्त आने दो, सब कर दूँगा।

शायद वो भी चुदने के लिए तड़प रही थी।

लेकिन वो बोली- ले चलो जहाँ ले चलना है।

और मैंने कहा- ठीक है।

हम शहर से बाहर निकलने वाली सड़क पर आ गए, उसने मेरे लंड पर हाथ लगाते हुए कहा- आपने बताया नहीं कि यह मदहोश कैसे करता है?

मैंने देर न करते हुए जिप खोल दी, मेरा 7.5 इंच का लंड बाहर आ गया और मैंने उस का हाथ उस पर रख दिया और कहा- चूसो इसे ! एक-दो बार तो उसने मना किया लेकिन फ़िर वो साली चूसने लगी और इतना मस्त चूस रही थी कि पता नहीं कितनों का चूस चुकी है।

चूस चूस कर मेरे लण्ड को लाल कर दिया और लम्बा कर दिया।

मेरा लंड भी मानो इतने प्यार से पेश आ रहा था कि क्या बताऊँ !

करीब दस मिनट चूसने के बाद मुझे ऐसा लगने लगा कि मैं झड़ने वाला हूँ तो मैंने उसके सर को जोर से पकड़ लिया और पूरे लंड को उसके गले तक डाल दिया और सारा माल उसके मुँह में निकाल दिया और वो मलाई समझ कर सारा गटक गई।

फिर कार मैंने एक कच्चे रास्ते पर उतार दी और थोड़ा आगे जाकर कार रोक दी और पिछली सीट पर आकर उसके होंठों को चूसने लगा। उसके होंठ बिल्कुल गुलाब की तरह नर्म और गुलाबजामुन से भी ज्यादा मधुर थे।

साथ साथ मैं उसकी चूची भी दबा रहा था और वो आहें ले रही थी और पागलो की तरह मुझे किस कर रही थी।

उसके बाद पहले मैंने उसकी टीशर्ट और ब्रा अलग की, जब उसकी नंगी चूचियों को देखा तो पागल हो गया।

मैं उसकी चूची को लगा मसलने और उसका दूध पीने इस तरह उसे खूब गर्म कर दिया, वो पागलों की तरह मेरे लंड को मसल रही थी और कह रही थी- फ़क मी ! फ़क मी !

मैंने कहा- जान अभी तो बहुत मज़ा लेना है।

और 69 की अवस्था में आते हुए उसकी पैन्ट खोल कर चूत को चूसने लगा। क्या मस्त चूत थी उसकी, मस्त खुशबू आ रही थी।

चूसते हुए मैंने चूत का दाना भी रगड़ खाया। एक मीठी सी सिरहन हुई और उसके मुँह से आह आह्ह।

उसकी चूत गीली हो गई थी, मैं समझ गया कि अब देर नहीं करनी चहिये। मैंने उसे कहा- साली तू एकदम चिकनी घोड़ी है, कितना मजा आ रहा है तुझे?

इस बीच मैं पानी छोड़ रही चूत को अपनी जीभ से चाटने लगा।

बोली- भेनचोद, अब मत तड़पा, चोद दे ! चोद दे !!! नहीं तो कोई आ जायेगा।

फिर मैंने कहा- तेरी भोसड़ी मारूँ, तू तो मस्ती से भरी हुई है।

मस्ती से उसकी आँखें बंद हो रहीं थी।

मैंने उसकी चूत को चूमा और फिर वहीं उसकी टाँगें फैला दी और बीच में बैठ अपना लौड़ा उसकी चूत पर टिका दिया और धक्का मारा !मानो उसकी चूत में घोड़े का लौड़ा घुसा दिया हो, ऐसे चिल्लाई वो- हाय मर गई मैं !

वो अब मुझे कस कर जकड़ कर अपने चूतड़ धीरे धीरे ऊपर नीचे करके मेरा लण्ड अपनी चूत में अन्दर-बाहर कर रही थी।

"हां राजा बहुत मजा आ रहा है, बस किये जाओ स्सीईईइ आह्ह्ह स्स्सीईईईईइ आह्ह्ह्हस्ससीईइ आह्ह !"

कुछ ही देर में आवाजें फ़चाक फ़चाक में बदल गई। उसकी चूत दो बार पानी छोड़ चुकी थी।

वो बोली- बस करो... बस करो... आज मार डालोगे क्या?

मैंने कहा- अभी मेरा पानी नहीं निकला, मैं क्या करूँ?

और मैं धक्के मारता जा रहा था, मेरा पानी निकलने वाला था, मैंने पूछा- कहाँ निकालूँ?

उसने कहा- मेरे मुँह में !

फिर मैंने उसकी चूत से लंड निकाल कर मुँह की तरफ़ किया, करीब दो मिनट की चुसाई के बाद उसके मुँह में ही झड़ गया और वो मेरा सारा माल निगल गई और चूस चूस कर मेरा लंड साफ़ कर दिया।

उसके बाद मैं काफी बार उससे मिला और उसकी खूब चुदाई की।

तो दोस्तो, यह थी मेरी पहली कहानी है। मुझे मेल जरूर करें और बताएँ कि मेरी कहानी कैसे लगी...

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बॉस को खुश करने के लिए चुदाई

Posted: 19 Feb 2013 07:35 AM PST


कई साल पहले की बात है मेरे पति वरुण ने मुझसे पूछा- क्या तुम मेरे साथ नागपुर जाना चाहोगी?

उनको अपने जॉब के किसी काम से ही वहाँ जाना था। मैंने ख़ुशी खुशी हाँ कर दी, इस बहाने मैं भी घूम सकती थी।

हम दोनों ट्रेन से नागपुर पहुँचे। स्टेशन पर हमको लेने एक कार आई थी। मेरे पति ने बताया कि यह कार उनके सी.ए. ने भिजवाई है।

कार से हम एक पाँचसितारा होटल में आ गए। होटल का नाम मैं गुप्त रखना चाहती हूँ क्योंकि इससे होटल की बदनामी हो सकती है। हम करीब 4 बजे दोपहर तक होटल में आ गए थे। फिर वरुण ने बताया कि शाम को उनको अपने बॉस से नागपुर के एक क्लब में मिलना है। मुझे उन्होंने अच्छी तरह से तैयार होने को कहा।

मैंने गुलाबी रंग की एक बहुत बढ़िया साड़ी पहनी और उनके साथ क्लब गई। क्लब में वरुण का बॉस और सी.ए. दोनों मिले। उनके साथ वरुण ने मेरा परिचय करवाया और फिर हम चारों एक मेज़ पर बैठ गए। मेरे एक तरफ इनका बॉस था और दूसरी तरफ वरुण खुद थे।

इनके बॉस ने पूछा मुझसे- आप क्या ड्रिंक लेंगी?

मैंने थोड़ी आनाकानी और उनके जिद करने पर कह दिया- मैं बकार्डी ले लूँगी।

मैंने कभी एक बार बकार्डी पी थी, इसमें बहुत कम अल्कोहल होता है, वो अच्छी लगी थी। पर जब यह बकार्डी आई तो यह तो हार्ड ड्रिंक जैसी थी। पर अब मैं कैसे मना करती, मैंने ही तो कहा था।

बॉस ने कहा भी कि मेरी पसंद बहुत हाई है और तारीफ़ भी की।

अब ड्रिंक्स चल रही थी और सब थोड़ा थोड़ा बेतकल्लुफ़ भी होते जा रहे थे। थोड़ी हंसी मजाक होते होते फ्लर्टिंग में बदल रही थी।

मैंने भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया तो वे और उत्साहित हो गए। इसी बीच मेरे पति यानि वरुण वाशरूम के लिए गए तो उनकी सीट पर वो सी.ए. साब आकर बैठ गए, वरुण आया तो खाली कुर्सी में बैठ गया। अब मेरे आजू-बाजू इनका बॉस और सी.ए. हो गए। इनका बॉस एक बहुत ही खूबसूरत 6 फुट का जवान था। उसकी उम्र करीब 26-27 ही होगी। मैं भी 28 की थी। सी.ए. की करीब 35-36 होगी। वह भी आकर्षक तो था पर व्यक्तित्व में बॉस से कम ही था। बॉस तो ऐसा था कि कोई भी महिला पिंघल जाए उसकी बाँहों में।

मुझे ऐसी कोई उम्मीद नहीं थी कि उनकी भी मुझ पर नज़र है। पर मैंने महसूस किया की बॉस ने मेज के नीचे नीचे ही मेरे पैर पर अपने पैर से थोड़ा सा दबाव बनाया। मैं जब चुप रही तो दुबारा किया। मैंने भी जवाब दिया पैर से ही। मुझे ऐसा करने में बड़ी गुदगुदी हो रही थी, मज़ा आ रहा था। अब बॉस थोड़ा आगे बढ़े और अपने घुटने को मेरे घुटने से रगड़ने लगे। ऊपर से सब सामान्य दिख रहा था। थोड़ी देर मेरी रेशमी साड़ी पर ही उनके घुटने की रगड़ बहुत आनन्दित कर रही थी। मेरी ओर से भी उनको बराबर जवाब मिल रहा था, मैं भी अपनी टांग उनसे चिपका रही थी।

अब मेरी बारी आई चोंकने की। हुआ यह कि बॉस ने अपना दायां हाथ अचानक मेरी जांघों के बीच में रख दिया। मेरे हाथ का गिलास गिरते गिरते बचा। बॉस का यह हाथ मेरी जांघों के बीच में धंसता जा रहा था और मेरी योनि के उभार को छू रहा था। मैं तो काम्पने जैसी हालत में थी। उधर मेरी योनि में खलबली मच रही थी और वो गीली होती महसूस हो रही थी।

थोड़ी देर तक जब किसी ने नोटिस नहीं किया तो मैंने भी अपना बाया हाथ नीचे ही नीचे बॉस के लण्ड पर पैंट की ज़िप के ऊपर रख दिया। बॉस का लण्ड गरम और कड़क हो चुका था। पता नहीं कैसे सी.ए. की नज़रों ने हमारी यह हरकत पकड़ ली और वो भी चालू हो गया। उसने मौका देखा और बॉस का हाथ वहाँ से हटते ही अपना हाथ मेरी चूत पर धर दिया।

मुझे लगा कि आज तो कुछ गजब ही हो रहा है, मेरी चूत से जैसे अब पानी बहने लग जायेगा। ऐसा तो मैंने कभी सोचा भी नहीं था। खैर अब ड्रिंक्स के बाद डिनर भी जल्दी ही हो गया और बॉस अपनी कार से हमको होटल छोड़ने आये। वहाँ पर एक कमरा हमारे बगल का ही सी.ए. के लिए था। वो भी साथ में आये। ऊपर आकर मैं तो अपने कमरे में आ गई गुडनाईट कह कर, वे तीनो सी.ए. के कमरे में बैठ गए, मुझे बताया कि अभी वे कुछ काम भी करेंगे और अभी ड्रिंक्स भी कम रह गई है तो थोड़ा और पियेंगे।

मैंने साड़ी उतारी, ब्रा और पैंटी भी उतर दी और नाईटी पहन कर लेट गई क्योंकि मैं ख्यालों से ही कुछ मज़ा लेना चाह रही थी।

मैं आँखें बंद करके सोने की मुद्रा में लेटी हुई थी कि वरुण मेरे कमरे में आया, उसी के लिए दरवाज़ा भी लॉक नहीं किया था।

मैंने आँख नहीं खोली तो उसने सोचा कि मैं सो रही हूँ। उसने अपनी ज़िप खोल कर अपना कड़क लण्ड मेरे चेहरे पर रगड़ना शुरु किया। मैं चुपचाप मज़ा लेती रही। अब उसने अपने लण्ड को मेरे होंटों पर रख दिया। मैं इतने गरम स्पर्श से आनंदविभोर होती जा रही थी। अब मुझसे भी नहीं रहा गया, मैंने जैसे ही आँखें खोली तो अवाक् रह गई।

मैंने डरते हुए कहा- वरुण आ जायेगा।

वह वरुण नहीं बॉस था, वे बोले- वो इतनी पी गया है कि कल तक भी होश में नहीं आएगा, तुम निश्चिन्त होकर चुदने का मज़ा ले सकती हो।

मुझे क्या मालूम था कि मैं जो सपना बुन कर आनन्दित होना चाह रही थी वो सब सच ही होने वाला था।

मैं फिर भी डर रही थी, तो बॉस ने कहा- सी.ए. वरुण के साथ बैठा है, वो नहीं आएगा, तुम चिंता मत करो।

मैं भी निश्चिन्त हो गई और इस खूबसूरत मर्द से चुदने का मज़ा लेना चाहती थी इसलिए फट से तैयार हो गई और लिपट गई उसकी बाँहों में।

उसने मुझे अपना लण्ड मेरे हाथ में थमाया। बाप रे ! क्या साइज़ था- 7" से ज्यादा ही होगा। मैंने उसके लिए जल्दी से अपनी नाइटी ऊपर की और बिस्तर पर लेट कर टाँगे चौड़ी कर दी।

बॉस ने कोई देरी नहीं की और मेरी चूत पर अपना फनफनाता लण्ड टिका कर एक धक्का लगाया और लण्ड पिस्टन की तरह अन्दर तक धंस गया।

मुझे हल्का सा दर्द तो हुआ क्योंकि यह लण्ड कुछ ज्यादा ही मोटा था। पर जैसे जैसे उसने बाहर-भीतर, बाहर-भीतर पेलना शुरु किया तो भारी मज़ा आने लगा, मैं भी नीचे से अपने चूतड़ उछाल उछाल कर पूरा लण्ड अन्दर लेने की कोशिश कर रही थी। फच-फच की आवाज़ें आने लगी और में आआह्ह ऊउह्ह कर रही थी, सिसकारियाँ भर रही थी।

4-5 मिनट तक इसी तरह चोदने के बाद उसने मुझे घोड़ी की अवस्था में मेरे दोनों पैरों और हाथों पर खड़ी किया और पीछे से मेरी चूत को हाथ से टटोल कर उसमें अपना लण्ड घुसेड़ दिया और चूत में लगा धक्के मारने।

मेरी चूचियाँ हवा में उछलकूद कर रही थी और वो मेरी कमर अपने दोनों हाथों से पकड़े हुए पूरा लण्ड पेलते हुए अन्दर-बाहर कर रहा था, मुझे परम सुख मिल रहा था।

तभी मैंने देखा कि वो सी.ए. मेरे मुँह के सामने खड़ा है और मेरी जुल्फें, मेरे लम्बे बालों को चेहरे से हटा कर अपना लण्ड मेरे मुँह में घुसाने की तैयारी में था।

मैंने कहा- मैं यह नहीं करुँगी !

पर वो नहीं माना और मुझे भी यह स्वाद चखने की इच्छा हो गई।

अब पीछे से बॉस जब धक्का मारता तो आगे दूसरा लण्ड मेरे हलक तक घुस जाता। सी.ए. मेरे बालो से खेल रहा था। फिर दोनों ने अपनी अपनी जगह बदल ली और फिर दोनों ने जम कर मुझे चोदा।

मैं इतने जोर से झड़ी और इतना पानी चूत से निकला जितना कभी नहीं निकला होगा। सी.ए. ने भी मेरी चूत में पानी भर दिया और ये सब मिलकर मेरी टांगों के किनारे किनारे बह निकले।

उधर बॉस भी जब झड़ने को हुआ तो उसने अपना लण्ड मेरे मुँह से बाहर निकाल लिया नहीं तो मेरा मुँह भी भर गया होता। लेकिन बॉस का वीर्य मेरे बालों में गिरा और वो हंसते हुआ बोला- शैम्पू लगा दिया तुम्हारे बालों में, धो लेना।

दोनों के झड़ने के बाद उन्होंने कहा कि उनको बहुत मज़ा आया और वे दोनों अपने कमरे में चले गए।

मैंने सब ठीकठाक किया और सोने का नाटक करने लगी। तभी 5-10 मिनट बाद वरुण धीरे से कमरे में आया, उसको बॉस सहारा देकर छोड़ गया।

वरुण खूब पिए हुए था, उसने मेरी बगल धीरे से लेट कर मुझे हल्की हल्की दो तीन आवाज़ दी, मैंने कोई जवाब नहीं दिया तो फिर वो सो गया, मैं अपनी चूत को सहलाते हुए और उसे हाथ से थपथपा कर देखते हुए सो गई।

अगले दिन वरुण और मैं वापिस आ गए।

वरुण ने कोई ऐसी बात नहीं कही जिससे कुछ अंदाज़ा लगाया जा सके कि उसे कुछ शक भी हुआ या नहीं, या सब मालूम था, या उसने बॉस को खुश करने के लिए सब षडयंत्र रचा हो।

पर मुझे ऐसी शंका नहीं हुई, आज भी नहीं है।

चुदाई का यह विशेष अनुभव मैं कभी नहीं भूल पाऊँगी।

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