हिंदी सेक्सी कहानियां



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अंजलि की चुदाई

Posted: 25 Feb 2013 02:44 AM PST

सबसे पहले तो नमस्कार मेरे सभी प्यारे दोस्तों को।

मेरा नाम है राहुल रॉय और मैं एक दिल्ली की सॉफ्टवेर कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजिनियर हूँ। वैसे मुझे यह जॉब बिल्कुल पसंद नहीं थी लेकिन मैं यह जॉब सिर्फ सैलरी पॅकेज के लिए कर रहा था क्यूंकि यह कंपनी मुझे एक बहुत अच्छा सैलरी पैकेज दे रही थी। मुझे टीचिंग बहुत पसंद थी और मैंने बहुत बार सोचा भी था लेकिन इतना सैलरी पैकेज के बारे में सोच कर रह गया। दिल्ली में मैंने एक खुद का फ्लैट खरीद रखा था, लेकिन उस फ्लैट में रहने वाला सिर्फ मैं ही अकेला था। मेरी जिन्दगी एकदम बोरिंग हो चुकी थी।

मेरे एक दोस्त ने एक बार मुझे एक इंस्टिट्यूट का पता दिया और कहा कि यह एक कंप्यूटर इंस्टिट्यूट है जो कंप्यूटर कोर्सेस करवाता है और इस इंस्टिट्यूट में एक कंप्यूटर इंजिनियर की जरुरत है।

यह सुनते ही मैंने अप्लाई कर दिया और मुझे उस इंस्टिट्यूट से कॉल आई। मैं एकदम तैयार हो गया और इन्टरव्यू के लिए गया, और उन्होंने मुझे पास भी कर दिया। मैंने उनसे वीकेंड क्लास्सेस के लिए कहा तो उन्होंने मेरा आग्रह मान लिया।

बस फिर क्या था रोज काम के दिनों पर मैं अपने ऑफिस में काम करता था और सप्ताहान्त पर मैं इंस्टिट्यूट में क्लास लिया करता था। मेरी इंस्टिट्यूट में शनिवार और रविवार को 5 घंटे की क्लास चलती थी। मैं सुबह 9 बजे जाता, 10 बजे क्लास शुरू हो जाती,10 से 2 बजे तक क्लास चलती और 2 से 3 का ब्रेक और फिर 3 से 4 बजे तक चलती। 5 बजे मैं वहां से निकल जाता। अब क्यूंकि यह एक कंप्यूटर इंस्टिट्यूट है तो यहाँ पर बहुत कंप्यूटर थे और मेरी लैब में 8 कंप्यूटर थे। सुबह सुबह मैं 9 बजे आता और किसी भी एक सिस्टम पे बैठ जाता और इन्टरनेट खोल कर कुछ न कुछ सर्च करता रहता लेकिन जयादातर मैं पोर्न साईट खोल कर पोर्न मूवी देखता रहता था।

इंस्टिट्यूट के रिसेप्शन पर अंजलि नाम की एक लड़की बैठती थी। उसकी उम्र यही कोई 21 और फिगर तो लाजवाब था। कोई भी उसे देखे तो बस उसका मुँह खुला का खुला रह जाये। क्या फिगर था, चूचे होंगे 34 के, कमर एकदम पतली, कूल्हे एकदम गोल ओर सेक्सी।

मैं तो उसे जब भी देखता तो देखता ही रह जाता। लेकिन मुझे यह नहीं पता था कि उसके केबिन में रखा कंप्यूटर का लिंक सारे कंप्यूटरों से था मतलब अगर हम इंस्टिट्यूट के कोई भी कंप्यूटर पर कुछ भी करे तो वो रिसेप्शन पर रखे कंप्यूटर पर देखा जा सकता हैं और मैं तो हर रोज अपने कंप्यूटर पर ब्लू फिल्म देखता था।

एक दिन मैं ऐसे ही पोर्न देख रहा था और मैंने देखा कि अंजलि मेरे केबिन की तरफ आ रही थी। मैंने तुरंत ही ब्लू फिल्म बंद कर दी और कुछ और ही खोल लिया।

वो आई और मुझे देख कर चली गई। मैंने सोचा कि यह ऐसे देख कर क्यूँ गई। लेकिन बात तो कुछ और ही थी उसने उस दिन हिस्टरी चैक कर ली थी और इसलिए वो देखने आई थी।

लेकिन मुझे तो इसके बारे में कुछ भी नहीं पता था। पर अंजलि को मेरे ऊपर शक हो गया था कि मैं लैब में बैठ कर ब्लू फिल्म देखता हूँ।

एक दिन हम सब लोग बैठ कर लंच कर रहे थे तो तब मुझे पता चला कि यहाँ के सारे कंप्यूटर रिसेप्शन के कंप्यूटर से कनेक्ट हैं। यह सुन कर तो मेरी हवा निकल गई क्यूँकि मैं हर रोज ब्लू-फिल्म देखता था और इसका सारा रिकॉर्ड अंजलि के पास है। मैं अब अंजलि से नजर छुपा कर चलने लगा क्यूंकि मुझे काफी शर्म आती थी।

एक दिन मैं लैब में बैठ कर अपना अकाउंट चेक कर रहा था, मैंने देखा कि एक संजना नाम की लड़की का मेल आया है। मैंने उस मेल को रिप्लाई कर दिया और एक दिन वो संजना मुझे ऑनलाइन मिल गई तो मैंने उससे उसके बारे में पूछा तो उसने मुझे सिर्फ यह कहा कि वो मेरी बहुत बड़ी फ़ैन है और मुझे पसंद करती है।

फिर धीरे धीरे हमारी बातें शुरू हो गई और उसने बातों बातों में मेरा नंबर मांग लिया और मैंने भी दे दिया।

फिर मैंने उसे जल्दी कॉल करने के लिए कहा लेकिन उसने कॉल नहीं किया और ना ही दो दिन तक ऑनलाइन आई।

फिर एक दिन रात को मैं अपने लैपटॉप पर पोर्न मूवी देख रहा था तभी उसकी कॉल आई। पहले तो मैं घबरा गया कि अज्ञात नंबर से कॉल आ रही है लेकिन पता चला तो यह उसी संजना की कॉल थी, मैंने उससे बात की, क्या सेक्सी आवाज थी उसकी।

उसका हर रात को फ़ोन आता था और हम अब काफी खुल चुके थे।मैंने कई बार तो उससे मिलने के लिए कहा लेकिन उसने मना कर दिया मैंने सोचा कि यह तो सच में ही एक पागल लड़की है।

एक बार मै उसे कुछ नग्न तस्वीरें भेज दी और उसे फ़ोन किया, बात करने लगा। बात करते करते मेरी नजर रिसेप्शन पर गई, मैंने देखा कि रिसेप्शन में अंजलि भी किसी से बात कर रही थी। मैंने तुरंत ही फ़ोन काट दिया तो उसने भी फ़ोन हटा लिया। मैंने फिर कॉल लगाई तो उसने भी फ़ोन उठा लिया।

मुझे उस पर थोड़ा थोड़ा शक होने लगा। मैंने सोचा कि कैसे भी करके इसका मोबाइल नंबर निकलना पड़ेगा। तो यह मौका भी मुझे मिल गया।

एक दिन हम लोग सब बैठ के लंच कर रहे थे तो अंजलि भी मेरे सामने बैठी थी। वो उठी और बाथरूम चली गई। मैंने तुरंत उसका मोबाइल जो मेज पर रखा था उठाया और अपने सेल पर कॉल की तो पता चला कि यह तो वही नंबर है जो संजना का नंबर है।

मैं हैरान रह गया लेकिन फिर मुझे एक खुला मौका मिल गया अंजलि के साथ सेक्स करने का। बस फिर क्या था अब तो मैं अंजलि को चलते चलते आँखों ही आँखों मैं इशारे करता रहता था, कभी कभी उसे छू लेता था।

एक बार उसने मुझे बुलाया और कहा- यह फाइल ओपन नहीं हो रही, इसे ओपन कर दो।

मैंने कहा- ठीक है।

और उसके पास चला गया और मैंने कंप्यूटर के माउस को इस तरह पकड़ लिया कि मेरा एक हाथ उसके वक्ष से छू रहा था और मैं धीरे-धीरे दबाने लगा। उसकी सांसें तेज़ हो रही थी, इसका मुझे एहसास होने लगा था।

अब मैंने आखिरकार प्रोग्राम बनाया और एक दिन मैं शाम को उसके घर जा पहुँचा। वो मुझे देख कर हैरान रह गई। उसने मुझे अन्दर आने को कहा, मैं अन्दर गया और सोफा पर बैठ गया। उसने टीशर्ट और स्कर्ट पहन रखी थी। स्कर्ट उसके घुटनों तक थी।

वो मेरे लिए कॉफ़ी बनाने के लिए रसोई में चली गई। मैं भी उसके पीछे पीछे चला गया। वो मेरे सामने खड़ी थी, मैंने पीछे से आकर उसे पकड़ लिया और चूमने लगा, उसने मुझे धक्का मार कर अलग कर दिया। मैं फिर लिपट गया, उसे कस कर पकड़ लिया और उसके स्तन दबाने लगा। वो सेक्सी आवाज निकालने लगी और धीरे-धीरे मदहोश होने लगी।

मैंने उसे अपने हाथों में उठाया और सोफे पर लिटा दिया और उसे बुरी तरह से चूमने लगा। मैं उसकी टीशर्ट उठाने लगा तो उसना मुझे रोका और वहाँ से चली गई। मैंने उसका हाथ पकड़ा और बोला- क्या हुआ? तुम्हें पसंद नहीं?

अंजलि : तुम यहाँ से चले जाओ !

मैं : आज तुम कुछ भी कर लो, मैं नहीं जाऊँगा।

अंजलि : प्लीज़ !

मैंने : क्यूँ? फोन पर तो बहुत सेक्सी आवाज निकालती थी?

अंजलि : कैसा फ़ोन?

मैंने : कैसा फ़ोन? बताऊँ कैसा फ़ोन?

और मैंने उसका हाथ पकड़ कर उसे जकड़ लिया और कहा- तुम्हें क्या लगा कि मुझे कुछ नहीं पता? मुझे सब पता है, हर रात को तुम ही फ़ोन करती थी ना?

वो बोली- कैसा फ़ोन?

मैंने कहा- अच्छा कैसा फ़ोन?

और उसकी गांड में अपनी उंगली घुसा दी, वो चीख उठी।

मैंने कहा- समझ आया?

उसने कहा- ठीक है, मुझे माफ़ कर दो।

मैंने कहा- मैं तुम्हें माफ़ तब ही करूँगा जब जो तुम फ़ोन पर करती थी अब असलियत में करो।

उसने तुरंत ही अपनी आँखें बंद कर ली।

मैंने स्मूचिंग शुरू कर दी और करते करते उसे बेड पर लेटा दिया। उसके होंठ तो मैं ऐसे चूस रहा था जैसे उसका अन्दर का सारा रस आज ही पी जाऊँगा।

मैं उसके ऊपर लेटा था और वो मेरे नीचे। उसके बाद मैंने उसकी टीशर्ट फाड़ दी और उसके उरोज़ दबाने लगा। उसने गुलाबी रंग की ब्रा पहन रखी थी। उसके स्तन मुझे इतने प्यारे लगे कि उन पर से नजर और हाथ हटने का नाम ही नहीं ले रहे थे।

उसके मुँह से सिसकारियाँ निकल रही थी- आह ! ह !

इतने मैं मैंने देखा कि अंजलि पूरी तरह से मदहोश हो गई थी, अब वो मुझे पागलों की तरह इधर उधर चूमने लगी।

अब मैंने जल्दी से उसे पूरी नंगी कर दिया और उसकी चूत चाटने लगा। उसमें से मुझे एक अलग ही खुशबू आ रही थी। उसकी चूत चाटने की वजह से वो और मदहोश हो गई और उसने तुरंत मेरा लंड पकड़ लिया। वो तो पहले से ही खड़ा था। वो मेरे लंड को जोर जोर से चूमने लगी। मैंने उसके बाल पकड़ लिए और अपने लण्ड को अन्दर-बाहर करने लगा।

मैंने कहा- वाह अंजलि, आज तो तूने मज़ा ही दिला दिया।

उसने कहा- मज़ा अभी बाकी है।

और मैं अपना लंड उसकी चूत पर ले गया और चुदाई-कार्यक्रम शुरू किया। अंजलि पागल हो गई थी और बार बार चिल्लाये जा रही थी- आज जान ले लो मेरी ! जान से मार दो मुझे। मजा दे दो मुझे !

मेरे भी स्पीड अब तेज़ हो गई थी। मैं उसे तेज़ तेज़ चोदने लगा और 10-12 मिनट बाद हम दोनों ही झड़ गए। मैं उसके ऊपर ही गिर गया और उसी के ऊपर लेटा रहा।

हम दोनों की साँस फूल चुकी थी लेकिन यह तो कुछ नहीं, यह तो सिर्फ पहली शिफ्ट थी, उसके बाद रात में दो शिफ्ट और चली और मैं उस रात उसी के घर सो गया।

सुबह जब होश आया तो पता चला कि हम दोनों नंगे ही पड़े थे और 8 बज चुके थे। फिर हम दोनों उठे और एक दूसरे को चूमा और साथ ही फ्रेश होने चले गए।

वहाँ से निकल कर हम सीधा इंस्टिट्यूट चले गए और दिन भर काम के बाद रात को एक साथ डिनर किया और फिर से प्रोग्राम बनाया।

अब मैंने वो इंस्टिट्यूट छोड़ दिया है लेकिन मैं अभी भी अंजलि के साथ रिलेशन में हूँ और हम अक्सर वीकेंड्स पर मिलते हैं और फिर से प्रोग्राम सेट करते हैं।

अंजलि के बाद मैंने एक लड़की के साथ और सेक्स किया, यह कोई और नहीं मेरी ही एक छात्रा थी। यह कहानी भी मैं जल्दी ही भेजूँगा लेकिन मुझे मेल जरुर करें और बताएँ कि आपको मेरी यह कहानी कैसी लगी।

itsmerahul_roy27@rediffmail.com

कोमल गाण्ड को चोदा

Posted: 25 Feb 2013 02:05 AM PST

मैं जोरावर सिंह, राजस्थान से हूँ... गांव में बरसात ना होने के कारण हमारे यहाँ से बहुत से जवान फ़ौज में चले गये थे। मेरी पोस्टिंग उन दिनों राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके में थी। बोर्डर पर आतंकवादियों और तस्करों से निपटने के लिये हमारी एक ना एक टोली हमेशा बोर्डर की गश्त पर रहती थी। बोर्डर पर तब भी छुटपुट छोटे छोटे गांव थे... वहाँ के लोग कहने को पशु चराया करते थे जाने वे लोग वहाँ क्यों रहते थे? क्या वे आंतकियों की मदद करते थे?

एक रात गश्त के दौरान... दूर से हमने देखा कि एक स्थान पर आगजनी हो रही थी। मैं उस समय सबसे तेज दौड़ने वाला और बलिष्ठ जवानों में से एक था। लीडर ने मुझे इशारा किया। मैं हवा की तरफ़ दौड़ता हुआ मिनटों में वहाँ पहुंच गया। एक दो महिला की चीखों की आवाजे आ रही थी। मैंने देख कि एक घर आग की लपटों से घिरा हुआ था ... एक आवाज तो वहीं से आ रही थी। मैंने हिम्मत बांधी और उस जलती हुई झोंपड़ी में घुस गया...

अन्दर देखा कि एक कोने में एक युवती के हाथ-पांव बांध कर पटक रखा था। मैंने तुरन्त उसे खोला और उसे कंधे पर लादा और फिर से रेतीले जंगल में कूद पड़ा। झाड़ियों में से होते हुए मैं उस युवती को लिये हुये चलता रहा... फिर थक कर रेत के एक गड्डे में गिर पड़ा और हांफ़ने लगा।

तभी उस युवती की हंसी सुनाई दी।

"अरे, थक गए? मुझे क्यों उठाए भाग रहे हो? मैं कोई लंगड़ी लूली थोड़े ही हूँ... भली चंगी हूँ... फ़ौजी तो बस मजे..."

"चुप हरामजादी... साली को गोली मार दूंगा... एक तो बचा कर लाया !"

"मेरा मतलब था कि मुझे भी चलना आता है... कब तक मुझे उठा कर चलते... तुमसे तेज भाग लेती हूँ !

मुझे भी हंसी आ गई... पर इतना समय ही कहाँ था। बस, मेरा तो एक ही लक्ष्य था। उसे सुरक्षित स्थान पर ले जाना। कुछ ही समय बाद मैं वो उसके साथ पास वाले गांव में थे। वहाँ के मुखिया ने हमें बाहर एक झोंपड़ीनुमा घर में ठहरा दिया। रात के तीन बज रहे थे। मैं बाहर आकर एक रेत के टीले पर बैठ गया। तभी वो युवती भी आ गई।

मेरा नाम खेरूनिस्सा है...

मैं जोरावर सिंह ... फ़ौजी...

मैंने उसे अब ध्यान से देखा ... वो एक गोरी लड़की थी... पतली दुबली... पर तेज तर्रार... सुन्दर... शरीर का लोच... जैसे रबड़ की गुड़िया हो ... उसके स्तन ठीक ठाक थे ... बहुत बड़े नहीं थे ... पर उसके नितम्ब ... अच्छी गोलाई लिये हुये थे।

"हाय मेरी सलोनी... !"

"क्या कहा?"

"सलोनी ... मेरी पत्नी ... तुम्हारी ही तरह ..."

"बहुत प्यार करते हो उसे...!"

"बहुत ... बहुत ... इतना कि ... बस छ: माह से दूर हूँ ... उसकी याद तड़पा जाती है।" मैं कहीं दूर यादों में खोता हुआ बोल रहा था।

वो मेरे पास आकर बैठ गई। मैं अभी एक पठानी कुर्ते में था... खेरू भी पठानी कुर्ते में थी। जो हमें गांव के मुखिया ने दिया था।

"तुम क्या पहलवान हो?"

"नहीं, पर मैं फ़ौज में अपनी मरजी से पहलवानी करता हूँ ... दौड़ का अभ्यास करता हूँ ... ये मेरे बहुत काम आता है।"

वो मेरे और नजदीक आ गई और अपनी पीठ मेरी छाती से लगा दी और आराम से बैठ गई। मुझे बहुत सुकून सा मिला। एक नारी के तन का स्पर्श ... बहुत मन को भाया।

"मैं ऐसे बैठ जाऊँ ... बड़ा अच्छा लग रहा है।" खेरू ने मुझे मुस्करा कर देखा।

"सच... खेरू... तू तो मन को भा गई।"

"अल्लाह रे ... आप तो बड़े गुदगुदे से है ... आपकी गोदी में बैठ जाऊँ ...?" उसके आखों में एक ललाई सी थी।

मुझे बड़ी तेज सनसनी सी लगी। वो अपना कुर्ता ऊपर करके ठीक से मेरी गोदी में बैठ गई। मेरा पौरुष धीरे धीरे जागने लगा। एक युवती मेरी गोदी में आकर बैठ जाये तो लण्ड का विचलित होना स्वभाविक ही है।

"जरा सा ऊपर उठो तो ... मेरा कुर्ता फ़ंस रहा है ... ऊंचा कर लूँ ..." मैंने उससे कहा।

उसने अपनी गाण्ड धीरे से ऊपर कर ली, मैंने कुर्ता ऊपर खींच लिया। मेरी तरह उसने भी कुर्ते के नीचे कुछ नहीं पहन रखा था। वो सीधे ही मेरे लण्ड पर बैठ गई।

"अरे... कमाल है तू भी... नीचे कुछ पहना नहीं?"

तिरछी नजर से उसने मुझे देखा, मैं तो घायल सा हो गया।

"खेरू ... बैठी रह ... अच्छा लगे है..."

मेरा लण्ड अब सख्त होने लगा था। उसने मेरे गालों को सहला कर प्यार से चपत मारी- जानते हो जोरावर ... आप मुझे अच्छे लगने लगे हो...

" तू भी मेरे दिल को भाने लगी है..."

मेरा एक हाथ पकड़ कर उसने चूमा और उसे अपने कोमल से उभरे हुये स्तन पर रख दिया। उफ़्फ़ ! गरम गरम से... गुदाज और मांसल ... मैंने हल्के से उसे दबा दिये।

"ऐसे नहीं जी ... जरा जोर से ... दबाइये ... अह्ह्ह्ह"

मेरा लण्ड अब पूरी तरह से कठोर होकर खेरू की चूत को बराबर कुरेद रहा था। अब तो वो गीला भी हो चुका था। खेरू ने अपनी टांगों को और खोल सा लिया था ... वो मेरी छाती से लिपट गई थी।

उस्स्स ... अल्लाह ... उसने मेरा कुरता जोर से थाम लिया। मेरा सुपारा उसकी चूत में हौले से प्रवेश कर गया था। मैंने उसे जोर से जकड़ लिया था। ये किसी तरह का कोई आसन नहीं था ... बस हम दोनों आड़े टेढे से लिपटे हुये सुख भोग रहे थे।

तभी उसने भी अपने आप को सेट किया और मैंने भी उसे और लिपटा लिया। उसकी अधखुली आंखे मुझे ही निहार रही थी। लण्ड घुसता ही चला जा रहा था।

"अब्ब्ब्ब ... उह्ह्ह्ह ... मेरे राजा ... ये कैसा लग रहा है ... अम्मी जान ... अह्ह्ह्ह ..."

"मेरी खेरू ... मेरी जान ... आह्ह्ह्ह्ह ... कितना आनन्द आ रहा है ...।"

मेरा लण्ड पूरा भीतर बैठ गया था। वो तो जैसे अधखुली आँखों से सपने देख रही थी ... आनन्द की अनूभूतियाँ बटोर रही थी। फिर उसने जैसे नीचे से हिलना आरम्भ किया... जैसे रगड़ना ... मीठी मीठी सी जलन ... गुदगुदी ... एक कसक ... बस ऐसे ही हिलते हिलते हम आनन्द के दौर से गुजरने लगे... उसके थरथराते होंठ अब मेरे होंठो से दब चुके थे... उसके नर्म से कठोर उरोज... मसले जा रहे थे ... फिर जैसे एक ज्वार सा आया ... हम दोनों उसमें बह निकले...।

झड़ने के बाद भी हम दोनों वैसे ही वहीं पर गोदी में आनन्द लेते रहे। लण्ड झड़ कर कबका बाहर फिसल कर निकल चुका था। पर कुछ ही देर में लण्ड तो फिर से सख्त हो गया। इस बार खेरू ने अपनी मन की कर ही कर ही ली।

वो धीरे से मेरी गोदी से उठी और आगे झुक सी गई ... उसके गोल गोल मांसल चूतड़ खिल कर चांदनी में चमक उठे। मेरा लण्ड फिर से जोर मारने लगा।

मैंने तुरन्त निशाना साधा और उसकी कोमल गाण्ड में लण्ड का सुपाड़ा घुसा दिया।

वो खुशी से झूम उठी।

मैंने अपना लण्ड धीरे धीरे अन्दर बाहर करते हुये उसे पूरा घुसेड़ दिया। उसने अपना सर झुका कर रेत के गुबार पर रख दिया। मेरा लम्बूतरा लण्ड उसकी गाण्ड में मस्ती से चलने लगा था।

बहुत देर तक उसकी कोमल गाण्ड को चोदा था मैंने ... फिर मेरा स्खलन हो गया। उसकी चूत ने भी इस दौरान दो बार पानी छोड़ा था। फिर कुर्ता ठीक करके हम दोनो ही गहरी नींद में सो गये थे। सवेरे हमें उसी मुखिया ने जगाया ... हमने चाय वगैरह पी ... तभी हमारी जीप वहाँ आ गई थी।

मुख्यालय पर जाकर खेरू ने बताया कि बोर्डर से आने वाले आतंकियो को मार कर उनके हथियार वे लोग छुपा लेते थे ... उसकी निशान देही पर भारी मात्रा में हथियार की बरामदगी की गई। अब मेरे दिमाग में बोर्डर पर रहने वालों के लिये दुश्मनी का नहीं आदर का भाव आ गया था। खेरू द्वारा करवाई गई इस बरामदगी के लिये सराहा भी गया था।

लूट का माल

Posted: 25 Feb 2013 01:49 AM PST

हरजीत सिंह ज्यों ही कमरे में दाखिल हुआ, सन्तो पलंग पर से उठी। अपनी तेज-तर्रार आँखों से उसकी तरफ घूरकर देखा और दरवाजे की कुण्डी बन्द कर दी। रात के साढ़े ग्यारह बज चुके थे। शहर का वातावरण एक अजीब रहस्यमयी खामोशी के आगोश में था।

सन्तो पलंग पर पालथी मारकर बैठ गई। हरजीत सिंह, जो शायद अपने समस्यापूर्ण विचारों के उलझे हुए धागे खोल रहा था, हाथ में कृपाण लेकर एक कोने में खड़ा था। कुछ पल इसी तरह खामोशी में बीत गये। सन्तो को थोड़ी देर के बाद अपना आसन पसन्द न आया और दोनों टाँगें पलंग के नीचे लटकाकर उन्हें हिलाने लगी।

हरजीत सिंह फिर भी कुछ न बोला।

सन्तो भरे-भरे हाथ-पैरों वाली औरत थी। चौड़े-चकले चूतड़ों वाली थुल-थुल गोश्त से भरी पूरी। कुछ बहुत ही ज्यादा ऊपर को उठा हुआ वक्ष, तेज आँखें, चेहरे की बनावट से पता चलता था कि बड़े धड़ल्लेदार औरत है।

हरजीत सिंह सिर नीचा किये एक कोने में चुपचाप खड़ा था। सिर पर उसके कसकर बाँधी हुई पगड़ी ढीली हो रही थी। उसने हाथ में जो कृपाण पकड़ी हुई थी, उसमें थोड़ी-थोड़ी कम्पन थी, उसके आकार-प्रकार और डील-डौल से पता चलता था कि वह सन्तो जैसी औरत के लिए सर्वोपयुक्त मर्द है।

कुछ क्षण जब इसी तरह खामोशी में बीत गये तो सन्तो छलक पड़ी, लेकिन तेज-तेज आँखों को नचाकर वह सिर्फ इस कदर कह सकी- हर्जीतसिहां !

हरजीत सिंह ने गर्दन उठाकर सन्तो की तरफ देखा, मगर उसकी निगाहों की गोलियों की ताब न लाकर मुँह दूसरी तरफ मोड़ लिया।

सन्तो चिल्लाई- हरजीत सिंह !

लेकिन फौरन ही आवाज भींच ली, पलंग पर से उठकर उसकी तरफ होती हुई बोली- कित्थे गायब रये ऐन्ने दिन?

हरजीत सिंह ने खुश्क होठों पर जबान फेरी- मैन्नू नी पता।

सन्तो भन्ना गई- मा यव्या ! ऐ वी कोई जवाब होया !

हरजीत सिंह ने कृपाण एक तरफ रख दी और पलंग पर लेट गया। ऐसा लग रहा था कि वह कई दिनों का बीमार है।

सन्तो ने पलंग की तरफ देखा, जो अब हरजीत सिंह से लदा था, उसके दिल में हमदर्दी पैदा हो गई तो उसके माथे पर हाथ रखकर उसने बड़े प्यार से पूछा- यारा ! कि होया त्वानूँ?

हरजीत सिंह छत की तरफ देख रहा था। उससे निगाहें हटाकर उसने सन्तो ने परिचित चेहरे की टटोलना शुरू किया- सतवन्त !

आवाज में दर्द था। सन्तो सारी की सारी सिमटकर अपने ऊपरी होंठ में आ गई- बोल जाण।

कहकर वह उसको दाँतों से काटने लगी।

हरजीत सिंह ने पगड़ी उतार दी। सन्तो की तरफ सहारा लेने वाली निगाहों से देखा। उसके गोश्त भरे कूल्हे पर जोर से थप्पा मारा और सिर को झटका देकर अपने आपसे कहा- एस कुड़ी दा दिमांग ई खराब ऐ।

झटके देने से उसके बाल खुल गये। सन्तो उंगलियों से उनमें कंघी सी करने लगी। ऐसा करते हुए उसने बड़े प्यार से पूछा- सिंहा, कित्थे रये ऐन्ने दिन?

''भूरे दी मां दे घर !'' हरजीत सिंह ने सन्तो को घूरकर देखा और फौरन दोनों हाथों से उसके उभरे हुए सीने को मसलने लगा- कसम नाल ! वड्डी जानदार जनान्नी ऐ तूँ !

सन्तो ने एक अदा के साथ हरजीत सिंह के हाथ एक तरफ झटक दिये और पूछा- तवाणूँ मेरी सौं, दस्सो कित्थे रये ? शहर गये सी?''

हरजीत सिंह ने एक ही लपेट में अपने बालों का जूड़ा बनाते हुए जवाब दिया- ना !

सन्तो चिढ़ कर बोली- छूठ ! तूँ पक्का शहर गया होणा ते बोह्ता माल लुट्या होणा, मेर तों लुका रह्या ऐ !

'' जे मैं छूठ बोल्लां, मैं अपणे प्यो दा णी !''

सन्तो थोड़ी देर के लिए चुप रही लेकिन फौरन ही भड़क कर बोली- फ़ेर मैन्नू ऐ दस्स ! ओस्स रात तैन्नू कि होया सी? भला चंगा मेरे णाल पया सी, ओ सारे जेवर तूँ मैन्नू पा रक्खे सी जेहड़े तूँ शहरों लुट्ट के ल्याया सी। मेरियाँ पप्पियाँ लै रया सी। फ़ेर तैन्नू की होया के इक्कदम उठके लत्ते पैहन के बाह्र भज ग्या।

हरजीत सिंह का रंग पीला पड़ गया। सन्तो ने यह तबदीली देखते ही कहा- वेख्या किंवें रंग सरोंफ़ुल्ला पै गया सियाँ, कसम नाल, कुह ते झोल हैगा।

''तेरी सौं, कुझ वी नी !''

हरजीत सिंह की आवाज बेजान थी। सन्तो का शक और ज्यादा पक्का हो गया। होंठ भींचकर उसने एक-एक शब्द पर जोर देते हुए कहा- हर्जित्ता, की गल्ल ऐ, तूं ते अट्ठ दिनां विच बदल गया लगदा ऐं !

हरजीत सिंह एकदम उठ बैठा, जैसे किसी ने उस पर हमला किया था। सन्तो को अपने मजबूत बाजुओं में समेटकर उसने पूरी ताकत के साथ झिंझोड़ना शुरू कर दिया- जानी, मैं ओई याँ ! घुट-घुट कर पा जफ्फियाँ, हुण्णे कडदाँ तेरे हड्डाँ दी गर्मी।

सन्तो ने कोई विरोध नहीं किया लेकिन वह शिकायत करती रही- होया की सी तैन्नू ओस्स रात?

''भूरे दी मां दा ओ हो गया सी !''

''ते मैंनू नईं दस्सोगे?''

''कोई गल्ल होवे ताँ दस्साँ !''

''मैंनू अपने हत्थाँ नाल फ़ूक्को जे झूठ बोल्लो।''

हरजीत सिंह ने अपने बाजू उसकी गर्दन में डाल दिये और होंठ उसके होंठ पर गड़ा दिए। मूँछों के बाल सन्तो के नथुनों में घुसे, तो उसे छींक आ गई। हरजीत सिंह ने सन्तो को वासनामयी नजरों से देखकर कहा- आजा याराँ, इक वारी !

सन्तो ने एक अदा के साथ उसने अपनी आँखों की पुतलियाँ घुमाई, कहा- चल, दफा हो।

हरजीत सिंह ने उसके भरे हुए कूल्हे पर जोर से चुटकी भरी, सन्तो तड़पकर एक तरफ हट गई, ''न कर हरजितसियाँ, दर्द हुन्दा !

हरजीत सिंह ने आगे बढ़कर सन्तो की ऊपरी होंठ अपने दाँतों तले दबा लिया और कचकचाने लगा। सन्तो एकदम पिघल गई।

हरजीत सिंह ने अपना कुर्ता उतारकर फेंक दिया और कहा- ते फ़ेर हो जे इक्क वाजी?

सन्तो के होंठ कँपकँपाने लगा। हरजीत सिंह ने दोनों हाथों से सन्तो की कमीज पकड़ी और जिस तरह बकरे की खाल उतारते हैं, उसी तरह उसको उतारकर एक तरफ रख दिया, फिर उसने घूरकर उसके नंगे बदन को देखा और जोर से उसके बाजू पर चुटकी भरते हुए कहा- सन्तो, कसम नाल ! बड़ी करारी जन्नानी ऐ तूँ।

सन्तो अपने बाजू पर उभरते हुए धब्बे को देखने लगी- बड़ा जालिम ऐ तू सियाँ।

हरजीत सिंह अपनी घनी काली मूँछों में मुस्काया- होण दे अज्ज जालिम।

और यह कहकर उसने और जुल्म ढाने शुरू किये, सन्तो का ऊपरी होंठ दाँतों तले किचकिचाया, कान की लवों को काटा, उभरे हुए सीने को भँभोड़ा, भरे हुए कूल्हों पर आवाज पैदा करने वाले चाँटे मारे, गालों के मुँह भर भर कर बोसे लिये, चूस-चूसकर उसका सीना थूकों से लथेड़ दिया।

सन्तो तेज आँच पर चढ़ी हुई हांडी की तरह उबलने लगी। लेकिन हरजीत सिंह उन तमाम हीलों के बावजूद खुद में हरकत पैदा न कर सका। जितने गुर और जितने दाँव उसे याद थे, सबके-सब उसने पिट जाने वाले पहलवान की तरह इस्तेमाल कर दिये,परन्तु कोई कारगर न हुआ।

सन्तो के सारे बदन के तार तनकर खुद-ब-खुद बज रहे थे, गैरजरूरी छेड़-छाड़ से तंग आकर कहा- सियाँ, बहोत फेंट चुका, हुण्ण अग्गे वद !

यह सुनते ही हरजीत सिंह जैसे पानी पानी हो गया, हाँफता हुआ वह सतवन्त के पहलू में लेट गया और उसके माथे पर सर्द पसीने चूने लगे।

सन्तो ने उसे गरमाने की बहुत कोशिश की, मगर नाकाम रही। अब तक सब कुछ मुँह से कहे बगैर होता रहा था, लेकिन जब सन्तो के अंगों को कड़ी निराशा हुई तो वह झल्ला कर पलंग से उतर गई।

सामने खूँटी पर चादर पड़ी थी, उसे उतारकर उसने जल्दी-जल्दी ओढ़कर और नथुने फुलाकर बिफरे हुए लहजे में कहा- सरदारया, औ केहड़ी हरामजादी ऐ, जिहदे कोल तूँ ईन्ने दिन रहके आया ते जिन्ने तैन्नू निचोड़ छड्ड्या?

हरजीत सिंह ने थके हुए लहजे में कहा- कोई वी नी ! सतवन्त, कोई वी नी।

सन्तो ने अपने उभरे हुए कूल्हों पर हाथ रखकर एक दृढ़ता के साथ कहा- ''हरजित्तया ! मैं अज्ज झूठ-सच पुच्छ के रवांगी, खा सौं?''

हरजीत सिंह ने कुछ कहना चाहा, मगर सन्तो ने इसकी इजाजत न दी- सौं लैण तों पह्ल्लाँ सोच लयीं ! मैं सरदार अजमेर सिंह दी धी आँ !

हरजीत सिंह ने बड़े दु:ख के साथ हाँ में सिर हिलाया। सन्तो बिल्कुल पगला गई, लपककर कृपाण उठाई, म्यान को केले के छिलके की तरह उतारकर एक तरफ फेंका और हरजीत सिंह की जांघ पर वार कर दिया। लहू के फव्वारे छूट पड़े।

सन्तो को इससे भी तसल्ली न हुई तो उसने वहशी बिल्लियों की तरह हरजीत सिंह के केश नोचने शुरू कर दिये। साथ-ही-साथ वह अपनी नामालूम सौत को मोटी-मोटी गालियाँ देती रही। हरजीत सिंह ने थोड़ी देर बाद दुबली आवांज में विनती की, ''जाने दे अब सतवन्त, जाने दे।''

आवाज में बला का दर्द था। सन्तो पीछे हट गई।

सन्तो की ईष्या फिर भड़की- ओ है कौण? तेरी मां?

हरजीत सिंह की आँखें धुँधला रही थीं। एक हल्की-सी चमक उनमें पैदा हुई और उसने सन्तो से कहा, ''गाली न दे।''

और जब वह बताने लगा तो उसके माथे पर ठंडे पसीने के लेप होने लगे- सतवन्त ! शहर विच लूट होई ते सारे गहने-रुपये-पैसे मैं तैन्नू दे दित्ते, इक्क गल्ल नई दस्सी।

हरजीत सिंह ने घाव में दर्द महसूस किया और कराहने लगा। सन्तो ने उसकी तरफ तवज्जो न दी और बड़ी बेरहमी से पूछा, ''केड़ी गल्ल?''

हरजीत सिंह ने कहा- जेस्स घर ते मैं धावा बोल्या सी था...ओत्थे सत्त बन्दे सी, छे मैं कत्ल कर दित्ते...ऐस्सी किरपान नाल, सतवीं इक्क बोहत सोहणी कुड़ी सी, मैं ओन्नू चुक्क के लै आय्या।

सन्तो खामोश सुनती रही।

हरजीत सिंह ने कहा- 'ओ ऐन्नी सोहणी सी के मेर तों नईं रया गया !

सन्तो ने सिर्फ इस कदर कहा, ''हूं।''

" मैं ओन्नू मोड्डे ते पाके टुर पया... रस्ते विच...नहर दी पटरी उत्ते, झाड़ियाँ विच्च मैं ओन्नू थल्ले पाया।

सतवन्त ने थूक निकलकर हलक तर किया और पूछा- फ़ेर की होया?

हरजीत सिंह के हलक से मुश्किल से ये शब्द निकले- मैं ओन्नू नंगी किता ते अपणे कप्ड़े लाण लगया ते ओन्ने मेरी किरपान चुक्क लई... ते... !

उसकी आवाज डूब गयी।

सन्तो ने उसे झिंझोड़ा- फ़ेर?

हरजीत सिंह ने अपनी बन्द होती आँखें खोलीं और सन्तो के जिस्म की तरफ देखा- ओन्ने किरपान अपने गले ते फ़ेर लित्ती !

अंजलि की ट्रेन में चुदाई

Posted: 24 Feb 2013 06:29 PM PST


दोस्तो, नमस्ते, कैसे हैं आप लोग?

काफी दिनों से समय न मिलने के कारण आपके सामने न आ सका। माफ़ कीजियेगा दोस्तो !

वैसे झूठी कहानी मुझे लिखनी नहीं आती, मैं जो भी लिखता हूँ वो मेरी वास्ताविक कहानियाँ होती हैं, कुछ दिनों से काम में व्यस्त रहने के कारण कहानी न लिख सका, इस बीच मेरी जीवन में कुछ घटा, वो आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ !

मेरे ताया जी के लड़के की साली अन्जलि की शादी पटना में हुई है। वैसे उनकी शादी को डेढ़ साल हो गया है, उसका पति धीरज हमारे शहर में ही काम करता है, उनके घर और हमारे घर अक्सर आना जाता लगा रहता है, वैसे अंजलि 19 साल की है, देखने में स्लिम और खूबसूरत है, बूब्स 34 के हैं खूबसूरत लड़की है। अंजलि मेरी भी साली ही लगी तो अक्सर मजाक वगैरह चलता रहता था।

कुछ दिनों से वो अपने मायके पटना गई हुई थी। मुझे ऑफिस के काम से रांची जाना पड़ा, दीपावली के दिन थे, उन दिनों में अक्सर प्रवासी लोग अपने अपने घर जाते हैं और ट्रेनों का तो बुरा हाल होता है, पैर रखने की जगह नहीं होती। खैर मेरी किस्मत अच्छी थी, उसी दिन एक स्पेशल ट्रेन चली थी, मुझे उसमें सीट मिल गई।

मुझे वहाँ 3 दिन लग गये। मैंने अपना ऑफिस का काम निपटाया और रात को सोने लगा, रात के 10 बज रहे थे, धीरज बाबू का फ़ोन आया- कैसे हैं हैरी भाई?

मैंने कहा- ठीक हूँ। आप कैसे हैं?

थोड़ी बातें हुई, धीरज भाई ने कहा- हैरी, आज तुम्हारे घर गया था तो मालूम हुआ कि तुम रांची में हो।

मैंने कहा- हाँ !

धीरज ने कहा- वापिस कब आ रहे हो?

मैंने कहा- कल सुबह निकलूंगा।

धीरज भाई ने कहा- यार हैरी, अंजलि पटना में है ! तुम्हें मालूम है ना?

मैंने कहा- हाँ ! क्या हुआ उन्हें?

धीरज ने कहा- हुआ कुछ नहीं, असल में मैं सोच रहा था कि अगर तुम्हें कोई दिकत न हो तो अंजलि को आप अपने साथ ला सकते हो?

मैंने कहा- धीरज भाई, मुझे तो कोई दिकत नहीं है, पर मेरी ट्रेन कल सुबह की है और और जिस ट्रेन से मैं आ रहा हूँ, उसमें तो कोई सीट भी नहीं है, बड़ी मुश्किल से मुझे सीट मिली है, और अब तो वेटिंग भी नहीं मिल सकती। अगर आप पहले कहते तो मैं कोई जुगाड़ करता।

अचानक मुझे वो ट्रेन याद आई जिससे मैं आया था, वो पटना तक ही जाने वाली स्पेशल ट्रेन थी। मैंने मैंने धीरज को कहा- भाई, रुकिए देखता हूँ, एक स्पेशल ट्रेन चली थी ! शायद उसने जगह होगी, तो काम बन जाएगा।

मैंने अपना लैपटॉप ऑन किया और उस ट्रेन की स्थिति देखने लगा। उस ट्रेन में तो बहुत तो अभी भी 750 के करीब सीट खाली थी। मैंने धीरज को फ़ोन किया, कहा- एक स्पेशल ट्रेन है, उसमें सीट खाली है, मैं इन्टरनेट टिकट बुक कर लेता हूँ। मैंने 2 सीट बुक कर ली और धीरज को फ़ोन किया- आप अंजलि को फ़ोन कर दीजिये, कल मैं शाम 5 बजे तक पटना पहुँच जाऊँगा। ट्रेन 6 बजे शाम को है।

मैं शाम को 5.30 बजे पटना पहुँच गया। ट्रेन करीब 2 घंटे लेट थी, मैंने स्टेशन पर उतर कर देखा कि अंजलि और उनके पिता जी स्टेशन पर खड़े थे।

मैंने उनके पिता जी को नमस्ते किया और बातें करने लगा। अंजलि की उम्र करीब 19 साल की थी, नई-नई शादी हुई थी, मैं तो अंजलि को शादी के पहले से ही जानता था, शादी के पहले अंजलि के साथ बहुत घूमते फिरते थे। खैर वो समय कुछ और था, बातों बातों में 2 घंटे बीत गया, मालूम ही नहीं लगा, ट्रेन आ गई। हमारी सीट थर्ड ऐसी में थी।

हम लोग अपनी सीट पर बैठ गए, ट्रेन बिल्कुल खाली थी, ट्रेन में हमारे सिवा बस 2 लोग और थे।

मैंने सोचा कि शायद आगे से लोग आ जायेंगे ट्रेन में !

मैं और अंजलि बातें करने लगे, मजाक करने लगे। रात को करीब 11 बज गए, ट्रेन में कोई नहीं आया। सारी सीटें खाली थी, जो दो लोग बैठे थे, वो भी वहीं दिख रहे थे।

थोड़ी देर बात टीटी आया और टिकट चेक किया, मैंने टीटी से पूछा- सर ट्रेन खाली है, क्या बात है?

टीटी ने कहा- पूरी ट्रेन ही खाली है, हर बोगी में बस 2-4 लोग ही हैं बस।

मैंने कहा- सर, हमें तो डर लग रहा है, और मेरे साथ औरत भी है, कहीं कुछ उल्टा सीधा न हो जाए।

टीटी ने कहा- आप डरिये मत, ऐसा कुछ नहीं होगा।

और वो चला गया, ट्रेन चल रही थी, जैसे जैसे रात हो रही थी, हम डरे जा रहे थे कि कोई चोर लुटेरा न आ जाये और सिर्फ हम दोनों क्या कर सकते हैं।

मैंने अंजलि से कहा- चलो उतर जाते हैं, किसी और ट्रेन से चलेंगे।

ऐसे बातें करते करते फिर से टीटी मुझे जाता दिखा, मैंने टीटी से आग्रह किया- सर, जहाँ ज्यादा लोग हैं, हमें वहाँ बैठा दो, मेरे साथ में औरत है, मुझे डर लग रहा है।

टीटी ने कहा- आओ आपको फस्ट ऐसी में बैठा देता हूँ, आदमी तो उसने भी नहीं है पर उस बोगी में 4 परिवार वाले लोग हैं, वहाँ आप लोग सेफ महसूस करोगे।

टीटी में हमें अपनी सीट पर बैठा दिया और बोला- अब कोई टीटी नहीं आएगा, आप लोग दरवाजा लोक कर लीजिये।

हमने दरवाजा लोक किया थोड़ी जान में जान आई, अंजलि ने कहा- आओ अब खाना खा लेते हैं।

हम लोग खाना खाकर बातें करने लगे। अंजलि अपने सीट पर लेट गई, अंजलि को तो अभी भी डर लग रहा था, अंजलि ने कहा- हैरी, मुझे ट्रेन का सोच सोच कर अभी भी डर लग रहा है।

मैंने कहा- आ जाओ, मेरे पास सो जाओ।

अंजलि मेरे पास आकर लेट गई, मेरे मन में पहले वाला शैतान जाग गया। वैसे तो मैं अंजलि से शादी के पहले भी कई बार सेक्स कर चुका था पर अब काफी दिनों बाद यह मौका मिला। अंजलि मेरे साथ चिपक कर सोने लगी, मैं अंजलि के बूब्स को दबाने लगा, अंजलि कहने लगी- छोड़ो न हैरी, अब ये सब अच्छा नहीं लगता, मेरी शादी हो चुकी है।

मैंने कहा- ऐसे कैसे जाने दूँ यार अंजलि ! इतने दिनों बात तो फिर से भगवान ने फिर से मौका दिया है।

और पुरानी बातें याद करने लगे, धीरे धीरे मैं अंजलि की चूचियाँ दबाने लगा। अंजलि सिसकारियाँ लेने लगी और जोश में आने लगी। मैंने अंजलि के बलाउज के बटन खोल दिए और उसकी गोरी गोरी चूचियों को मुँह में लेकर चूसने लगा।

अंजलि सीईइ आअह्ह आह्ह करने लगी और मेरे ऊपर आकर मेरे अपने चूचियों को अच्छे से मेरे मुँह में डाल कर चुसवाने लगी ! मैं और अंजलि पूरे जोश में थे और ट्रेन भी पूरा तेजी में चल रही थी।

मैंने अंजलि की साड़ी ऊपर किया और उसके पैन्टी के ऊपर से उसके चूतड़ मसलने लगा। और अंजलि ऊपर से ही अपनी चूत मेरे लंड पर रगड़ रही थी।

अंजलि पूरी तरह से चुदने के लिए तैयार हो चुकी थी, बार बार अपनी चूत रगड़ रही थी।

मैंने अंजलि को कहा- रुको।

मैं पूरा नंगा हो गया और अंजलि की भी मैंने पैंटी उतार दी। अंजलि बहुत मस्त लग रही थी, काफी दिनों बात अंजलि को चोदने का मौका मिल रहा था।

मैंने अंजलि को इशारा किया कि मेरे लंड को चूसो।

अंजलि अपने प्यारे होंठों को मेरे लंड पर रखा और चूसने लगी, मुझे बहुत मजा मिल रहा था, मैंने अंजलि को कहा- रुको, दोनों मजा लेते हैं। तुम्हारी चूत चाटे हुए बहुत दिन हो गए हैं।

हम दोनों 69 की अवस्था में हो गए। मैं अंजलि की चूत को चाट रहा था और उसके चूत दाने को खूब अच्छे से चूस रहा था। अंजलि तड़प जाती, उसकी उसकी चूत बहुत पानी छोड़ रही थी !

मैं जोर जोर से उसकी चूत चाट रहा था और अंजलि भी जोश में मेरे लंड को खूब चूस रही थी।

और कभी कभी अपने दांतों से काट भी लेती।

अंजलि ने कहा- हैरी, अब करो ! बर्दाश्त के बाहर हो रहा है अब।

मैंने अंजलि को कहा- कैसे चुदवाओगी?

अंजलि शरमा गई !

मैंने अंजलि से कहा- अंजलि आओ यहाँ, घोड़ी बना कर तुम्हें चोदता हूँ।

मैंने अंजलि को कहा- सीट पकड़ कर झुक जाओ।

अंजलि सीट पकड़ कर झुक गई, अंजलि की खूबसूरत चूत देख कर लग रहा था कि पिया-मिलन की आस में आज ही चूत के बाल बनाये थे, एकदम चिकनी पाव रोटी की तरह फूली हुए चूत ! ऐसे लग रहा था कि चूत कह रही हो कि आओ अब डाल दो लंड !

बहुत खूबसूरत चूत लग रही थी।

मैंने देर न करते हुए अपने लंड पर थूक लगाया और अंजलि के चूत में जोर से पेल दिया। अंजलि की थोड़ी सी आवाज की- आअहाअ और लंड पूरा अन्दर अंजलि की चूत में समां गया ! मैं अंजलि के चूत के मजे लेने लगा और ट्रेन भी रफ्तार में थी तो और मजा आ रहा था। अंजलि को अपने आप धक्के लग रहे थे।

अंजलि भी अपनी गांड हिल हिल कर लंड का अभिनंदन कर रही थी और आहा वओओह आअए सीईईईई आआहाआ कर रही थी और गांड हिला हिला कर अपनी चूत चुदवा रही थी।

अंजलि ने काफी दिनों से नहीं चुदवाया था तो अंजलि की चूत ने जवाब दे दिया, अंजलि सीईईइ आआहा आआ कर कर के गांड को जोर जोर से हिलाने लगी और झर गई।

अंजलि थोड़ी सुस्त हो गई झरने के बाद। मैंने लंड को चूत से निकाल लिया।

अंजलि अब सीट पर लेट गई, मैं उसका हाथ पकड़ा और कहा- अंजलि मेरे लंड की मुठ मारो।

अंजलि ने कहा- अभी मूड नहीं कर रहा, थोड़ा रुक जाओ।

पर मुझे चैन कहाँ था, मैंने फिर से अंजलि के चूचियों को दबाने और चूसने लगा। जिससे अंजलि फिर से जोश में आ गई, मैं अंजलि के ऊपर चढ़ गया और अपनी अपना लंड के बार फिर से अंजलि के चूत में दौड़ाने लगा। अंजलि भी अब नीचे से मेरे धक्कों का जवाब अपने धक्कों से देने लगी। मैं अंजलि को जोर जोर से चोद रहा था और अंजलि भी नीचे से अपनी कमर हिला हिला कर मजे से चुद रही थी। इतने मजे से चुद रही थी कि कुछ देर तो वो अपनी आँखें बंद करके आअहाअ आअहाअ उह्हाआ उआअह कर रही थी और अपनी कमर जोर जोर से उचका रही थी।

चुदाई करते करते अंजलि जोर जोर से धक्के मारने को कहने लगी और अपने भी जोर जोर धक्के लगाने लगी- आअह्ह्ह्ह आआहा आआ आसीईईई आआए करते करते अपने दोनों पैर मेरी कमर को जोर से दबा दिया और कहने लगी- बस हैरी अब तो हो गया !

और हांफने लगी, थोड़ी ठण्ड का समय था, फिर भी हम दोनों पसीने से सराबोर हो गए थे।

अंजलि ने कहा- तुम्हारा नहीं हुआ क्या?

मैंने कहा- बस अब थोड़ा और ! मेरे भी होने वाला ही है।

मैंने जोर जोर से अंजलि के चूत के अन्दर-बाहर लंड करने लगा और अंजलि से कहा- अंजलि, अब मैं भी झरने वाला हूँ।

मैंने कहा- अंजलि, मुझे जोर से अपने बाहों में दबा लो ! ऐसे मुझे मजा आता है, जब मेरे माल गिरता है तो।

अंजलि जानती थी यह बात !

मैंने जोर जोर से आअहाआ आअहाअ करने लगा, अंजलि जोर से मुझे अपने बाहों में दबाने लगी और मैं झर गया।

अब मैं रिलेक्स महसूस कर रहा था, अंजलि की चूत में ऐसे ही लंड डाले थोड़ी देर अंजलि के ऊपर लेटा रहा, थोड़ी देर बाद अंजलि ने टिशु पेपर से अपनी चूत को साफ़ किया और हम दोनों सो गए।

रात को एक बात फिर मेरे दिल किया अंजलि को चोदने का, मैंने अंजलि को जगाया और फिर से एक बार चुदाई की और सो गए।

सुबह करीब 10 बजे हम सोकर जगे, थोड़ा नाश्ता किया और एक बजे तक हम अपने स्टेशन पर पहुँच गए।

धीरज बाबू वह स्टेशन पर आये हुए थे अपनी पत्नी अंजलि को रिसीव करने ! फिर धीरज बाबू अंजलि को अपने साथ ले गए अपने मोटरसाइकिल पर।

मुझे भी कह रहे थे कि आओ आप भी बैठ जाइए, आपको घर तक छोड़ दूंगा।

मैंने कहा- नहीं, आप लोग जाओ, मैं आ जाऊँगा।

मैंने फिर टेम्पू लिया और अपने घर चला गया।तो दोस्तों यह थी मेरी अभी हाल में हुई घटना।

कैसी लगी आपको मेरी यह कहानी?

जरूर बताइएगा !

sexygirl4uonly16@gmailcom

पूरा साल देती रहना

Posted: 24 Feb 2013 05:46 AM PST



मेरा नाम सैंडी है, इक्कीस साल की पंजाबन बीए के दूसरे साल की छात्रा हूँ। हम तीन बहनें हैं, मैं दूसरे नंबर की हूँ। मेरा गोरा रंग, पतली कमर, तीखे नैन-नक्श हैं, छल छल करता जिस्म है।

कई बॉय फ्रेंड बनाये और बदले हैं, दसवीं में ही चुद गई थी जब मेरा पहला एफेयर राजू नाम के लड़के से चला। हमारी मुलाकातें शुरु हुई, पहले ये मुलाकातें सिनेमा में जहाँ होंठ से होंठ चूमने का काम शुरु हुआ, फिर कभी कभी उसकी कार में मिलने लगे, फिर साइबर कैफे में मिले, केबिन में पहली बार उसने मेरे मम्मे दबाये, चुचूक चूसे, घंटों-घंटों स्कूल से भाग़ उसके संग बैठने लगी, वहाँ हल्का म्यूजिक चलता रहता। सभी आशिक जोड़े अब कैफे में मिलने लगे थे।

एक दिन उसने अपना लौड़ा निकाल हाथ में दिया, सांवले रंग का मोटा लंबा था, वेबसाइट पर नंगी तस्वीरें मुझे दिखाकर बोला- मुँह में ले !

मैंने मुँह में लेकर चूसा, मजा बहुत आया। अब थोड़ी देर रोज़ मिलते ही थे, मोनिटर साइड पर कर वो मेज पर बैठ जाता, मैं कुर्सी पर बैठ उसका लौड़ा चूसती, फिर मैं मेज पर बैठकर सलवार खिसका उससे अपनी फुदी चटवाती, मम्मे चुसवाती।

आखिर एक दिन उसका घर खाली था, मुझे घर ले गया, जाते ही दोनों बिस्तर में एक दूसरे के अंग चूसने लगे, पहली बार उसने मेरी फुद्दी मारी, सील तोड़ दी, खून निकला, दर्द हुआ, मजा भी आया। पहली बार उसका जल्दी निकल गया इसलिए दोबारा खड़ा करके उसने दूसरा राऊंड लगाया, काफी वक़्त निकला, घोड़ी भी बनाया।

अब जब सील टूट गई, खून भी निकल चुका था, अब कैफे में में उसका खड़ा करवाती चूस कर फिर वो कुर्सी पर बैठ जाता और मैं उस पर बैठ जाती, मेरे मम्मे उसके मुँह के करीब होते और लौड़ा फुद्दी में।

उसका दूसरी लड़की से एफेयर निकला, इधर मैंने भी बॉय फ्रेंड बदल दिया। फिर अगले कुछ सालों में मैंने कई लड़कों से एफेयर चलाये और सभी को अपनी जगह रख हेंडल किया।

फिर दीदी की शादी हो गई, ससुराल चली गई। जीजा जी बहुत बहुत हैण्डसम-स्मार्ट हैं।

पहले वो सामान्य रहे लेकिन फिर उन्होंने मुझमें दिलचस्पी लेनी शुरु कर दी। मैं भी उन पर मरने लगी, दोनों एक दूसरे की ओर खिंचने लगे।

सर्दी के दिन थे, दीदी-जीजू आये हुए थे, मुझे याद है नया साल चढ़ने वाली रात थी।

पापा और जीजा जी ने बैठकर दारु के पैग खींचे और फिर सबने एक साथ डिनर भी किया। जीजाजी की आँखों में नशा था और मेरे प्रति प्यास।

सभी रजाई में बैठ कर टी वी का कार्यक्रम देखने लगे। पहले दीदी, फिर जीजू फिर मैं और मेरे आगे माँ बैठी थी।

मैंने नोट किया जीजू मेरी तरफ सरके, इधर माँ झपकियाँ लेने लगी, उठी, बोली- मुझे नींद आ रही है।

माँ सोने चली गई, उधर दीदी भी बार बार झपकी ले रही थी। जीजू ने मेरी रजाई में हाथ घुसाया, मैं उनकी तरफ सरकी, नज़र दोनों की टी.वी पर थी, उनका हाथ मेरी जांघ पर रेंगने लगा। मैंने अपना हाथ घुसाया और उनके लौड़े को पकड़ लिया। वो पहले ही खड़ा हुआ था। जीजू ने मेरा हाथ पकड़ा और अपने लोअर में घुसा दिया।

हाय ! उनका कितना बड़ा था उनका !

मैं उनकी मुठ मारने लगी। देखा कि दीदी सो गई तो मैंने चेहरा उनकी ओर घुमाया, मेरे होंठ चूम लिए जीजा जी ने, मेरा हाथ हटाया और दीदी से बोले- जान सो गई क्या?

"हाँ !"

"चलो सोने चलते हैं फिर !"

"ठीक !"

मैं चुदना चाहती थी, बोली- जाओ, मैं दूध लेकर आती हूँ !

दीदी बोली- मुझे नहीं पीना !

जीजू बोले- पीना चाहिए !

मैंने दादी के कमरे से नींद की दो गोलियाँ पीस दीदी के ग्लास में मिला दी, बाकी जीजू ने काम किया, उठाकर पिला दिया।

माँ-पापा की नींद बहुत गहरी है।

मैं वापिस आकर लेट गई, आधे घंटे बाद जीजू आए, दरवाज़ा खुला था, मैंने नीचे सिर्फ पैंटी पहनी थी, ऊपर सिर्फ टीशर्ट !

"जीजा ! दरवाज़े को कुण्डी लगा कर आना !"

जैसे वो आये, रजाई में हाथ डाला- तू तो तैयारी करके बैठी है !

जीजू ने रजाई हटाई, मेरी टांगें फैला कर मेरी फ़ुद्दी का मुआयना किया और दाने को चाटने लगे। मेरा हाथ उनके बालों में फिरने लगा। उनको फ़ुद्दी चाटनी पसंद थी, एक उंगली फुद्दी में डाल घुमाने लगे और साथ दाना चाटने लगे। मेरे तो चूतड़ मस्ती में उठने लगे।

"लगता है काफी नज़ारे लूटें हैं?"

मैं चुप रही, मैंने भी उनका लौड़ा चूसने की इच्छा जताई तो जीजा जी उसी पल फ़ैल गए, मैं चुपचाप उनका लौड़ा चाटने लगी- बहुत मोटा है आपका !

"पसंद आया?"

"बहुत !"

"जिस दिन चहिए, फ़ोन कर दिया करना !"

"ज़रूर ! जीजा अब मारो न मेरी !"

जीजा ने मेरी फुद्दी में घुसा दिया !

नये साल वाले मिनट में जीजा का लौड़ा मेरे अंदर था, जीजू बोले- देख नये साल वाले मिनट तेरी ले रहा हूँ, अब पूरा साल ऐसे देती रहना मुझे और अपने आशिकों को !

"हाय मर गई ! बहुत लंबा-मोटा है ! चीर दी फुद्दी साली की ! खा गई लौड़ा जीजा का ! जोर जोर से मारो मेरी ! हाय फाड़ दो मेरी ! बहुत अच्छे ! अह अह !"

मुझे बहुत मजा आया ! इस तरह मेरे जीजू से मेरे अन्तरंग सम्बन्ध स्थापित हो गए।

जब कोई नई घटना घटेगी तो ज़रूर लिखूँगी।

sandysweetkandy@yahoo.com

चुदाई के लिए माल -2

Posted: 24 Feb 2013 05:38 AM PST


अगली रात को मेरे कहने पर भाभी ने अपना ब्लाउज खोला और अपने चूचे मेरे हाथों में दे दिए। क्या मस्त नर्म नर्म चूचे थे मानो स्पंज की गेंदें मेरे हाथो में हो।

मैंने उनके स्तनों को खूब मसला और चूसा। नीचे मैं उनकी चूत में उंगली भी कर रहा था। अब मेरी इच्छा उनको चोदने की थी पर क्योंकि उसमें खतरा था तो हम लोग चुदाई नहीं कर पा रहे थे।

1-2 बार हम लोगों ने हिम्मत भी की और मैंने अपना लण्ड उनकी चूत में डाला पर यह काम पूरा नहीं हो पाया।

मैंने उनसे कहा- मैं उनको पूरा नंगा करके चोदना चाहता हूँ !

तो वो बोली- चाहती तो मैं भी हूँ पर अभी नहीं कर सकते। हम लोगों को सही मौके का इंतजार करना पड़ेगा।

हम लोगों का यह चूसने और रगड़ने का सिलसिला करीब महीने भर तक चलता रहा।

लगभग एक महीने बाद एक दिन दोपहर में जब मैं ऑफिस में था तभी भाभी का कॉल मेरे फ़ोन पर आया, उन्होंने कहा- जल्दी घर आ जाओ, कल की छुट्टी लेकर।

मैंने पूछा- क्या हुआ?

तो वो बोली- घर आ जाओ, बताती हूँ।

मुझे अजीब सा डर लग रहा था, पता नहीं क्या हुआ होगा।

मैं तुरंत घर पंहुचा और बेल बजाई तो भाभी ने दरवाजा खोला। मैंने तुरंत ही पूछा- क्या हुआ?

उन्होंने मुझे पकड़ कर अंदर कर लिया और दरवाजा बंद कर दिया। फिर वो पलट कर मेरे गले लग गई और मेरे होठों को चूमने लगी। मैंने भी उनके होठों को चूमा पर मुझे ध्यान आया कि चाचा चाची घर पर ही होंगे तो मैंने भाभी को अपने से अलग किया और पूछा- मुझे इतनी जल्दी क्यों बुलाया?

तो भाभी मुस्कुराते हुए बोली- अभी अचानक इनके मामा की तबियत बहुत खराब हो गई तो सबको वहाँ जाना पड़ा और वो कल शाम तक वापस आयेंगे। तो मैंने सोचा कि क्यों ना इस मौके का फायदा उठाया जाए तो मैंने तुमको कॉल करके जल्दी बुलाया और कल की छुट्टी लेने को बोला।

मेरे खाने की व्यवस्था के कारण भाभी नहीं गई।

मैंने ख़ुशी से भाभी को गले लगा लिया और उनके होठों पर होंठ रख कर बोला- मेरी प्यारी चुदक्कड़ भाभी, अब अपनी चूत की खैर मनाओ।

यह कह कर मैं उनके होठों को चूमने लगा, वो भी बड़े मज़े से मेरा साथ दे रही थी। थोड़ी देर तक चूमने के बाद मैं बोला- तो क्या योजना है भाभी? कार्यक्रम शुरु किया जाये?

तो वो बोली- थोड़ा इंतज़ार करो, मैं बेटे को सुला दूँ, फिर तो हम लोगों को सिर्फ चुदाई का खेल खेलना है।

मैंने कहा- चलो ठीक है।

यह कह कर भाभी अपने कमरे में चली गई और मैं अपने कपड़े बदलने आ गया।

थोड़ी देर में जब मैं भाभी के कमरे में गया तो देखा भाभी करवट लेकर अपने बेटे को सुला रही हैं, पीछे से उनके नितम्ब बहुत मस्त लग रहे थे तो मैं भी उनके पीछे लेट गया और उनके नितम्ब सहलाने और दबाने लगा।

भाभी बोली- थोड़ा रुक जाओ !

तो मैंने कहा- भाभी, इतने दिनों की प्यास है, कैसे रुक जाऊँ?

यह सुन कर वो मुस्कुराई। मैं पीछे से भाभी की साड़ी ऊपर करके उनकी जांघों को सहलाने लगा, फिर मैंने पीछे से उनकी साड़ी उनके नितम्बों के ऊपर तक उठा दी। उन्होंने चड्डी नहीं पहनी थी और मैंने पहली बार दिन की रोशनी में उनके नितम्ब देखे थे, वो बहुत चिकने और मस्त थे, गोल गोल उभरे हुए।

मैं उनको सहलाने लगा, फिर मैंने उनके नितम्बों को थोड़ा चौड़ा किया तो मुझे उनकी गाण्ड का छेद दिखने लगा। वो भूरा सा छोटा सा छेद बहुत मस्त लग रहा था। मैंने अपनी उंगली उनके गाण्ड के छेद में डाल दी तो भाभी थोड़ा सा कसमसाई और मैं धीरे-धीरे उनकी गाण्ड के छेद में उंगली अन्दर-बाहर करने लगा।

फिर मैं पीछे से ही उनकी जांघों के बीच में से उनकी चूत पर उंगली फ़िराने लगा। मेरी उंगली उनकी चूत के अंदर जा रही थी। उन्होंने भी अपनी टाँगें थोड़ी चौड़ी कर ली ताकि मैं आराम से उनकी चूत को सहला सकूँ।

फिर मैंने अपना पजामा नीचे करके अपना लण्ड निकाला और उनकी गाण्ड के छेद पर लगाने लगा। मैं थोड़ी देर तक यही सब करता रहा और उनको पीछे से चूमता रहा।

जब भाभी का बेटा सो गया तो भाभी मेरी तरफ पलटी और मेरे होंठों पर होंठ रख कर बोली- अब बोलो, बड़ी जल्दी पड़ी थी ना तुमको?

मैंने उनको अपनी बाहों में ले लिया और हमारे होंठ एक दूसरे से उलझ गए। मैं कभी उनके मुँह में जीभ डालता कभी वो मेरे मुँह में। मैं उनके होंठों को संतरे की फ़ांकों की तरह चूस रहा था। बहुत रसीले होंठ है मेरी भाभी के।

मेरे हाथ कभी उनके चूचों को मसलते तो कभी उनकी जांघों को। अब तक मैंने आगे से भी उनकी साड़ी उठा दी थी। मेरा हाथ उनकी चूत को मसल रहा था और वो इससे मस्त हो रही थी। मुझे पता चल रहा था कि भाभी की चूत बिल्कुल चिकनी है आज भी।

मैंने भाभी से पूछा तो वो बोली- तुमको फ़ोन करके मैंने सबसे पहले अपनी चूत को शेव किया था तुम्हारे लिए !

तो मैं बोला- तो मुझे उस जन्नत के दरवाजे के दर्शन तो करने दो !

भाभी बोली- अब तो यह दरवाजा तुम्हारे लिए ही खुला है जो मर्ज़ी हो वो करो।

इतना सुन कर मैं नीचे की तरफ सरका और मुँह उनकी चूत के पास ले गया। आज पहली बार मैं उनकी चूत को रोशनी में देख रहा था। गुलाब की पंखुडियों की तरह की दो फांकें, एकदम फूली हुई। एकदम मस्त फुद्दी थी उनकी किसी मस्त माल की तरह।

मैंने अपनी उंगली से उनको थोड़ा चौड़ा किया तो बीच में लाल रंग का उनकी चूत का छेद मानो सुबह के सूरज की रोशनी हो। मैंने पूरी सांस लेकर उनकी चूत की खुशबू ली और उनकी टाँगें उठा कर अपने कंधों पर रख ली ताकि उनकी चूत थोड़ी और चौड़ी हो जाये।

फिर बिना इंतज़ार किये अपनी जीभ उनकी चूत में डाल दी। मैंने उनकी चूत को अपने मुँह में लेकर चूसने लगा। मुझे बहुत मज़ा आ रहा था। मैंने भाभी की तरफ देखा वो आँखें बंद करके पूरे मज़ा ले रही थी।

उन्होंने आँखें बंद करके मेरा सर अपने हाथों में पकड़ रखा था और मेरे मुँह को अपनी चूत की तरफ दबा रही थी। उनकी चूत से थोड़ा थोड़ा पानी निकलने लगा था। मेरे हाथ उनके वक्ष पर थे और मैं उनको दबा रहा था।

थोड़ी देर तक उनकी चूत चूसने के बाद मैं उनके ऊपर बैठ गया और उनके ब्लाउज के बटन खोलने लगा। जब मैंने उनके बटन खोल कर उनके को ब्लाउज हटाया तो उनके गोरे गोरे भारी स्तन मेरे सामने थे। उन्होंने काले रंग की पारदर्शी ब्रा पहन रखी थी जिसमें से उनके चुचूक नज़र आ रहे थे।

मैंने उनके कंधों से ब्रा के स्ट्रप नीचे कर दिए जिससे उनके स्तन बाहर उछल पड़े। मैंने उनके नंगे चूचों को हाथ में लेकर खूब दबाया। बहुत नरम मुलायम चूचे थे उनके।

मैंने उनके चुचूकों को खूब मसला फिर सर नीचे करके मुँह में लेकर चूसने लगा।

थोड़ी देर में भाभी ने मुझे नीचे लिटा दिया और मेरे ऊपर चढ़ कर मुझे चूमने लगी। मुझे बहुत मज़ा आ रहा था क्योंकि उनके खुले हुए स्तन मेरे शरीर को जगह जगह छू रहे थे। फिर वो नीचे की तरफ उतरी और मेरा पजामा पूरा उतार दिया और मेरे लण्ड से खेलने लगी। उन्होंने मेरे लण्ड को चाटा और फिर मुँह में लेकर चूसने लगी।

वैसे तो हम लोग यह काम रोज ही करते थे पर आज की बात ही कुछ और थी क्योंकि आज तक हमने एक दूसरे के गुप्तांगों को रोशनी में सही से नहीं देखा था और दूसरा यह कि रोज घर में सब लोग होते थे तो हर वक़्त किसी के आने का डर लगा रहता तो हम लोग पूरे मज़े नहीं ले पाते थे।

पर आज हम आज़ाद थे अपना सेक्स की भूख का नंगा नाच करने को। भाभी मेरे लण्ड को लॉलीपोप की तरह चाट और चूस रही थी। मेरा लण्ड उनके मुँह में अंदर-बाहर हो रहा था। बहुत मज़ा आ रहा था मुझे। मैं सिर्फ लिख सकता हूँ पर क्या मज़ा था आप लोग प्लीज सोच कर देखिये।

जब भाभी मेरा लण्ड चूस रही तो मैंने अपनी टीशर्ट उतार दी और मैं पूरा नंगा था, अब बारी थी अपनी गोरी चिकनी भाभी के बचे हुए कपड़े उतार कर उनको नंगा करने की।

मैंने भाभी को पकड़ कर खड़ा कर दिया और बिल्कुल द्रोपदी के चीरहरण की तरह उनकी साड़ी खींचनी शुरु कर दी।

भाभी भी गोल गोल घूम के अपनी साड़ी उतरवा रही थी।

अब उनके पेटीकोट की बारी थी जो उनके शरीर के पूरे दर्शन करने में बीच में आ रहा था। मैं उनके पास गया और उनका नाड़ा खोल कर पेटीकोट थोड़ा चौड़ा कर दिया और जैसे ही मैंने पेटीकोट छोड़ा वो नीचे गिर गया।

अब मेरी इतने दिनों की इच्छा पूरी हो गई थी औत भाभी भी मेरे सामने बिल्कुल नंगी एक रंडी की तरह खड़ी थी। मैं उनके शरीर को देख रहा था। गुलाबी होंठ, तने हुए स्तन, फूली हुई चूत और पीछे गोल गोल तरबूज जैसे नितम्ब।

आज मुझे भाभी के तीनों छेदों में अपना लण्ड डालना था।

भाभी मुझसे लिपट गई और बोली- अब रहा नहीं जा रहा ! मेरी चूत का रिबन काट दो।

मैंने भाभी को पंलग पर लिटाया और उनके ऊपर बैठ कर उनकी चूत पर अपन लण्ड रखा और भाभी को बोला- भाभी, मस्त चुदाई मुबारक हो !

वो भी बोली- तुमको भी ! बहुत इंतज़ार के बाद यह मौका मिला है तो शुरु करो।

इतना सुन कर मैंने एक झटका मारा तो मेरा टोपा उनकी चूत के छेद में घुस गया।मस्ती से भाभी के मुँह से भी आहा उह्ह की आवाजें निकलने लगी। मेरे अगले झटके से भाभी की चूत में मेरा पूरा लण्ड घुस गया। भाभी खूब चुदी हुई थी तो मुझे लण्ड डालने में कोई परेशानी नहीं हुई पर इतनी चुदाई के बाद भी उनकी चूत कसी हुई थी। मैं अपना लण्ड उनकी चूत में अंदर-बाहर करने लगा। वो भी अपनी गाण्ड उचका-उचका के मेरा साथ दे रही थी, मैं साथ में उनके स्तन दबा रहा था और होंठ चूस रहा था।

थोड़ी देर में ही हम लोगों का पानी निकलने लगा तो पूरे कमरे में पच पच की आवाजें आने लगी। भाभी चिल्ला रही थी- चोदो राजा चोदो, अपनी भाभी को अपनी पत्नी, अपनी रखैल की तरह चोदो और मेरी सारी तम्मना पूरी कर दो।

मैं भी उनको चोदते चोदते बोल रहा था- भाभी, बहुत दिनों से तुम्हारी मारना चाहता था पर मौका नहीं मिल पा रहा था तो आज मैं तुमको नहीं छोड़ूंगा, तेरी पूरी तरह से मार लूंगा आज। मेरी रानी आज तू मेरी माल है और मैं अपने माल को आसानी से नहीं छोड़ता।

भाभी बोली- मेरे राजा, तुम चोदो, छोड़ने की बात क्यों करते हो? आज तो मैं ही तुमको नहीं छोड़ूँगी।

करीब 25 मिनट बाद हम दोनों ने अपना पानी छोड़ दिया। मैंने अपना सारा रस उनकी चूत में ही निकाल दिया। मैं उनके ऊपर ही लेट कर सो गया।

फिर हम दोनों उठे क्योंकि उनके बेटे के उठने का समय हो गया था, मन तो नहीं कर रहा था पर मज़बूरी थी।

फिर रात को भाभी ने सेक्सी मेक्सी पहनी बिल्कुल पारदर्शी, और हमने सेक्स के मज़े लिए।

अगली दिन सुबह जब उनका बेटा स्कूल चला गया तो वो मेरे पास आई। मैं तब तक सो रहा था, बिल्कुल नंगा। उन्होंने मुझे चादर उढ़ा दी थी। वो मेरे ऊपर चढ़ कर बैठ गई और मेरा लण्ड पकड़ के अपनी चूत पर लगा के जोर से बैठी तो मेरा लण्ड उनकी चूत में उतर गया।

वो मेरे ऊपर बैठी बैठी उचक रही थी और मैं नीचे मज़ा ले रहा था।

उस दिन हम लोगों ने दिन भर सेक्स किया, बिना समय ख़राब किये। हम लोग अपना पानी छोड़ते और थोड़ी देर में फिर तैयार हो जाते और चुदाई करते। मैंने भाभी को घोड़ी बना कर भी चोदा, उनको उल्टा लिटा कर उनकी चूत मारी।

दिन में हम लोगों ने कैमरा लगा कर उसको टीवी से जोड़ दिया तो हम लोगों की लाइव चुदाई हम लोग टीवी पर भी देखते जा रहे थे, बिल्कुल ब्लू फ़िल्म की तरह लग रही थी। शाम तक हम लोगों का यही कार्यक्रम चला। जब शाम को भाई का कॉल आया कि वो भोपाल पहुच गए हैं तब हमने अपनी एक फ़ाइनल चुदाई की और नहाने चले गए और तैयार होकर बैठ गए।

जब तक उन लोगों ने दरवाजे की घंटी नहीं बजा दी हम लोग एक दूसरे से चिपके हुए थे और जो कुछ कर सकते थे वो कर रहे थे।

मैं उनकी चूत में उंगली कर रहा था वो मेरा लण्ड चूस लेती थी। बैठे बैठे भी हम लोगों ने चुदाई की। वो मेरी गोदी में बैठ के मेरा लण्ड अपनी चूत में डलवा कर उचक रही थी और साथ में ही उनके स्तन भी उछाले मार रहे थे। मस्त दृश्य था वो भी।

आप खुद ही सोचो आपकी गोदी में बैठ कर कोई लड़की अपनी चूत मरवाए और उसके चूचे भी ऊपर-नीचे उछल रहे हो तो कैसा लगेगा आपको।

उस दिन के बाद जब भी हम लोगों को मौका मिलता हम चुदाई करते। मैं भोपाल करीब 6 महीने रहा और भाभी की चुदाई की। उसके बाद भी भाभी मुझे घरवालों का कार्यक्रम बता देती और जब उन लोगों को बाहर जाना होता तो मैं पहुँच जाता और उनके जाने के बाद हम अपनी यादें ताज़ा करते चुदाई करके !

पर ये मौके कम ही मिले तो आज भी अपनी भाभी और उनकी सोनपरी जैसी चूत को याद करता हूँ।

इस दो दिन की चुदाई में मैंने भाभी को साथ नहाते समय भी चोदा और तभी उनकी गाण्ड मारी। पर वो मेरी अगली कहानी में बताऊँगा क्योंकि वो अपने में एक अलग अनुभव है।

यह कहानी आपको कैसी लगी, कृपया जरूर बताइएगा। मुझे आपके प्रोत्साहन की जरुरत है तो मेल जरूर करें।

आपका संजय

sexpujariindelhi@yahoo.in

मम्मी-पापा का खेल

Posted: 24 Feb 2013 05:25 AM PST

रात को अचानक पापा के कमरे की बत्ती जलने से बन्टी की नींद खुल गई। बन्टी को पेशाब आने लगा था। दीदी पास ही सो रही थी। बन्टी ने दरवाजा खोला और बाथरूम में चला गया।

बाहर आते ही बन्टी को खिड़की से अपने पापा की एक झलक दिखी। वो बिलकुल नंगे थे।

उसे उत्सुकता हुई कि इस समय पापा नंगे क्यों हैं?

खिड़की पूरी खुली हुई थी, शायद रात के दो बजे उन्हें लगा होगा कि सभी सो रहे होंगे। उसे दूर से सब कुछ साफ़ साफ़ दिख रहा था। उन्होंने अपने हाथ में अपना लण्ड पकड़ा हुआ था और वे मम्मी को जगा रहे थे।

बन्टी को रोमांच हो आया। बन्टी जल्दी से अपनी मेघना दीदी को जगाया और उसे बाहर लेकर आया। उस दृश्य को देखते ही मेघना की नींद उड़ गई।

मम्मी जाग गई थी और अपने बाल बांध रही थी। मम्मी खड़ी हो गई और अपने कपड़े उतारने लगी। कुछ ही देर में वो भी नंगी हो गई।

"मम्मी पापा यह क्या कर रहे हैं?" बन्टी ने उत्सुकतापूर्वक दीदी से फ़ुसफ़ुसा कर पूछा।

"क्या मालूम बन्टी?" मेघना की सांसें उसे देख कर फ़ूलने लगी थी। वो तो सब जानती थी, उसने तो कई बार चुदवा भी रखा था।

तभी मम्मी बिस्तर पर पेट के बल उल्टी लेट गई और अपने चूतड़ ऊपर की ओर घोड़ी बनते हुये उभार लिये।

मेघना दीदी ने बन्टी को देखा, बन्टी ने भी उसे देखा। मेघना की नजरें एक बार तो नीचे झुक गई।

"मम्मी तो जाने क्या करने लगी हैं?" बन्टी बोला।

तभी पापा ने क्रीम की डिब्बी में से बहुत सी क्रीम निकाली और मम्मी की गाण्ड में लगाने लगे।

"पापा दवाई लगा रहे हैं।" बन्टी फ़ुसफ़ुसाया।

"नहीं नहीं, वो तो कोल्ड क्रीम है... दवाई नहीं है !" फिर कह कर वो खुद ही झेंप गई।

पापा ने अपनी अंगुली मम्मी की गाण्ड में घुसा दी और अन्दर-बाहर करने लगे। मम्मी के मुख से सी सी जैसा स्वर निकलने लगा।

मेघना जानती थी कि मम्मी-पापा क्या कर रहे हैं।

फिर वही क्रीम पापा ने भी अपने लण्ड पर लगा ली। अब पापा बिस्तर पर चढ़ गये और अपना कड़ा लण्ड धीरे से मम्मी की गाण्ड में डालने लगे।

मेघना ने बन्टी की बांह कस कर पकड़ ली। मेघना की सांसें तेज हो चली थी। मेघना जवान थी, 21 वर्ष की थी, बन्टी उससे तीन वर्ष ही छोटा था।

"पापा का लण्ड कैसा मोटा और बड़ा है?" मेघना ने बन्टी से कहा।

"लण्ड क्या होता है दीदी?" बन्टी को कुछ समझ में नहीं आया।

"यह तेरी सू सू है ना? इसे लण्ड कहते हैं ! अब चुप हो जा !" मेघना ने खीज कर कहा।

पापा ने अपना लण्ड मम्मी की गाण्ड में घुसाने का प्रयत्न किया। पहले तो वो मुड़ मुड़ जा रहा था फिर अन्दर घुस गया।

मेघना ने अपने हाथ से अपनी उभरी हुई छाती दबा ली और सिसक उठी।

"मेघना, क्या हुआ, सीने में दर्द है क्या?" बन्टी ने मेघना की छाती पर हाथ रख कर कहा।

मेघना ने उसे मुस्करा कर देखा,"हाँ बन्टी, यहाँ इन दोनों में दर्द होने लगा है !"

"दीदी, मैं दबा दूँ क्या?"

"देख, ठीक से दबाना ... !" मेघना की आँखें चमक उठी।

बन्टी ने उसका हाथ हटा दिया और शमीज के ऊपर से उसके उरोज दबाने लगा।

"वो देख ना बन्टी, पापा जोर जोर से मम्मी को चोद रहे हैं !" मेघना मतवाली सी होने लगी।

"चल अब सो जायें !"

"अरे नहीं ! और दबा ना ... फ़िर चलते हैं। फिर देख ना ! पापा मम्मी को कैसे चोद रहे हैं?"

"अरे वो तो जाने क्या कर रहे है, चल ना !"

"तुझे कुछ नहीं होता है क्या? रुक जा ना, तेरा लण्ड तो बता ... पापा जैसा है ना?"

"क्या सू सू ... हाँ वैसी ही है !"

मेघना ने बन्टी का लण्ड पकड़ लिया। वो अनजाने में खड़ा हो चुका था। बन्टी को पहली बार ही यह विचित्र सा अहसास हो रहा था,"दीदी, छोड़ ना, यह क्या कर रही है?"

"अरे, वो देख... !" उसने पापा की ओर इशारा किया। उनके लण्ड से वीर्य छूट रहा था।

बन्टी के शरीर में जैसे बिजलियाँ दौड़ने लगी।

वो दोनो कमरे में वापस आ गये। मेघना की आँखों में अब नींद कहाँ ! उसका शरीर तो मम्मी-पापा को देख कर जलने लगा था।

दोनों लेट गये।

"बन्टी, चल अपन भी वैसे ही करें !" मेघना ने वासना से तड़पते हुये कहा।

"सच दीदी ... चल क्रीम ला ... कैसा लगेगा वैसा करने से?" बन्टी की आँखें चमक उठी। उसके दिल में भी वैसा करने को होने लगा।

मेघना जल्दी से अपनी क्रीम उठा लाई और उसे खोल कर बन्टी को दे दिया।

"पर दीदी ! नंगा होना क्या जरूरी है, मुझे तो शर्म आयेगी !" बन्टी असंमजस में पड़ गया।

"हाँ, वो तो मुझे भी होना पड़ेगा ! ऐसा करते हैं, अपन दोनों बस चड्डी उतार लेते हैं, फिर क्रीम लगाते हैं, बाकी कपड़े पहने रहते हैं।"

"तू तो शमीज ऊपर कर लेगी, पर मुझे तो पजामा पूरा उतरना पड़ेगा ना?"

"अरे चल ना ! इतना तो अंधेरा है, कुछ नहीं दिखेगा, और बस अपन दोनों ही तो हैं !"

बन्टी ने सहमति में अपना सर हिला दिया।

मेघना ने तो अपनी चड्डी उतार ली, पर शमीज पहने रही। बन्टी को तो नीचे से पूरा नंगा होना पड़ा। पर दोनों को इस कार्य में बहुत आनन्द आ रहा था। ऐसे नंगा होना और फिर क्रीम लगाना ...! सब खेल जैसा लग रहा था।

बन्टी का लण्ड भी अब रोमांचित हो कर कठोर हो गया था। बन्टी अपनी खाट से उतर कर मेघना के पास चला आया था।

"चल यहाँ लेट जा, अब मम्मी-पापा खेलते हैं। पहले प्यार करेंगे !" मेघना उसे अपनी आग में झुलसाना चाहती थी।

उसने बन्टी को अपने आगोश में ले लिया। बन्टी को मेघना के जिस्म की गर्मी महसूस होने लगी थी। उसका लण्ड भी खड़ा होकर मेघना के जिस्म में ठोकर मार रहा था। दोनो लिपट गये, पर लिपटने में फ़र्क था। मेघना अपनी चूत उसके लण्ड पर दबाने की कोशिश कर रही थी जबकि बन्टी उसे प्यार समझ रहा था।

"अब क्रीम लगाएँ...?"

"नहीं बन्टी, अभी और प्यार करेंगे। तू यह बनियान भी उतार दे !"

"तो आप भी शमीज उतारो दीदी !"

"ओह , यह ले... !" मेघना ने अपनी शमीज उतार दी तो बन्टी ने भी अपनी बनियान उतार दी।

मेघना ने बन्टी का हाथ अपने स्तनों पर रख दिया।

"दबा इसे बन्टी... मसल दे इसे !" मेघना ने उसके हाथों को अपने स्तनों पर भींचते हुये कहा।

बन्टी उसके स्तनों को मसलता-मरोड़ता रहा पर उसे तो लण्ड मसले जाने पर ही अधिक मजा आ रहा था।

"दीदी, क्रीम दो ना, पीछे लगाता हूँ !"

"ओह, हाँ ! यह ले !" मेघना ने क्रीम उसे थमा दी और मम्मी जैसे पलट कर घोड़ी बन गई।

बन्टी ने उसके गोल मटोल चूतड़ देख तो सन्न से रह गयान इतने सुन्दर, चिकने, आखिर वो भरी जवानी में जो थी। उसका लण्ड कड़कने लग गया। बार-बार जोर मारने लगा।

बन्टी ने उसकी गाण्ड पर हाथ फ़ेरा तो मेघना सीत्कार कर उठी, उसकी गाण्ड के छेद की सलवटें उसे रोमांचित करने लगी।

उसने अंगुली में क्रीम लगा कर उसके छेद पर मला और अपनी अंगुली घुसाने का यत्न करने लगा। मेघना को गुदगुदी होने लगी। उसने और क्रीम ली और अपनी अंगुली को छेद में दबा दी।

वो थोड़ा सा अन्दर घुस गई।

मेघना ने बन्टी का लण्ड पकड़ लिया और दबाने लगी, उसे ऊपर नीचे चलाने लगी।

"दीदी, बहुत मजा आ रहा है ... करती रहो !" बन्टी के मुख से सिसकारियाँ निकल रही थी।

"आया ना मजा? अभी और मजा आयेगा, देखना !" मेघना के मुख से भी सिसकारी निकल पड़ी।

मेघना तो वासना की गुड़िया बन चुकी थी। बन्टी गाण्ड में अंगुली घुमाता रहा लेकिन फिर उसने बाहर निकाल ली।

मेघना ने महसूस किया कि कोशिश करने पर बन्टी का लण्ड भीतर जा सकता है,"बन्टी, अब तू पापा की तरह कर, अपना लण्ड मेरी गाण्ड में घुसेड़ दे !"

बन्टी का लण्ड बहुत सख्त हो चुका था, उसने उसके चूतड़ों को खोल कर लण्ड को छेद पर रखा और दबाने लगा, नहीं गया तो नहीं ही गया।

"अरे बन्टी, और जोर लगा ना !"

मेघना ने अपनी गाण्ड ढीली कर दी, पर फिर भी वो नहीं गया। बन्टी को तकलीफ़ होने लगी थी।

तभी मेघना ने उसका लण्ड लेकर अपनी चूत में घुसा लिया।

"घुस गया दीदी, और मीठा मीठा सा भी लगा।" बन्टी खुश हो गया।

मेघना ने वैसे ही घोड़ी बने उसके लण्ड को एक झटक जोर से दिया। बन्टी का लण्ड उसकी चूत में घुसता ही चला गया। मेघना आनन्द से सिसक पड़ी।

बन्टी को भी बहुत आनन्द सा लगा। पर उसे एक जलन सी भी हो रही थी।

"भैया, अब धक्का लगा, धीरे धीरे ! समझ गया ना?"

बन्टी अपने लण्ड में जलन का कारण समझ ना पाया। वो कुछ देर यूँ ही घुटनों के बल खड़ा रहा। फिर उसने धीरे से लण्ड को बाहर खींचा और अन्दर धक्का दे दिया। अब उसे भी मजा आया।

धीरे धीरे उसकी रफ़्तार बढ़ने लगी, उसकी सांसें तेज होने लगी।

बन्टी ने पहली बार किसी लड़की को चोदा था, पर किस्मत से वो उसकी बहन ही थी।

मेघना को तो जैसे घर में ही खजाना मिल गया था, वो बड़ी लगन से अपने छोटे भाई से चुदवा रही थी, बन्टी भी बेसुध हो कर उसे चोद रहा था।

बड़ी बहन के होते हुए वो अच्छा-बुरा भला क्यों सोचता।

तभी मेघना झड़ने लगी। बन्टी भी जोर जोर चोदते हुये बोल रहा था,"दीदी, मुझे पेशाब लगी है !"

"अरे ऐसे ही मूत दे ... बहुत मजा आयेगा !"

बन्टी ने बहन का कहा मान कर अपना माल उसकी चूत में ही उगल दिया। फिर उसे अब मूत्र भी आने लगा। वह फिर से बहन के कहे अनुसार उसकी गाण्ड के गोलों पर अपना मूत्र-विसर्जन करने लगा।

"अरे बस ना, यह क्या कर रहा है?"

बन्टी तो मूतता ही गया। उसे पूरा मूत्र से भिगा दिया। वो शान्ति से मूत्र से नहाती रही। शायद यह उसके लिये आनन्ददायी था।

"बस हो गया ना?"

"हाँ दीदी, पूरा मूत दिया। पर यह बिस्तर तो पूरा भीग गया है !" बन्टी ने चिन्ता जताई।

"चल मेरे बिस्तर पर सो जाना !" मेघना ने उसे सुझाया।

दोनों ही मेघना के बिस्तर पर जा कर सो गये। सुबह दोनों ही देर से उठे।

"तू मेघना के बिस्तर पर क्या कर रहा है?" मम्मी की गरजती हुई आवाज आई।

"मम्मी, बन्टी ने अपना बिस्तर गीला कर दिया है" मेघना ने नींद में कहा।

"क्या?"

"सॉरी मम्मी, रात को सपने में पेशाब कर रहा था, तो सच में ही बिस्तर में कर दिया" बन्टी जल्दी से उठ कर बैठ गया।

मम्मी जोर से हंस पड़ी।

"अच्छा चल अब चाय पी लो !" मम्मी हंसते हुए चली गई।

मम्मी भाई-बहन का प्यार देख कर खुश थी पर वो नहीं जानती थी कि उन्होंने तो रात को मम्मी-पापा का खेल खेला है।

बन्टी मुझे देख कर झेंप गया।

"सॉरी दीदी, रात को अपन जाने क्या करने लगे थे?" बन्टी सर झुका कर कह रहा था। वो समझ गया था कि उसने दीदी को चोद दिया है।

"चुप बे सॉरी के बच्चे ! आज रात को देख ! मैं तेरा क्या हाल करती हूँ?" मेघना ने खिलखिला कर कहा।

"दीदी, आज रात को फिर से वही खेल खेलेंगे, ओह दीदी, तुम बहुत अच्छी हो।" कह कर बन्टी मेघना से लिपट गया।

मम्मी मेज पर बैठी दोनों को आवाजें लगा रही थी,"अब सुस्ती छोड़ो, चलो नाश्ता कर लो !"

दोनों एक-दूसरे को देख कर बस मुस्करा दिए और जल्दी से बाथरूम की ओर भागे।

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चुदाई के लिए माल -1

Posted: 24 Feb 2013 03:41 AM PST

प्रिय दोस्तो, मैं संजय एक बार फिर अपनी आपबीती आपके साथ बाँटने आ गया हूँ। आप लोगों ने मेरी कहानियों को जैसे सराहा, उसने मुझे मजबूर कर दिया कि मैं आपके साथ अपने अनुभव और बाँटू। कहानी शुरु करता हूँ।

दोस्तो, जैसा कि आपको पता है सेक्स मेरी कमजोरी है और मैं हर लड़की को सिर्फ सेक्स की नज़र से ही देखता हूँ। हर लड़की सिर्फ मुझे चुदाई के लिए माल लगती है।

बात तब की है जब मैं अपनी नौकरी के सिलसिले में भोपाल गया था। मुझे वह थोड़ा समय लगना था तो मैंने एक कमरा किराये पर लेकर रहने का तय किया।

भोपाल में मेरे दूर के रिश्ते के भाई-भाभी रहते थे। जब उन लोगों को पता चला तो उन लोगों ने मुझे अपने साथ रहने को कहा। पर मुझे अच्छा नहीं लग रहा था तो मैंने कहा कि मैं उनके घर आता रहूँगा पर कमरा अलग ही लूंगा।

पर वो लोग नहीं माने और मुझे उनके घर ही रहना पड़ा। जिस दिन मैं भोपाल पहुँचा तो सीधा अपने भाई के यहाँ गया। उन लोगों से काफी समय हो गया था मिले, मैं सिर्फ भाई की शादी में ही गया था, उसके बाद जाना नहीं हो पाया था, उनकी शादी को 6 साल हो चुके थे और 4 साल का एक बेटा भी था। जब मैं पहुँचा तो वो लोग बहुत खुश हुए। वहीं मेरे चाचा और चाची भी रहते थे। सब लोग बहुत खुश थे और मैं भी खुश था। मेरा सारा समय अपने भतीजे के साथ खेलने में ही निकल जाता था।

पर मेरी आदत के कारण मेरी नज़र अपनी भाभी पर थी। जब मैंने उनको पहले देखा था तो वो उतनी सुंदर नहीं लगी थी पर अब तो वो जबरदस्त माल लग रही थी। शायद भाई की जबरदस्त चुदाई का नतीजा था यह। उनके वक्ष और नितम्ब मस्त हो गए थे और उनके होंठ देख कर तो मन कर रहा था कि अभी पकड़ कर चूस लूँ और फिर अपने लण्ड उनके बीच में डाल दूँ।

पर अभी घर में सब लोग थे ओर मैं भी ऐसा कुछ नहीं करना चाहता था पर मेरी नज़रों ने देख लिया था कि भाभी जी भी मुझे अलग निगाहों से देख रही थी, वो नज़रें जो हर चुदाई की प्यासी औरत की होती हैं।

खैर मैं खाना खा कर अपने कमरे में चला गया। थोड़ी देर में भाभी मेरे लिए दूध लेकर आई और थोड़ी देर बैठ कर मुझसे बातें करने लगी। उनको बातें करने का बहुत शौंक था, हम काफी देर तक बात करते रहे और मैं अपनी नज़रों से उनके शरीर का नाप लेता रहा। बहुत ही मस्त शरीर था भाभी का, मैं सारी लड़कियों को भूल सकता था भाभी के लिए।

थोड़ी देर बाते करने के बाद भाभी चली गई और मैं उनके नाम का मुठ मार कर सो गया।

अगले दिन मैंने अपना ऑफिस ज्वाइन कर लिया और अपने काम में लग गया। मुझे यहाँ आये 15 दिन हो गए थे और रोज भाभी का नाम लेकर मुठ मार लेता था। कोई रास्ता नहीं दिख रहा था मुझे उनकी चुदाई करने का।

एक दिन भाई की तबियत थोड़ी सही नहीं थी तो भाभी उनका काम कर रही थी। मैंने कुछ दवाइयाँ लाकर दी और उनको आराम करने को कहा और भाभी को बोला कि भाई को खिला दो और सोने को कहो और खुद भी आराम करो।

यह कह कर मैं अपने कमरे में आ गया। मुझे पता था कि आज भाभी मेरे कमरे में नहीं आएँगी क्योंकि वो भाई का काम कर रही हैं तो आराम से रोज की तरह अपना लण्ड निकाल कर मुठ मारने लगा भाभी का नाम लेकर।

थोड़ी देर में मुझे दरवाजे पर कुछ आवाज़ सुनाई दी। मैंने पलट कर देखा तो भाभी दूध का गिलास हाथ में लिए खड़ी थी। मैंने जल्दी से चादर अपने ऊपर डाली और अंडरवीयर पहनने लगा।

भाभी ने थोड़ा गुस्से में पूछा- यह क्या हो रहा था?

मैं बहुत डर गया था। मुझे लगा कि भाभी अब यह बात सबको बता देगी और मेरी बहुत बेइज्जती होगी।

मैं तुरंत पंलग से उठा और भाभी के पैर पकड़ लिए, मैं उनको बोलने लगा कि यह बात किसी को न बताएँ... यह तो हर लड़का करता है।

उन्होंने दूध का गिलास मेज पर रखा और वहीं सोफे पर बैठ गई।

मैं वहीं उनके घुटनों के पास बैठ गया और उनको मनाने लगा। मैंने उनके पैर चूमने लगा और कह रहा था कि यह बात किसी को न बताएँ।

थोड़ी देर चूमने के बाद मुझे लगा कि भाभी को यह अच्छा लग रहा है और वो मुझे मना भी नहीं कर रही है तो मैंने धीरे धीरे उनकी साड़ी थोड़ी ऊपर की और उनकी घुटनों से नीचे की टाँगे चूमने लगा।

अब मैंने देखा तो भाभी सोफे पर आराम से बैठ गई थी और आँखें बंद करके मज़े ले रही थी।

मैंने भाभी से पूछा- मज़ा आ रहा है?

तो वो बोली- करते रहो नहीं तो सबको बता दूँगी।

मैं थोड़ा डर से और अपनी मस्ती के लिए उनकी टाँगे चूमता रहा। अब धीरे धीरे मैंने अपने हाथ उनकी साड़ी के अंदर उनकी जांघों पर रख दिए और उनको सहलाने लगा।

भाभी पूरी मस्त हो गई थी तो मैंने बिना डरे उनकी साड़ी उनकी जांघों से ऊपर उठा दी और उनकी जांघों को चूमने लगा। मेरी साँसों में उनकी चूत की खुशबू आ रही थी जो मुझे और मस्त कर रही थी।

मैंने थोड़ा सा ऊपर देखा तो मेरी नज़र उनकी चूत पर पड़ी जिस पर काफी बाल थे और चूत की खूबसूरती उनसे छुप रही थी। मैंने उनकी टांगों और जांघों को बहुत प्यार से चाटा। अब मैंने उनकी टाँगें थोड़ी चौड़ी कर दी ताकि मैं उनकी चूत को सही से देख सकूँ। उन्होंने भी मेरा साथ देते हुए अपनी टांगें चौड़ी कर दी। अब मेरा मुँह उनकी चूत पर था और मैं उनकी चूत को मुँह में लेकर आम की तरह चूस रहा था। थोड़ी देर तक चूसने पर उन्होंने पानी छोड़ दिया जो मैंने थोड़ा चाटा और बाकी उन्होंने अपनी साड़ी से साफ़ कर दिया।

अब वो उठ कर जाने लगी तो मैंने कहा- मेरा क्या होगा? मेरा तो अभी कुछ नहीं हुआ !

तो वो हंस कर बोली- तुम वही करो जो अभी कर रहे थे।

मैंने कहा- यह सही नहीं !

तो वो मेरे पास आई और मुझे खड़ा करके मेरे होठों पर होंठ रख कर मुझे चूमा किया बोली- अब तो तुमको अगर अपना राज छिपाना है तो जैसा मैं कहूँगी वो करना पड़ेगा।

मैं और क्या कर सकता था।

वो चली गई और मैं रोज की तरह मुठ मार कर सो गया। मेरे खड़े लण्ड पर चोट हो गई थी।

अगले दिन रात को भाभी फिर मेरे लिए दूध लेकर आई और दूध का गिलास मेज पर रख के मेरे सामने साड़ी ऊपर करके खड़ी हो गई और मुझे अपनी चूत चाटने को बोला। मैंने बड़ी उम्मीदों के साथ उनकी चूत को चाटा पर आज फिर वो अपना पानी निकाल कर मेरा लण्ड खड़ा ही छोड़ कर चली गई।

अगले 2-3 दिन तक उन्होंने ऐसा ही किया। अब मुझे गुस्सा आने लगा था। इतनी प्यारी चूत पास होते हुए भी मुझे रोज मुठ मार कर काम चलाना पड़ रहा था।

अगले दिन जब भाभी ने फिर वही किया तो मैंने उनकी चूत चाटने से मना कर दिया और कहा- आप मेरे लण्ड के बारे में तो कुछ सोचती नहीं हो। मुझे आपकी चूत चाटने के बाद रोज मुठ मारनी पड़ती है।

वो हंसने लगी और बोली- मेरे प्यारे देवर, आज चूत चाटो, मैं आपके लण्ड का भी ध्यान रखूँगी।

यह सुन कर मैंने उनकी साड़ी में मुँह डाल कर उनकी चूत पर अपने होंठ लगाये तो मुझे बिल्कुल चिकनी चूत मिली, आज उन्होंने अपनी चूत के बाल साफ़ कर लिए थे। थोड़ी देर चूत चटवाने के बाद उन्होंने मुझे अलग करके खड़ा किया और खुद अपने घुटनों पर बैठ गई और मेरा पजामा नीचे कर दिया।

मेरा लण्ड बहुत तना खड़ा था। उन्होंने बिना समय लगाये मेरा अण्डरवीयर भी नीचे कर दिया और मेरा लण्ड अपने हाथ में लेकर उसका मुठ मारने लगी।

मैंने कहा- भाभी यह तो मैं रोज खुद से ही कर लेता हूँ, आप कुछ ऐसा करो जो मैं नहीं कर सकता हूँ।

यह सुन कर वो मुस्कुराई और अपनी जीभ निकाल कर मेरे लण्ड के टोपे पर लगा दी। मेरे टोपे पर कुछ बूंदें मेरे पानी की आ गई थी जिनको उन्होंने चाट लिया।

अब वो मेरे लण्ड पर अपनी जीभ चला चला के चाटने लगी मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। फिर उन्होने मेरे लण्ड के टोपे को लोलीपोप की तरह अपने मुँह में ले लिया। उनके मुँह की गर्मी और गीलापन मुझे अजीब सी ख़ुशी दे रहा था। मैंने उनका सिर अपने दोनों हाथों से पकड़ा और अपना लण्ड उनके मुँह में पेलने लगा। एक बार उन्होंने मेरा लण्ड अपने मुँह से फिर निकाला और दुबारा अपना मुँह खोल कर मेरा लण्ड खाने लगी। अबकी बार मेरा पूरा लण्ड उनके मुँह में ऐसे चला गया जैसे मक्कन में छुरी जाती है। मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। मेरा लण्ड उनके मुँह को चोद रहा था। उनका लण्ड चूसने का तरीका इतना अच्छा था कि मैं ज्यादा देर तक खुद को रोक नहीं पाया और मेरा सारा पानी उनके मुँह में निकाल गया।

इसके बाद वो उठी और मेरे होठों पर चुम्मा लेकर चली गई। मैं बहुत खुश था, आज मुठ मारने की जरुरत नहीं थी तो मैं सो गया।

कहानी जारी रहेगी।

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