The Role of Playful Sex Quotes in Enhancing Intimacy
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In the realm of intimate relationships, maintaining a healthy and vibrant
sex life is often a key component. To infuse a dose of excitement and
playfulne...
हिंदी सेक्सी कहानियां
हिंदी सेक्सी कहानियां |
| Posted: 21 Feb 2013 08:46 AM PST ![]() कैसे हो जी...? मजे में ना...? भूले तो नहीं ना मुझे...? मैं शालिनी जयपुर वाली... ! मेरी पहली कहानी बहुत पसंद की थी आप लोगों ने ! इतने मेल आए कि गदगद हो गई आप सबका प्यार देख कर। आप सबका प्यार देख कर दिल किया कि आगे की मजेदार बातें भी आप लोगों से करूँ। जैसा कि मैंने आपको बताया था कि जीजा वो दूसरा इंसान था जिसका लण्ड मैंने अपनी चूत में लिया था। पहला मेरा पति और दूसरा मेरा जीजा। जीजा ने मेरे घर में आकर मेरी जो चीखे निकलवाई कि मैं तो जीजा की और जीजा के लण्ड की दीवानी हो गई। उस चुदाई के बाद तो जीजा का अक्सर मेरे घर पर आना जाना हो गया और मेरे पति और जीजा की भी अच्छी दोस्ती हो गई। जीजा जब भी आता तो मुझे चोदने का एक भी मौका नहीं छोड़ता था या यूँ कहो कि मैं चुदवाए बिना जीजा को जाने ही नहीं देती थी। जब भी जीजा आता और मुझे चोदता तो मेरी गाण्ड की इतनी तारीफ करता की पूछो मत। हर बार वो मुझे लण्ड गाण्ड में डलवाने के लिए मनाता पर मूसल जैसे लण्ड को देख कर मेरी हवा सरक जाती और मैं किसी न किसी बहाने जीजा को टाल देती। एक दो बार जीजा ने अपनी उंगली घुसाई भी मेरी गाण्ड में जिससे मुझे बहुत दर्द हुआ। मैं डर गई कि जब पतली सी उंगली से ही इतना दर्द होता है तो जब मोटा मूसल जैसा लण्ड इसमें जाएगा तो मेरी तो जान ही निकल जायेगी। कुछ महीने बीते और तभी जीजा की बहन यानि मेरी चचेरी बहन सुमन की ननद की शादी तय हो गई। जीजा ने हमें भी न्यौता दिया था। जीजा जब शादी का कार्ड देने आया था तो मुझे कह गया था कि शादी में जब आओ तो अपनी गाण्ड पर अच्छे से तेल लगा कर आना। मैंने सोचा कि जीजा मजाक कर रहा है और मैंने वो बात हँस कर टाल दी। आखिर शादी में जाने का दिन भी आ गया। मैं अपने पतिदेव के साथ बन-ठन कर जीजा के घर के लिए रवाना हो गई। जब मैं तैयार हो रही थी तो मुझे एकदम से जीजा की बात याद आई तो मेरी गाण्ड में गुदगुदी होने लगी। अनजाने में ही मेरा हाथ पहले चूत पर और फिर गाण्ड पर चला गया, मैं मन ही मन हँस पड़ी, मैंने कुछ सोचा और फिर एक उंगली भर कर गाण्ड पर तेल लगा लिया। रास्ते भर मैं इसी बात को सोच सोच कर मंद-मंद मुस्कुराती रही। पतिदेव ने एक दो बार पूछा भी पर मैंने बातों बातों में टाल दिया। सफर जैसे जैसे खत्म हो रहा था मेरे दिल की धड़कन बढ़ रही थी। और फिर हम जीजा के घर पर पहुँच ही गए। जीजा भी जैसे मेरे ही इन्तजार में दरवाजे पर खड़ा था। मुझे देखते ही उसने आँख दबा कर मेरा स्वागत किया तो मैंने भी जवाब में आँख दबा दी। घर पहुँच कर सबसे मिलना जुलना हुआ और जीजा ने मेरे पति को अपने किसी दोस्त के साथ पास के शहर में कुछ सामन लाने भेज दिया। कुछ ही देर बाद जीजा आये और मुझे बुला कर अपने साथ चलने को कहा। "जीजा...सब लोग क्या सोचेंगे... अच्छा नहीं लगेगा ऐसे जाना !" पर जीजा मुझे घर के पीछे वाले दरवाजे पर आने का बोल कर चले गए। मैं कुछ देर तो सोचती रही पर फिर अपने आप को जाने से नहीं रोक पाई। दरवाजे से निकली तो पीछे एक गाड़ी खड़ी थी। जीजा उसमे पहले से ही बैठा था। मैं भी जाकर बैठ गई तो जीजा ने गाड़ी एक सड़क पर दौड़ा दी। इस बीच मैंने जीजा से दो-तीन बार पूछा- कहाँ ले जा रहे हो? पर जीजा ने कोई जवाब नहीं दिया और बस बोले- तुम्हें जन्नत की सैर करवाने ले जा रहा हूँ। कुछ देर के सफर के बाद जीजा ने खेतों में बने एक मकान की तरफ गाड़ी घुमा दी। मकान के गेट पर ताला लगा था। जीजा ने ही ताला खोला और हम दोनों अंदर चले गए। अंदर जाते ही जीजा ने मुझे अपनी बाहों में भर लिया और अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिए। मैं तो खुद जीजा की दीवानी थी तो भला मैं अपने आप को कैसे रोक सकती थी तो मैंने भी जीजा का साथ देने लगी। जीजा दीवानों की तरह मुझे चूम रहा था। उसके हाथ मेरी चूचियों को टटोल रहे थे। कुछ देर बाद जीजा ने मुझे अपनी बाहों में उठाया और अंदर एक कमरे में ले गए जहाँ एक डबलबेड था। जीजा ने मुझे बेड पर लेटा दिया और खुद अपने कपड़े उतारने लगे। मैंने पूछा तो जीजा ने बताया कि यह उनके एक दोस्त का मकान है और वो दोस्त मेरे पति को लेकर शहर गया है ताकि मैं तुम संग मज़ा कर सकूँ। मेरी हँसी छूट गई जीजा की मेरे प्रति दीवानगी देख कर। खुद के कपड़े उतारने के बाद जीजा मेरे पास आया और मेरे कपड़े मेरे शरीर से अलग करने लगा। देखते ही देखते जीजा ने मेरे बदन पर एक भी कपड़ा नहीं छोड़ा और मुझे बिल्कुल नंगी करके ही दम लिया। जीजा ने अभी भी अंडरवियर पहना हुआ था जिसमें जीजा का लण्ड एक गाँठ की तरह लग रहा था। मैंने भी देर नहीं की और लण्ड महाराज को अंडरवियर की कैद से आजाद करवाया। बाहर निकलते ही लण्ड अपने पूरे शबाब के साथ तन कर खड़ा हो गया। मैं तो दीवानी थी इस लण्ड की। नौ इंच लम्बा और तीन इंच से ज्यादा मोटा लण्ड देख कर तो किसी भी औरत की चूत पानी पानी हो जाए तड़प उठे उसे अपने अंदर लेने को। जीजा ने लण्ड मेरे मुँह की तरफ किया तो मैंने धीरे धीरे लण्ड को अपनी जीभ से चाटना शुरू कर दिया और सुपारे को अपने मुँह में लेकर चूसने लगी। फिर कुछ देर तक लण्ड को चूसा और जीजा को मस्त कर दिया। जीजा ने मुझे सीधा लेटाया और लण्ड मेरी चूत में उतार दिया। जीजा का लण्ड अंदर घुसते ही मेरी आह्ह निकल गई। जीजा जबरदस्त चुदाई करने लगा। चुदाई करते करते उसने एक उंगली मेरी गाण्ड पर लगाईं तो उसे चिकनाई का एहसास हुआ। जीजा हँस पड़ा और बोला- साली साहिबा अपने जीजा का कितना ख्याल रखती हैं... गाण्ड पर तेल लगा कर आई हैं। मेरी भी हँसी छूट गई। जीजा ने स्पीड बढ़ा कर चुदाई करनी शुरू की तो आठ दस धक्कों के बाद ही मेरी चूत से झरना बह निकला। मैं झड़ गई थी। मेरे झड़ने के बाद जीजा ने लण्ड चूत में से निकाला और मेरी गाण्ड के नीचे एक तकिया रख कर मेरी टाँगें खुली कर दी। मैं देख तो नहीं सकती थी पर जीजा ने बताया कि मेरी गाण्ड किसी फ़ूल की तरह खिली हुई थी। जीजा ने पास में रखी एक तेल की शीशी से कुछ तेल लेकर मेरी गाण्ड पर लगाया तो मैं सिहर उठी। अब मुझे डर सताने लगा था कि जीजा आज लण्ड से मेरी गाण्ड फाड़ देगा। पर जीजा तेल ले लेकर मेरी गाण्ड पर और गाण्ड के अंदर लगाने लगा। मेरे अंदर मस्ती भरती जा रही थी। जीजा की तेल से सनी उंगली मुझे मेरी गाण्ड में बहुत मज़ा दे रही थी। जीजा ने तेल लगा लगा कर मेरी गाण्ड पूरी चिकनी कर दी और फिर अपना लण्ड मेरी गाण्ड पर रगड़ने लगा तो मैंने डर के मारे अपनी गाण्ड कस ली। पर कितनी देर....? गाण्ड तो आज फटनी ही थी। जीजा ने मेरी टाँगे अच्छे से खुली की और मेरी गाण्ड के छेद पर लण्ड रख कर अंदर की तरफ दबाने लगा। मुझे दर्द का एहसास हुआ पर तेल जीजा की मदद कर रहा था और जब जीजा ने थोड़ा जोर लगा कर लण्ड को अंदर सरकाया तो जीजा का मोटा सुपारा मेरी गाण्ड को भेद कर अंदर घुस गया। मेरी चीख निकल गई। दर्द के मारे आँखें फट पड़ी। जीजा ने मेरी हालत की तरफ ध्यान नहीं दिया और थोड़ा सा उचक कर एक और धक्का लगा कर करीब दो इंच लण्ड मेरी गाण्ड में उतार दिया। मैं दुगनी आवाज में चीख पड़ी- आह्ह..... जीजा मेरी गाण्ड फट गईई.... निकाल्ल लो बाहर... पर जीजा तो पक्का खिलाड़ी था। वो तो बस मुझे मजबूती से पकड़ कर लण्ड को ज्यादा से ज्यादा अंदर तक उतारने में लगा था। मैं चीखती रही और जीजा मेरी हालत का मज़ा लेता रहा। हर बार थोड़ा रुक कर जीजा एक धक्का लगाता और लण्ड को और ज्यादा मेरी गाण्ड में उतार देता। गाण्ड में बहुत दर्द हो रहा था। मेरी आँखों से आँसू बह निकले थे। दर्द मुझ से बर्दास्त नहीं हो रहा था। मैं पुरजोर कोशिश कर रही थी जीजा का लण्ड अपनी गाण्ड से बाहर निकालने की पर जीजा ने मुझे ऐसे जकड़ रखा था कि मैं हिल भी नहीं सकती थी। लण्ड आधे से ज्यादा मेरी गाण्ड में चला गया था। जीजा ने थोड़ा तेल मेरी गाण्ड और अपने लण्ड पर टपकाया और फिर जितना लण्ड गाण्ड में घुसा था उसे ही अंदर-बाहर करने लगे। हर धक्के के साथ मेरी दर्द भरी चीख निकल रही थी। जीजा अगले पाँच मिनट तक ऐसे ही मेरी गाण्ड में लण्ड पेलता रहा और हर धक्के के साथ थोड़ा सा लण्ड मेरी गाण्ड में सरकता रहा। मैं दर्द के मारे रो रही थी। जब लण्ड थोड़ा सा रह गया तो जीजा ने एक जोरदार धक्का लगाया और पूरा लण्ड मेरी गाण्ड में फिट कर दिया। लण्ड पूरा घुसते ही जीजा ने थोड़ा सा तेल और टपकाया और फिर पहले धीरे धीरे और फिर तेज गति से लण्ड को मेरी गाण्ड में अंदर-बाहर करने लगा। कुछ देर तो मैं भी दर्द से तड़पती रही पर फिर मुझे भी यह अच्छा लगने लगा। जीजा ने मेरे आँसू साफ़ किये और मेरे होंठों पर चुम्बन देने लगा, मेरी चूचियाँ मसलने लगा। मेरी गाण्ड धीरे धीरे जीजा के लण्ड की अभ्यस्त हो गई और अब लण्ड आराम से अंदर-बाहर हो रहा था। जीजा ने अपना लण्ड बाहर निकाला और मुझे घोड़ी बना कर मेरे ऊपर आ गए और पीछे से लण्ड मेरी गाण्ड में उतार दिया। इस आसन में लण्ड आराम से गाण्ड में आ-जा रहा था और मुझे इस में मज़ा भी ज्यादा आया। अब जीजा मेरी दोनों चूचियों को पकड़ कर मसल रहे थे और पीछे से लण्ड मेरी गाण्ड में पेल रहे थे। मेरी दर्द भरी चीखें अब मस्ती भरी आहों में बदल गई थी। मेरी चूत से भी मस्ती भरा रस टपक रहा था। जीजा मस्त होकर मेरी गाण्ड मार रहा था और मैं मस्ती में गाण्ड उचका उचका कर जीजा का लण्ड अपनी गाण्ड में ले रही थी। चूत चुदवाने से भी ज्यादा मज़ा महसूस हो रहा था क्यूंकि लण्ड पूरा रगड़ रगड़ कर अंदर आ-जा रहा था। पन्द्रह मिनट की धक्कमपेल के बाद मैं घोड़ी बनी बनी थक गई थी। जीजा ने भी मेरी हालत को समझा और मुझे सीधा लेटा कर एक बार फिर लण्ड अंदर डाल दिया। सीधे लेटने के बाद जीजा मस्ती के मूड में था तो वो लण्ड एक बार मेरी गाण्ड में डालता और फिर निकाल कर मेरी चूत में घुसा देता। इस तरह जीजा मुझे दो दो मज़े एक साथ दे रहा था। कुछ देर की मस्ती के बाद जीजा ने लण्ड मेरी चूत में घुसा दिया और जोर जोर से धक्के मारने लगा। मैं समझ गई थी की जीजा का लण्ड अब रस की बौछार करने वाला है। मैं भी गाण्ड उठा उठा कर लण्ड अंदर लेने लगी। करीब बीस पच्चीस धक्को के बाद जीजा के लण्ड से फव्वारा चल पड़ा और मेरी चूत को अपने गर्म गर्म वीर्य से भरने लगा। वीर्य की गर्मी मात्र से ही मेरी चूत झड़ गई। जीजा ने लण्ड के रस से मेरी चूत को लबालब भर दिया। झड़ने के बाद जीजा मेरे ऊपर ही लेट गया। कुछ देर लेटने के बाद जीजा फिर से हरकत में आया और मेरी गाण्ड पर हाथ फेरने लगा। मेरी गाण्ड तो मोटे से लण्ड से पिटाई के बाद सूज कर लाल हो गई थी। जीजा के हाथ लगाने मात्र से ही दर्द हो रहा था पर जीजा बेदर्दी ने फिर से तेल लगा कर लण्ड को एक बार फिर मेरी दुखती गाण्ड में उतार दिया। मैं चीखती रही और जीजा बेदर्दी से मेरी गाण्ड मारता रहा। सच में मेरे प्यारे जीजा को चीखे निकलवाने में बहुत मज़ा आता है। हम लोग शादी में तीन दिन रुके और जीजा ने भी तीन के तीन दिन मेरी गाण्ड और चूत का भुरता बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। शादी के व्यस्त कार्यक्रम में भी उसने मेरी चुदाई के लिए समय निकाल ही लिया। जब मैं वापिस जयपुर आई तो गाड़ी की सीट पर भी मैं सही से नहीं बैठ पा रही थी क्यूंकि मेरी गाण्ड दुःख रही थी। घर आकर भी कम से कम तीन चार दिन बाद मेरी गाण्ड का दर्द ठीक हुआ और मैंने सुख की साँस ली। आगे भी बहुत कुछ हुआ वो अगली बार... तब तक के लिए आप सभी को आपकी प्यारी शालिनी भाभी का प्यार भरा चुम्बन... मेरी गाण्ड मरवाई का किस्सा कैसा लगा मुझे मेल करके जरूर बताना। मेरा मेल आईडी तो पता है ना... मेरी मेल आईडी है : piyarathore.sr@gmail.com कहानी लिखने में मेरी मदद करने वाले मेरे प्रिय मित्र राज की आईडी तो आपको पता ही होगी फिर भी बता देती हूँ। Sharmarajesh96@gmail.com |
| वक़्त से पहले और किस्मत से ज्यादा-2 Posted: 21 Feb 2013 08:39 AM PST आपने मेरी कहानी का पहला भाग"वक़्त से पहले और किस्मत से ज्यादा" पढ़ा होगा। वो रात कैसे गुजर गई पता ही नहीं चला। कॉलेज के बाद पहली बार पूरी रात जागते हुए गुजरी थी, परीक्षा के दिनों की याद ताज़ा हो गई जब पूरी पूरी रात जागते हुए गुजर जाती थी और सुबह अगर पेपर ठीक से हो जाए तो एक मीठा मीठा सा एहसास पिछली रात की सारी थकान दूर कर देता था, यहाँ भी लगभग वैसा ही था, फर्क सिर्फ इतना था कि मेरी दोस्ती परीक्षक से हो गई थी इसलिए किसी बात का डर नहीं लग रहा था। उस एक रात से जीवन में बदलाव सा आ गया था, मेरा यूरोप में लम्बे समय तक रहने का कोई इरादा नहीं था, हमेशा सोचा था कि चालीस की उम्र तक काम करूँगा, उसके बाद आराम और वापस अपने देश। उस एक रात के साथ के बाद ऐसा लगा कि जीवन की दिशा बदल गई है। एक बार को लगा कि यह सब सिर्फ दोस्ती तक ही सीमित रहने वाला है और विदेशी लोग वैसे भी इस तरह के अनुभवों को ज्यादा महत्व नहीं देते। तभी मुझे क्रिस्टीना ने हिलाया और उठने को कहा, उसने बाहर छोटे से किचन गार्डन की तरफ इशारा किया और मैं उसके पीछे पीछे एक जर-खरीद गुलाम की तरह चल पड़ा। सब कुछ विस्मित करने वाला था, दो कुर्सियाँ, एक सुन्दर सी तिपाई ! अखबार और चाय की केतली से निकलती हल्की-हल्की भांप। उसने चाय बना कर दी और मैं चुपचाप उसको देखते हुए पीने लगा, शायद चाय के साथ-साथ उसको पीने की एक नाकाम कोशिश भी हो रही थी। वह अखबार पढ़ रही थी और बीच बीच में मुझे देख रही थी, शायद बिना कुछ कहे ही हम दोनों बीती रात के बारे में बातें कर रहे थे। कुछ समय गुजरने के पश्चात उसने मुझसे पूछा- नाश्ता करना है या नहीं? तब पता लगा कि चाय तो कब की ख़त्म हो चुकी थी और मैं काफी समय से हाथ में खाली मग लिए बैठा था। इस समय मुझमें और मुझे से आधी उम्र के एक लड़के में कोई फर्क नहीं था। सब कुछ पहली बार हो रहा था और लगता था कि कोई किसी तरह से समय को रोक कर यहीं बिठा ले और कुछ भी न बदले। उसने कहा- पहले नहा लो, फिर मैं नाश्ता तैयार करती हूँ। यह कह कर उसने एक तौलिया मुझे पकड़ा दिया। मुझमें ऐसा करने की हिम्मत तो नहीं थी पर पता नहीं कैसे मैंने क्रिस्टीना का हाथ पकड़ लिया और उसको अपनी तरफ खींच लिया। उसने कुछ नहीं कहा और ख़ामोशी से मेरा साथ देने लगी, हमारे होंठ मिले और बात फिर से चल निकली। हम दोनों कब बाथरूम में घुसे और कब कपड़े उतरे, पता ही नहीं चला। हम लोग बाथटब में उतर गये और मैं फिर से उसके शरीर के हर हिस्से को टटोलने लगा, कुछ ऊँचाइयाँ और कुछ गहराइयाँ, हाथ जैसे रुकने नाम ही नहीं ले रहे थे और जिस जगह से हाथ गुजरते थे, होंठ पीछे पीछे अपनी मोहर लगाने पहुँच जाते थे। इन सब हरकतों की वजह से क्रिस्टीना शायद दो या तीन बार अपने चरम पर पहुँच चुकी थी। अचानक उसने पूरी ताकत से मुझे अपने ऊपर से हटाया और नीचे पटक दिया और बिना देर किये अपने होंठ मेरे अंग पर टिका दिए और पूरी तन्मयता से मुझे ख़ुशी देने में जुट गई। कुछ समय बाद उसने मुझे टॉयलेट सीट पर बैठने को कहा और मेरे ऊपर आ गई। एक मीठा सा गरम एहसास हुआ और जैसे चाकू मक्खन मे उतर जाता है वैसे ही मैं भी उसकी गहराई में उतरता चला गया। इस वक़्त यह बताना मुश्किल था कि चाकू कौन है और मक्खन कौन ! हद तो तब हो गई जब उसने ऊपर नीचे होना शुरू किया। मैं इस अचानक हमले के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था और लगभग मिनट दो मिनट में ही शहीद हो गया। कुछ देर हम उसी अवस्था में बैठे रहे और एक दूसरे तो सहलाते रहे। क्रिस्टीना और मैंने फिर नहाना ख़त्म किया। तब तक सुबह के लगभग गयारह बज चुके थे यानि कि हम पूरे दो घंटे से बाथरूम में ही थे। नाश्ता किया और सोचा कि सप्ताहांत है, कुछ देर बाहर घूम कर आते हैं, नींद या थकावट बिल्कुल नहीं थी। क्रिस्टीना के घर से लगभग चालीस किलोमीटर की दूरी पर कुछ हेरिटेज खदानें थी, वहीं जाने का मन बनाया और निकल पड़े। वहाँ का नज़ारा बहुत सुन्दर था, रखरखाव अच्छा होने के कारण लगता नहीं था कि यहाँ पर खनन का काम बंद हुआ एक अरसा गुजर चुका है। क्रिस्टीना उस दिन रोजाना से ज्यादा सुंदर लग रही थी, उसकी चाल देख कर लग रहा था कि वो खुश थी। हम दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़ कर चल रहे थे, कोई नहीं कह सकता था कि हम लोगों का साथ सिर्फ कल रात से ही था। घूमते हुए शाम हो गई और फिर हमने एक साथ खाना खाया। खाना खाने के बाद मुझे लगा कि अब बहुत हुआ और उसको उसके घर छोड़ कर लौट जाना चाहिए। हम रेस्तराँ से बाहर निकले और उसके घर के सामने मैंने कार रोक दी, हिम्मत नहीं हुई कि उसको इस एक दिन के लिए धन्यवाद दूँ और विदा लूँ। कुछ देर हम ऐसे ही बैठे रहे, उसने मेरी तरफ देखा तो मैं अपने ख्यालों में खोया हुआ सर नीचे किये हुए बैठा था। उसने हल्के से मेरी पेशानी पर एक चुम्बन दिया और कहा- सोमवार को ऑफिस में मिलते हैं। एक बार को मुझे बुरा लगा क्योंकि शायद मुझे उम्मीद थी कि आज की रात भी क्रिस्टीना के साथ गुजारनी चाहिए, फिर लगा नहीं यह उसकी मर्ज़ी पर है और मैं उसकी इच्छा का आदर करते हुए भारी मन से अपने छोटे से अपार्टमेन्ट में वापस आ गया। भारत में अपने माता-पिता को छोड़ने के बाद पहली बार किसी का साथ इतना अच्छा लगा था। सिर्फ एक कमरे का स्टूडियो अपार्टमेन्ट होने के बाद भी आज मुझे सब कुछ खुला खुला लग रहा था, सब काटने को दौड़ रहा था। बमुश्किल जूते ही उतार पाया और बिस्तर पर गिर गया, नींद कब आई पता नहीं चला। पिछली लगभग पूरी रात जागा था और आज पूरे दिन भी नहीं सोया था, इसी वजह से नींद आ गई, वरना लगता नहीं था कि क्रिस्टीना के खयालों से बाहर निकल पाता। क्योंकि अब मैं भी सो रहा हूँ, आप लोग भी थोड़ा आराम करें। sanj.singh74@gmail.com |
| Posted: 21 Feb 2013 08:30 AM PST आज मैं आपको एक रोमांटिक और प्यारी सी सेक्स कथा बताने जा रहा हूँ।हमारा छोटा सा परिवार है, जिसमे मैं, मेरा बेटा और उसकी पत्नी, हम साथ साथ रहते हैं। मेरा बेटा एक बड़ी कंपनी में काम करता है, और उसकी पत्नी पूनम बहुत ही होशियार और पढ़ी-लिखी खूबसूरत लड़की है, उसका स्वभाव बहुत अच्छा है और सबसे हमेशा ख़ुशी से खुल कर बात करती है। वो जब भी घर से बहार जाती है तो तैयार होकर मेरे पास आकर मुझसे पूछती है- पापा, मैं कैसी लग रही हूँ? और हमेशा मैं उसे कहता हूँ- बहुत खूबसूरत ! और वो हंसते हुए चली जाती है। एक दिन की बात है कि मैं अपनी अलमारी में अपने कपड़े रख रहा था कि देखा उनमें एक ब्रा भी थी। मैं समझ गया कि मेरे कपड़ों में मेरी बहू पूनम की ब्रा आ गई है। मैंने दो दिन तक विचार किया कि पूनम को उसकी ब्रा कैसे वापस दूँ। फिर एक दिन घर पर कोई नहीं था तो मैं उसके कमरे गया ही था ब्रा रखने कि वो आ गई। मुझे अपने कमरे में देख कर उसने पूछा- कुछ काम है पापा? मैंने हिचकिचाते हुए कहा- तुम्हारा यह कपड़ा मेरे कपड़ों के साथ आ गया था। उसकी ब्रा उसके हाथ में देते हुए मैं बोला। तो पूनम किसी भी तरह की शर्म न दिखाते हुए हंसते- हंसते बोली-, शायद भूल से चला गया होगा। फिर मैं वहाँ से चला आया, लेकिन तब से मेरे मन में पूनम के प्रति गलत विचार आने लगे। कुछ दिनों बाद मैं एक काम से मद्रास गया, वहाँ एक शॉप में मैंने एक बहुत खूबसूरत सी ब्रा-पैंटी देखी। मेरा मन किया कि ये मैं पूनम के लिए ले लूँ। मैंने उस ब्रा-पैंटी को खरीद लिया। जब वापस घर आया तो मेरी हिम्मत ही नहीं हुई उसे देने की ! मैंने उन्हें अपनी अलमारी में रख दिया। कुछ दिन बाद पूनम मेरी अलमारी में कपड़े ठीक कर रही थी तो उसे वो ब्रा-पैंटी दिख गई और उसने मुझे बुला कर पूछा- ये ब्रा-पैंटी किसके हैं? मेरे तो नहीं हैं। फिर मैंने उसको बता दिया- मैं ये तुम्हारे लिए लाया था ! तो पूनम खुश होकर बोली- मेरे लिए? थैंक्यू वेरी मच ! बहुत ही अच्छी हैं। वो तो इतना कह कर ब्रा-पैंटी लेकर चली गई। दूसरे दिन वो तैयार होकर मेरे पास आई और बोली- मैं कैसी लग रही हूँ? मैंने उसको देखा तो उसके ब्लाउज़ में से उसकी ब्रा की पट्टी दिख रही थी, मैंने कहा- बहुत खूबसूरत ! बस एक कमी है, तुम्हारी ब्रा की पट्टी दिख रही है। कहते हुए मैंने खुद ही पट्टी को छुपा दिया तो वो हंसने लगी। फिर मैंने पूछा- कहाँ जा रही हो तुम? उसने कहा- अपनी बहन से मिलने जा रही हूँ ! मैंने कहा- तुम्हें जल्दी न हो तो थोड़ी देर मेरे पास बैठो ! वो मान गई और मैं सोफे पर बैठ गया तो वो आकर मेरे गोद में बैठ गई और कहने लगी- पापा, जो ब्रा-पैंटी आपने दी थी, आज मैंने वो पहनी है। यह सुनकर मेरे मन में अजीब सी तड़प उठी, उसके नाजुक कूल्हे मेरे जांघों पर थे और वो मेरे एकदम नजदीक थी, मेरा मन कर रहा कि अभी उसको बिस्तर पर लिटा लूँ। पर क्या करता वो मेरे बेटे की पत्नी थी। फिर भी मैंने उसे कहा- कैसा लगा मेर तोहफ़ा? वो खुश होते हुए कहने लगी- बहुत अच्छा पापा ! और फिटिंग भी बहुत अच्छी आई है, दिखाऊँ आपको? यह सुन कर मेरे मन में लड्डू फूटने लगे, मैंने सर हिलाते हुए हाँ कहा तो वो अपने ब्लाउज़ के हुक खोलने लगी। उसके बड़े बड़े स्तन ब्रा में से उछल रहे थे और मक्खन जैसी उसकी नाजुक चमड़ी देख कर मेरा चूमने का मन कर रहा था, लेकिन मैंने किसी तरह कंट्रोल किया और कहा- तुम हो ही इतनी सुन्दर ! तुम पर तो सब कुछ अच्छा ही लगेगा। पूनम अपना ब्लाउज़ खुला रख कर ही मुझसे बातें करने लगी, मुझसे कहने लगी- पापा मेरी इच्छा है, कुछ दिन आपके साथ अकेले गुजरना चाहती हूँ मैं। मुझे आपके साथ बहुत अच्छा लगता है। मैंने कहा- सच? फिर तो तुम्हें कहीं घुमाने ले जाना पड़ेगा ! कभी मौका मिलने पर ! पूनम बोली- पक्का ना पापा? ले जाओगे न मुझे? मैं- हाँ जरूर ले जाऊँगा कभी। फिर वो अपनी बहन को मिलने चली गई। तब से मैं भी उस दिन की राह देखने लगा कि कब मेरा बेटा कहीं बाहर जाये और मैं पूनम के साथ वक्त बिता सकूँ। एक दिन सवेरे सवेरे पूनम दौड़ती हुई आई और कहने लगी- पापा एक खुशखबरी ! सुनील 5 दिनों के लिए बाहर जा रहे हैं, अब तो मुझे ले चलोगे ना? मैं भी खुश हो गया और उसे गले लगा लिया और कहा- हाँ जरूर जाएँगे, तुम तैयारी कर लो। मैं और पूनम हमारे फार्म-हाउस गए क्योंकि वहाँ कोई आता-जाता नहीं और मुझे पूनम के साथ पूरा वक्त बिताने का मौका मिलता। मैं वहाँ अपने कमरे में जाकर नहाने चला गया और वो भी चली गई। नहाने के बाद मैं टीवी देखने लगा थोड़ी देर बाद आवाज आई- पापा ! मैंने पलट कर देखा तो मैं दंग रह गया, पूनम एक काले रंग के नाईट सूट में मेरे सामने खड़ी थी, एकदम मखमली कपड़ों में उसके बदन से सभी कटाव स्पष्ट दिख रहे थे, उसके बड़े बड़े स्तनों के चुचूक साफ दिख रहे थे, उसकी नायटी की टी शर्ट में से उसका पेट खुला था, उसकी नाभि बहुत खूबसूरत लग रही थी। पजामे से उसके कूल्हों की दरार दिख रही थी उसके पूरे बदन से स्तन और कूल्हे बाहर निकले हुए थे। यह दृश्य देख मेरा लंड खड़ा हो गया। मैंने कहा- पूनम, आज तो तुम हुस्न का पहाड़ हो गई हो ! मैंने ऐसी खूबसूरती पूरी जिंदगी में कभी नहीं देखी। आओ, मेरे पास आओ।वो आकर मेरे पास बैठ गई तो मैंने कहा- क्यों, आज मेरी गोद में नहीं बैठोगी? तो वो हंसते हुए मेरी गोद में बैठ गई, मैं उसे सहलाने लगा और उसकी तारीफ़ करने लगा। वो बहुत ही खुश थी और कहने लगी- पापा आप न होते तो मेरा क्या होता? आप मेरे दोस्त बन कर मुझे साथ न देते तो शायद में पूरी जिंदगी सुनील के साथ न बिता पाती, चली जाती। तो मैंने भी जवाब में कहा- मेरे होते हुए तुम्हे कोई चिंता की जरुरत नहीं। वो ऐसे ही बातें करती रही पर मेरा ध्यान तो उसके बदन में था, मैं यही सोच रहा था कि मैं ऐसा क्या करूँ जिससे पूनम मेरे साथ चुदाई के लिए राजी हो जाये ! फिर मैंने एक योजना बनाई और पूनम को कहा- तुम रसोई के फ्रिज में से शराब की बोतल लेकर आओ ! तो वो लेकर आई और मैं शराब पीने लगा, फिर मैंने पूनम को भी थोड़ी सी शराब पिलाई। अब वो मस्त होने लगी थी, फिर मैंने कहा- चलो पूनम, हम स्वीमिंग पूल में नहाने जाते हैं। तो वो भी मान गई और हम स्वीमिंग पूल में नहाने लगे, मैं सिर्फ अपनी निकर में था और पूनम अपने नाईट सूट में ही पानी में नहाने लगी। पानी में भीगते उसका पूरा बदन दिखने लगा उसके बड़े से स्तन, उसके चूतड़ और उसकी चूत का आकार भी पूरा दिखने लगा। उसने अन्दर कुछ नहीं पहना था। नहाते हुए मैं उसके पूरे बदन को सहलाने लगा तो वो भी मजा लेने लगी। मैंने धीरे धीरे उसके स्तनों पर हाथ फिराया और फिर उसके स्तनों को दबाने लगा, उसको भी मजा आ रहा था। फिर मैंने उसकी टी शर्ट में हाथ डाल दिया और उसके स्तन दबाने लगा फिर मैंने उसका टी शर्ट उतार दिया और उसके स्तनों को देखता ही रह गया, इतने खूबसूरत स्तन मैंने कभी न देखे थे एकदम कसे हुए गोल आधे कटे खरबूजे जैसे उसके स्तनों को देख में तो पागल हो गया। मैं उसके स्तनों को मुँह में लेकर चूसने लगा और वो भी हल्की हल्की आवाजें निकालने लगी- आह आह... फिर मैं उसको उठा कर अपने बेडरूम में ले गया और उसे बिस्तर पर लिटा दिया, वो कहने लगी- पापा, आओ न ! आज मेरी प्यास बुझाओ न ! यह सुन कर मैं और भी उत्तेजित होकर उसके स्तनों को जोर से दबाने, चूसने लगा, काटने लगा। फिर मैंने उसका गीला पजामा निकाल दिया और उसके दोनों पैरो को फैलाया तो मैं दंग रह गया। उसकी चूत क्या कमाल थी, चूत पर शायद बाल कभी उगे ही नहीं, इतनी कोमल, दूध जैसी सफ़ेद, चूत के होंठ बड़े से गुलाबी रंग के, और गीली होने के कारण चूत चमक रही थी। मैं बिना कुछ करे उसकी चूत को पूरा अपने मुँह में लेकर चूसने लगा, चाटने लगा। वो भी मजा लेती हुई आवाजें निकालने लगी, मेरे मुँह को अपनी चूत पर दबाने लगी और अपनी चूत को उचका कर मेरे मुँह में देने लगी।फिर उसका पानी निकल गया और उसने मुझे झटके से पलट दिया और मेरे ऊपर चढ़ गई। मेरी निकर में से निकाल कर मेरा लंड अपने मुँह में लेकर चूसने लगी। थोड़ी देर चूसने बाद उसने वैसे ही बैठे हुए मेरा लंड अपनी चूत में डाल दिया और जोर जोर से उछलने लगी। बहुत देर तक वो करने के बाद थक गई तो मैंने उसको लिटा दिया और अपना लंड उसकी चूत में डाल दिया और उसके दोनों पैर मेरे पैरों के बीच में लेकर दबा लिए और चोदने लगा। उसकी चूत बाहर से जितनी खूबसूरत थी उससे कहीं ज्यादा अन्दर से थी। मैं उसको चोदते हुए उसके होंठों को और स्तनों को दबाते हुए चूम रहा था और वो भी सेक्स का आनंद ले रही थी, अपनी चूत को उछाल-उछाल कर मेरे लंड को अपने अन्दर ले रही थी। ऐसे ही चोदते हुए उसने कई बार अपना पानी निकाल दिया और काफ़ी देर चोदने के बाद मेरा भी पानी उसकी चूत में ही निकल गया। हम थक कर चूर हो गए थे, कब नींद आई पता ही न चला। सुबह मेरी नींद खुली तो मैंने देखा कि हम नंगे ही एक दूसरे को लिपट कर सोए हुए थे। मैं उठ कर पूनम को देखने लगा और सोचने लगा कि मैं कितना खुश किस्मत हूँ कि मुझे पूनम जैसी हसीं लड़की के साथ चुदाई का मौका मिला। और मैं पूनम के बदन को सहलाने लगा तो उसकी भी नींद खुल गई, उसने मुझे अपनी बाहों में ले लिया और मुझे चूमने लगी। मैं भी उसके स्तनों को चूसने लगा तो उसका चुदाई का मन हो गया और उसने मेरे लंड को पकड़ कर अपनी चूत में डलवा लिया और मैं उसको चोदने लगा। थोड़ी देर चोदने के बाद हम दोनों का पानी निकल गया और हम नहाने के लिए साथ गए, हमने एक दूसरे को नहलाया। आज तो पहला दिन था, सुनील तो 5 दिन बाद वापिस आने वाला था, तब तक हमें यहीं रह कर सेक्स का आनन्द लेना था। 5 दिनों तक मैंने और पूनम ने अलग अलग तरीकों से चोदने का मजा लिया और घर वापिस आ गए। फिर पूनम रोज सवेरे मेरे पास आकर मुझे चोदने को कहती और हम रोज मजा लेते। तीन साल हो गए ऐसे ही मैं पूनम को चोदता रहा, पूनम को मुझसे एक बेटा हुआ है जो अभी 6 महीने का है। हम आज भी साथ सेक्स का मजा लेते हैं। सच में पूनम ने मेरी पत्नी की कमी पूरी कर दी। मेरे प्यारे दोस्तो, यह कहानी एकदम सच्ची है, आपको कैसी लगी, यह जरूर बताना। sachinvala143@gmail.com |
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