हिंदी सेक्सी कहानियां



हिंदी सेक्सी कहानियां


चूत की प्यास

Posted: 05 Feb 2013 01:25 AM PST


मेरा नाम शांति (बदला हुआ) है। मेरी उम्र 32 साल है, रंग सावला, लम्बाई 5"4, और थोड़ी मोटी लेकिन बराबर फिट। मेरे गाँव का नाम रतनपुर है। मेरी शादी, जब मैं 18 साल की तब ही हो गई थी। मेरे परिवार में मेरी दो बड़ी बहनें और मुझसे छोटा भाई और मम्मी-पापा।

मैंने बी.एस. सी. तक पढ़ाई की है। मेरे पति का नाम शिवप्रसाद, जो कम पढ़ा लिखा किसान है। वह रात में मेरे साथ साधारण तरीके से चुदाई करता था जिससे मेरी प्यास मिटती नहीं थी। लेकिन आदत बन चुकी थी, जल्दी से चुदाई करवा कर सो जाने की।

जब मैं 19 साल की थी तभी मुझे बच्चा हो गया था। उसका नाम राधे है। जब वह 5 साल का हो गया, तब उसे पास के शहर के स्कूल में दाखिला दिला दिया और मेरे ही ताऊ ससुर के पोते अंशु के साथ पढ़ने के लिए भेज दिया जो कालेज में पढ़ता था।

राधे शहर में अंशु के साथ रहने लग गया था। अंशु 19 साल का था और खुद खाना बनाता था। उनके खाने-पीने के सामान घर से ही कोई जाकर पहुँचाता था। शुरू से ही अंशु के पापा यानि मेरे जेठ पहुँचा देते थे।

लेकिन एक दिन वो किसी गाँव में किसी निमंत्रण में चले गए। दोनों के लिए सामान पहुँचाना जरूरी था, मैंने अपने पति से कहा तो उन्होंने कहा- मैं चला तो जाता लेकिन इन भैंसों को और बैल को कौन घर लायेगा... ये किसी को पास नहीं आने देते, इतने मरखने है। ऐसा कर तू ही चली जा, पढ़ी-लिखी भी है.... तुझे सूझ भी पड़ जाएगी।

अगले दिन मुझे मेरे पति ने, एक बोरे में गेंहू, दाल, चावल रखकर बस में बिठा दिया। दो-ढाई घंटे में मैं शहर जा पहुँची। वहाँ इधर-उधर ढूंढ कर तो अंशु के घर पहुँची मुझे देखते ही वो मुझे अपने कमरे में ले गया, जहाँ मेरा बेटा और वो रहता था।

राधे वहाँ नहीं था और मैं भी सोच रही थी कि वह स्कूल गया होगा। लेकिन शाम तक नहीं आने पर मैंने अंशु से पूछा तो उसने बताया कि राधे अपने स्कूल के पिकनिक पर 15 दिनों के लिए गया हुआ है।

फिर मुझे थोड़ी शांति हुई। मैं उठी और हाथ-मुँह धोने चली गई। थोड़ी देर में खाना बनाया और अंशु दोनों ने खाया। अंशु को पढ़ना था इसलिए वह देर से सोता था लेकिन मैं थकी हुई थी इसलिए जल्दी ही सो गई।

एक ही कमरा था और बिस्तर भी एक ही था पर थोड़ा लम्बा चौड़ा था, मेरे पास ही वह सोया।

रात में मैं पेशाब करने के लिए उठी और पेशाब करके सोने लगी तो मैंने अंशु को देखा। वह तौलिया लपेट कर सोया हुआ था। नींद में उसका तौलिया खुल गया था और उसकी चड्डी के अंदर उसका लंड पूरा तना हुआ था। पहले तो मैं चकरा गई क्योंकि किसी सोते हुए आदमी का लंड पहली बार देखा था, फिर थोड़ी देर में सोचा कि इसको पेशाब आ रही होगी इसलिए तना हुआ है। लेकिन मैं उसको जगाये बगैर ही सोने लगी पर उसका लंड देखकर मेरी नींद उड़ गई, मेरी चूत में खुजली होने लगी, पूरा शरीर कांपने लगा क्योंकि मेरी कामवासना जाग गई थी।

मैं उसे एकदम तो पकड़ नहीं सकती थी इसलिए उससे चुदने की योजना बनाने लगी।

अगले दिन सुबह वह जल्दी उठ गया और मुझे भी उठा दिया। नहा-धोकर वह कालेज चला गया, मैं भी नहा धोकर तैयार हो गई और खाना भी तैयार कर दिया। वह शाम चार बजे आ गया, खाना खाया और बालकनी में कुर्सी लगाकर बैठ गया।

मैंने यों ही उससे बातचीत शुरू की- क्यों रे अंशु ! तुम रोज ऐसे ही खाना खाते हो क्या?

"नहीं काकी ! कभी कभी लेट हो जाते हैं। लेकिन राधे का टिफ़िन मैं जल्दी तैयार करके स्कूल भेजता हूँ।

"ठीक है लेकिन खाना वक्त पर खाना चाहिए।"

"ठीक है काकी, आपने खाना खा लिया या नहीं?"

"खा लिया मैंने कभी का !"

फिर मैंने पूछा- कालेज में पढ़ने ही जाता है या और कुछ करने?

"पढ़ने ही जाता हूँ पर क्यों?"

"नहीं !! कभी तुम मस्ती में लग जाओ और पैसे बर्बाद हों।"

"नहीं ! पढ़ता हूँ !"

"अच्छा क्लास की कोई लड़की पटा रखी है क्या?" उसको ऐसा मूड में लाने के लिए मैंने अचानक पूछा।

वह एकटक देखने लगा, उसे शर्म आ गई। सर झुककर नहीं में जवाब दिया।

मैंने बात को टालते हुए कहा- चल ठीक है, थोड़ा पढ़ ले, फिर रात को जल्दी सो जाना।

रात को वह दस बजे ही सो गया।

मैंने सोने का नाटक करते हुए उसकी जांघ पर हाथ रखा, लेकिन वह सोया हुआ था। उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। मेरा और भी साहस बढ़ गया, अब मैंने उसका लंड हाथ में पकड़ लिया और एक पाँव उसके पांव पर रख दिया।

मैंने अपनी साड़ी ब्लाउज से अलग कर ली और एक बटन खोल लिया।

उसकी अचानक नींद खुली, उसने मेरे हाथ को अलग कर दिया और मुझे गोर से देखने लगा। लेकिन मैं उठने वाली नहीं थी। उसे लगा कि काकी का हाथ नींद में रखा गया है, वह फिर सो गया।

मैंने फिर उसका लंड पकड़ लिया और उसके ज्यादा पास सरक गई। उसे नींद नहीं आ रही थी, वह मेरी हरकतें देख रहा था। अब मैंने अपने ब्लाउज के सारे बटन खोल कर उसकी छाती पर अपने बोबे टिका दिए और लंड को जोर से हिलाने लगी। लेकिन फिर भी वह ऐसा ही पड़ा था, वह कोई विरोध नहीं कर रहा था, तो मेरी हरकतें और बढ़ गई। मेरा लंड हिलाना और तेज हो गया...

थोड़ी देर बाद पिचक-पिचक की आवाजें आने लगी, मेरा हाथ गीला लगने लगा, देखा तो वह झड़ चुका था।

अब मैं उससे अलग होकर सो गई और उसकी तरफ पीठ करके सो गई। लेकिन नींद नहीं आ रही थी क्योंकि जब तक चूत शांत न हो तब तक नींद कैसे आये।

अंशु भी जाग चुका था और मेरी घटिया हरकतों को जान चुका था लेकिन उसे भी मजा आया था।

थोड़ी देर बाद उसने मुझे देखा ...उसे लगा कि काकी सो गई है तो उसने मेरा पेटीकोट ऊपर कर दिया और मेरी पेंटी को चूतड़ों पर से अलग करके अपना लंड घुसाने लगा।

मुझे मजा आ रहा था और लग रहा था कि मेरी सालों की प्यास आज अच्छी तरह से बुझेगी। वह मेरे और करीब आ गया और तेज धक्के लगाने लगा। बहुत देर तक रुक रुक कर धक्का लगाता रहा, जब उसके झड़ने का समय आया तो उसने मेरे कूल्हों पर ही छोड़ दिया।

अब वह बालकनी में चला गया जहाँ अगल-बगल में लेट्रिन-बाथरूम भी था। उसे बहुत देर हो चुकी थी वह आया नहीं था। मैंने जाकर देखा तो लेट्रिन में अपना लंड पकड़ कर जोर जोर से हिला रहा था।

मैं उसका वापस झड़ने से पहले ही उसके सामने चली गई। वह शरमा गया लेकिन मैंने उससे कहा- एक प्यासी चूत के होते हुए तुम्हें हाथ से करने की जरुरत नहीं है मेरे आशिक।

यह कह कर मैं उसे कमरे में ले आई और उसके कपड़े उतार दिए। उसने भी मेरे सारे कपड़े उतार दिए। लग रहा था जैसे वह चुदाई के खेल में बहुत माहिर हो और होना भी चाहिए क्योंकि उसका लंड ज्यादा बड़ा नहीं था।

कपड़े उतारने के बाद मैंने तुरंत उसके लंड को अपने मुँह में भर लिया और बेहताशा चाटने लगी, कुल्फी की तरह चूसने लगी क्योंकि लंड पहले बार मिला था चूसने को।

वह कराह रहा था, मैं जोर जोर से चूसती जा रही थी। थोड़ी देर चुसवाने के बाद उसने मेरा मुँह दूर किया और मुझे बिस्तर पर लेटा कर मेरी दोनों टाँगें फ़ैला दी और मेरी चूत को चाटने लगा।

अंशु जोर से जीभ घुमाने लगा और मैं सिसकारियाँ भरने लगी।

सारा कमरा मेरी आवाजों से गूंजने लगा था- आ आह ऊऊ ऊईई ईईइ अन्शूऊ धीरे नाआअ ईई उईई माआ मार दीईइ रीई !

मैं पूरी तरह गरम हो चुकी थी।

उसने उसका लंड पकड़ कर मेरी चूत पर फ़िराया और अचानक मेरी चूत में भर दिया।

मैं दर्द से चिल्ला उठी- ...आ आआ आअ ह हह हइ इईईइ अहिस्ता झटके मार अंशु ! खून निकलने लग जायेगा याआअर !

पर वह मदहोश था। वह और जोर से चोदने लगा था...थोड़ी देर में मैं तो झड़ चुकी थी...

लगभग दस मिनट के बाद वह भी झड़ने वाला था.. सो उसने धक्के और तेज कर दिए।

थोड़ी देर में अंशु ने अपना सारा वीर्य मेरी चूत के अन्दर ही छोड़ दिया और लंड चूत में ही डालकर मुझसे लिपट कर कम से कम दस मिनट तक मेरे ऊपर लेटा रहा।

मैंने उठ कर देखा तो तीन बज चुके थे। हम दोनों उठे और बाथरूम में जाकर दोनों ने साथ में ही पेशाब किया। पहले उसने फिर बाद में मैंने किया।

मैं जोर लगा रही थी जिससे सारा वीर्य धीरे धीरे बाहर निकल रहा था। पूरा निकल गया तो चूत को पानी से धोकर साफ किया और उठकर वापस बिस्तर पर जा गिरी।

मैंने उसका लंड पकड़ कर कहा- क्यों रोज लड़कियों की गांड मारता रहता है क्या? लंड कितना छोटा हो गया है..?

"नहीं काकी ! वो तो हम दोस्त के यहाँ सेक्सी फिल्म देख देख कर हिलाते है और फिर रोज आदत हो गई थी इसलिए छोटा रह गया।"

"ठीक है, फिर भी काम तो चल जायेगा।"

हम फ़िर गर्म होने लगे थे, मैंने फिर से उसका लंड मुँह में लिया और चूसने लगी। उसने मुझे उल्टा होने को कहा 69 के जैसे !

अब हम साथ में चूस रहे थे, बहुत मजा आ रहा था।

उसका लंड फ़िर तन गया और उसने मुझे घोड़ी बनने को कहा।

मैंने पूछा तो कहने लगा- अब मैं आपकी गांड में लंड डालूँगा।

मैंने कहा- दर्द होगा अंशु...

"नहीं होगा ! मैं आराम से करूँगा !"

और मुझे घोड़ी बना दिया।

उसने मेरी गांड में प्यार से डाला, मेरा पूरा सांस अटक गया, आआअ अ ईई ! मैं कराहने लगी जिससे वह ज्यादा उत्तेजित होने लगा और जोर से डालने लगा।

काफ़ी देर तक यह चलता रहा। जब वह झड़ने वाला था तब अपना लंड चूत से निकाल कर मेरे मुँह के ऊपर लाकर हिलाने लगा, मुझसे मुँह खुलवाया और सारा रस मेरे मुँह में छोड़ दिया और बोला- पी जाओ इसको ! अच्छा लगेगा।

मैं भी पी गई सारा का सारा, कुछ अलग ही मजा आया।

साढ़े चार बज चुके थे, अब हम उठे और नहाये।

इस तरह रोज राधे के आने तक हमने अलग-अलग तरीकों से चुदाई की, और अब भी कई बार मैं शहर जाकर अंशु से अपनी चूत की प्यास बुझवा कर आती हूँ।


धन्यवाद दोस्तो ! मैं आगे भी लिखती रहूँगी।

tamanna.qureshi123@gmail.com
sexygirl4uonly16@gmail.com

आरती की चुदाई

Posted: 05 Feb 2013 01:11 AM PST


मेरा नाम जीत है। बात उस समय की है जब मैं इस कंपनी में नया नया आया था। काम का बोझ ज्यादा था, या यूँ कहो कि नई नई नौकरी थी सो लगभग रोज़ ही शाम को लेट हो जाया करता था। ऑफिस आने जाने के लिए मैंने मोटर साइकिल रखा था।

उस दिन भी मैं ऑफ़िस से कोई 8 बजे निकला था। जब मैं क्लब पार्क (बंजात्रा हिल्स) से गुजर रहा था तो सड़क के किनारे एक लड़की अपनी स्कूटी के पास खाड़ी हाथ से रूकने का इशारा कर रही थी। मैंने ठीक उसके पास जाकर जोर से ब्रेक लगाया तो उसकी चीख निकलते निकलते बची।

मैंने अपना हेल्मेट उतारा और पूछा- क्या बात है मैडम?

"ओह...!" वो अपने आपको संभालते हुए बोली- मेरी स्कूटी खराब हो गई है ...! और आस पास कोई मैकेनिक भी नही हैं.. प्लीज.. आप...?

"कोई बात नहीं, मैं देखता हूँ..."

हालांकि मैं कोई मैकेनिक नहीं हूँ पर इतनी सुंदर लड़की को देख कर मेरे मुँह में भी लार टपकने लगी थी। साली ये साऊथ की लड़कियाँ भी थोड़ी साँवली तो जरूर होती हैं पर इनकी आँखें और नितम्ब तो बस जानमारू ही होते हैं। और फिर इस चिड़िया का तो कहना ही क्या था। मोटी मोटी आँखें, भारी नितम्ब और गोल गोल कंधारी अनार से वक्ष।

इन चूचों में पता नहीं कितना दूध भरा होगा। लोग दूध की किल्लत और कीमत को लेकर आजकल परेशान रहते हैं। पागल हैं इन स्तनों में भरे दूध की ओर इनका ध्यान पता नहीं क्यों नहीं जाता।

स्कूटी के प्लग में कचरा फंस गया था, साफ करते ही चालू हो गई। मैंने जोर से 3-4 बार रेस दी और हॉर्न भी बजाया।

"लीजिए...!" "आपकी घोड़ी सवारी के लिए तैयार हो गई है ! स्कूटी महारानी राज़ी ही गई.. मिस..!"

उसने कृतज्ञता भरी नज़रों से मेरी ओर मुस्कुराते हुए देखा और फिर बोली- थैंक यू ! मेरा नाम आरती सुब्रमण्यम है... आपका बहुत बहुत धन्यवाद !"

उसकी कातिलाना मुस्कुराहट और नशीली नज़रों को देख कर मैं तो मर ही मिटा था।

"मुझे जीत कहते हैं। मैं यहाँ एक प्राइवेट कंपनी में काम करता हूँ।"

"ओह... थैंक यू मिस्टर जीत..." उसने स्कूटी के हैंडल को पकड़ा तो अनजाने में उसका हाथ मेरे हाथों से छू गया।

वाह.. क्या नाज़ुक अहसास था।

अब मैंने ध्यान से उसका चेहरा देखा। कोई 30-31 की तो जरूर होगी। ओह.. साली शादीशुदा है। साड़ी पहने कमाल की लग रही है।

"धन्यवाद की आवशकता नहीं है आरतीजी !"

"नहीं मैं पिछले आधे घंटे से देख रही थी, किसी ने मेरी हेल्प नहीं की।"

"कोई बात नहीं... यह तो मेरा फ़र्ज़ था।" मैंने मुस्कुरा कर कहा।

"आप कहाँ रहते हैं?"

"मैं पास में ही शकुंतलम् मार्ग पर निकुंज अपार्टमेंट में रहता हूँ.. और आप?"

"मैं 23-सामंत नगर में रहती हूँ, मेरे मिस्टर दुबई में जॉब कर रहे हैं..!"

"आपसे मिल कर बहुत खुशी हुई... आप अकेली हैं, कभी किसी काम की जरूरत हो तो मुझे याद कर लीजिएगा !" मैने अपना विज़िटिंग कार्ड निकल कर उसे दिया।

बात आई-गई हो गई। मैं तो उस बात को भूल ही गया था, अचानक एक दिन उसकी मोबाइल काल आई। इधर उधर की बातें करने के बाद उसने बताया कि उसे कुछ शॉपिंग करनी है।

मेरे लिए तो यह स्वर्णिम अवसर था और फिर उसके बाद तो हम आपस में खुल गये। कई बार ऑफ़िस आते-जाते उसे हाय-हेलो होने लगी। मुझे लगा इस मुर्गी को हलाल किया जा सकता है पर घुमा फिरा कर जब भी मैं सेक्स की बात पर आता तो वो झट टॉपिक बदल देती या फिर हँसने लगती।

हँसते हुए उसकी गालों में पड़ने वाले डिंपल तो मेरे 7" के लंड को बेकाबू घोड़ा ही बना देते। मैं जानता था साऊथ की औरतें जितनी धार्मिक होती हैं उतनी ही सेक्सी भी होती हैं और आरती कमाल की खूबसूरत तो थी ही, साथ में सेक्सी भी थी।

वो शनिवार का दिन था, रात के कोई 10 बजे होंगे, मैं टीवी देख रहा था, अचानक उसका फोन आया- क्या कर रहे हो? उसने पूछा।

मन में तो आया कि कह दूँ- मूठ मार रहा हूँ !

पर मैंने कहा- बस आपको ही याद कर रहा था।

वो खिलखिला कर हंस पड़ी- झूठे कहीं के..!

"क्यों क्या हुआ?"

"रात को क्या किसी को याद किया जाता है?"

"तो क्या किया जाता है?"

"ओह...सॉरी...!"

"क्या हुआ?"

"कुछ नही !"

"नहीं आप कुछ बोलना चाहती थी पर.... नहीं बता रही हैं !"

"नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है, एक्चुअली मुझे नींद नहीं आ रही थी, मैं बोर हो रही थी, सोचा कि तुमसे बात कर लूँ !"

"ओह.. फोन पर बातों में कहाँ मज़ा आता है?"

"तो फिर मज़ा कैसे आता है?"

"वो तो आमने सामने बैठ कर ही आता है !"

"तो आमने सामने बैठ कर कर लो जी !"

"ओह... थैंक यू आरती ! पर आप बुलाती कहाँ हैं?"

"तो क्य अब निमंत्रण पत्र भेजूँ... बुद्धू कहीं के !" और उसने फोन काट दिया।

मैं भी मोटी अक्ल हूँ ! इस लंबी रेस की घोड़ी को इतने दिन ऐसी ही छोड़ दिया। मेरा लंड तो उछलने ही लगा, इतना खुला निमंत्रण पाकर मुझे तो अपनी किस्मत पर यकीन ही नहीं हुआ। हे भगवान, तूने तो छप्पर फाड़ कर इतनी मस्त हसीना मेरी बाहों में डाल दी है !

मैं इस सुनहरे मौके को भला कैसे गंवाता? मैं तो उछलते हुए उसके घर की ओर दौड़ पड़ा।

वो गेट पर खड़ी जैसे मेरा इंतज़ार ही कर रही थी। काली साड़ी और कसे ब्लाउज़ में वो पूरी कयामत ही लग रही थी। होंठों पर लाली और बालों में ग़ज़रा !

अंदर आकर मैंने उसे बाहों में भर लिया और इतने जोर से दबाया की उसकी चीख ही निकल गई।

"आआ....ई ईई ईईई ! क्या करते हो मुझे मार ही डालोगे क्या?"

"अरे मेरी जान, तुमने मुझे बहुत तड़फाया है !" और मैंने तड़ातड़ कई चुम्बन उसके गालों पर ले लिए और उसे बाहों में भर कर बिस्तर पर पटक दिया।

"ओह.. तुमसे तो जरा भी सब्र नहीं होता.. तुम भी अय्यर की तरह बहुत उतावले हो.."

"मेरी जान, अब तुम जैसी खूबसूरत बाला को देख कर कोई अपने आप पर काबू कैसे रख सकता है?"

"जितना चोदना है चोदो मुझे, बहुत दिनों से मैं लंड के लिए तरस रही हूँ !"

हमने अपने कपड़े उतार दिए, अब वो सिर्फ ब्रा और पैंटी में ही रह गई थी, उसने मेरे लंड को अपने मुँह में भर लिया और चूसने लगी। मैं तो उस अनोखे मज़े से जैसे भर ही उठा। कोई 7-8 मिनट उसने जरूर चूसा होगा, अब मैंने उसकी पैंटी उतार दी। क्लीन शेव चूत देख कर मैं तो निहाल ही हो गया, मैंने झट से उसकी चूत को मुँह में भर लिया और चूसने लगा। उसने मेरा सिर पकड़ कर अपनी चूत पर दबाना चालू कर दिया और उसकी मीठी सीत्कारें निकलने लगी।

"ओह... जीत अब मत तरसाओ ! प्लीज अब अंदर डाल दो !" वो सिसकारी भरते हुए बोली।

मैंने अपना तन्नाया लंड उसकी गीली चूत पर लगाया और एक ही झटके में आधा लंड उसकी कुलबुलाती चूत में डाल दिया। मैंने उसे अपनी बाहों में कस लिया और 4-5 धक्के जोर से लगा दिए। लंड बिना किसी रुकावट के अंदर समा गया।

मैंने एक हाथ से उसके उरोज़ दबाने चालू कर दिए और एक चूची को मुँह में भर कर चूसने लगा। वो मेरे नितंबों पर हाथ फिराने लगी।

वा जोर जोर से सीत्कार करने लगी- अब ज़ऊऊर् चोदो याआआआ.... आआ आआअहहह... एम्म्म...एम्म्म.... और जोर से चूसो... याआआआ.... सरा दूध पी जाओ इनका...

मैं भूखे बच्चे की तरह उसके चूचियाँ चूसने लगा।

"जीत, बड़ा मजा आआअहहह रहा है... आआह...ईईईई"

उसने अपनी जांघें चौड़ी कर ली और मैं दनादन धक्के लगाने लगा।

"ओए जोर से आह्ह..."

10-15 मिनट की चुदाई के बाद हम दोनों ही झड़ गए।

उस रात हमने 4 बार चुदाई की और फिर एक दूसरे की बाहों में पता नहीं कब नींद आ गई।

आपको मेरी यह कहानी कैसी लगी मुझे जरूर बताना।

आपका दोस्त जीत शर्मा


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चुदाई का मज़ा

Posted: 05 Feb 2013 12:14 AM PST


मैं दिल्ली की रहने वाली हूँ। जो किस्सा मैं आपको सुनाने जा रही हूँ, वोह कुछ साल पहले मेरे साथ मेरे कॉलेज के प्रथम वर्ष में हुआ था।

कॉलेज शुरू करने पर मेरा बस से आना जाना बढ़ गया। कॉलेज का पहला साल था। स्कूल से निकल कर मिली हुई आज़ादी का पहला पहला स्वाद था। दिल्ली की बसों में चलने की आदत भी पड़ने लगी, और मज़ा भी आने लगा। वैसे तो दिल्ली की बसें लड़कियों के लिए मुसीबत भरी होती हैं, इतनी भीड़ होती है, ऊपर से भीड़ में हर मर्द आशिक बन जाता है।

वैसे तो कॉलेज जाना शुरु होने से पहले से ही दिल्ली की बसों में कोई न कोई अंकल हमेशा कभी मेरे मम्मे दबा देते, तो कभी मेरी चूत सहला देते।

लेकिन कॉलेज के पहले साल तक मुझे इस मुसीबत में मज़ा आने लगा था। मेरी जवानी खुद ही गर्मी खा रही थी। दिल्ली की बसों में मर्दों के भूखे हाथ अच्छे लगने लगे थे।

जब सहेलियों के साथ होती तब तो सीधी रहती लेकिन जब अकेली कॉलेज जा रही होती तो अगर कोई बस में मेरे मम्मे दबाता, तो बजाये उसे मना करने के या दूर हटने के, मैं चुपचाप अनजान बनी रहती। उसकी हिम्मत बढ़ती और वह रास्ते भर मेरी चूचियाँ दबाता, या फिर मेरी चूत सहलाता।

कभी कोई लड़का अपना खड़ा लण्ड मेरी चूत या गांड से सटा के दबाता। कोई कोई तो इतनी बेरहमी से चूचियाँ मरोड़ता था कि सीधे बिजली की तरह चूत में कर्रेंट लग जाता। मुझे इतना मज़ा आने लगा था कि कभी कभी जानबूझ कर बिना ब्रा और पैन्टी पहने कॉलेज जाती। ब्रा और पन्टी बैग में रख लेती, कॉलेज पहुँच कर पहनने के लिए।

बिना ब्रा के जब कोई मर्द मेरे मम्मे पकड़ता और दबाता, ऐसा लगता जैसे मैं नंगी हूँ और उसके खुरदुरे हाथ चोदने से पहले मेरी चूचियों का आनन्द ले रहे हैं। बिना पैन्टी के जब किसी का खड़ा लण्ड मेरी चूत से टकराता तो बस उसकी पैंट और मेरी स्कर्ट के पतले कपड़े के अलावा बीच में कुछ नहीं होता।

और लड़कियाँ कभी कभी बस में सफ़र करने से शिकायत करती थीं, पर मुझे तो दिल्ली की बसों में सफ़र करना बहुत भाता था।

एक दिन ऐसा ही हुआ कि मैं बस में कॉलेज जा रही थी। पहली क्लास थोड़ी देर से थी, लेकिन बस ठसाठस भरी हुई थी।

बस एक स्टॉप पर रुकी और दो लड़के बस में चढ़े। अन्दर जगह नहीं थी, पर जगह बनाते हुए वे अन्दर आ गए। उनमें से एक की नज़र मुझ से मिली, और न जाने क्यों उसने मेरी तरफ बढ़ना शुरू कर दिया। भीड़ को चीरते हुए, वह बस में अन्दर आता रहा और मेरे पास आकर रुक गया।

दूसरा लड़का भी उसके पीछे पीछे जगह बनता हुआ पास में आ गया। पहला लड़का ऊंचा और गोरा था, दूसरा लड़का साधारण ऊँचाई और रंग का था। दोनों मेरे पास थोड़ी देर तक चुपचाप खड़े रहे। बस चलती रही और उसके तेज़ मोड़ और धक्के बार-बार मुझे उस ऊंचे लड़के से टकराने पर मजबूर कर रहे थे। शायद उस लड़के को मेरे मम्मों के उछाल से समझ में आ गया कि मैंने ब्रा नहीं पहनी है। वह ध्यान से मेरे सीने की ओर देखने लगा और फिर थोड़ा और आगे बढ़ कर मेरे और करीब आ गया।

अब तो मेरी नाक उसकी छाती से टकरा रही थी। अगली बार जब बस का धक्का लगा, तो मैं करीब करीब उसके ऊपर गिर ही पड़ी। संभलने में मेरी मदद करते हुए उसने मेरे दोनों चूचियों को पूरी तरह जकड़ लिया। इतनी भीड़ थी और हम इतने करीब थे कि मेरे सीने पर उसके हाथ और मेरी चूचियों का बेदर्दी से मसलना कोई और नहीं देख सकता था। मेरे सारे शरीर में कर्रेंट दौड़ गया, अपनी चूत में मुझे अचानक तेज़ गर्मी महसूस होने लगी। इतना सुख महसूस हो रहा था कि दर्द होने के बावजूद मैंने उसे रोका नहीं।

बस फिर क्या था, उसकी समझ में आ गया कि मैं कुछ नहीं बोलूंगी। फिर तो वह और भी पास आ गया और मेरे मम्मे सहलाने लगा। मेरी चूचियाँ तन कर खड़ी हो गई थी, वह उनको मरोड़ता और सहलाता। मेरी आँखें बंद होने लगी, मैं तो स्वर्ग में थी !

तभी मुझे एहसास हुआ कि पीछे से भी एक हाथ आ गया है जो मेरे मम्मे दबा रहा है। दूसरा लड़का मेरे पीछे आकर सट कर खड़ा हो गया था। उसका लण्ड खड़ा था और मेरी गांड से टकरा रहा था।

अब मैं उस दोनों के बीच में सैंडविच हो गई थी, दोनों बहुत ही करीब खड़े थे और मुझे घेर रखा था। इतने में पहले लड़के ने अपना हाथ नीचे से मेरी टी-शर्ट में डाल दिया। उसका हाथ मेरे नंगे बंदन पर चलता हुआ मेरे मम्मों के तरफ बढ़ने लगा।

मेरी सांस रुकने लगी, मन कर रहा था की चीख कर अपनी टी-शर्ट उतार दूँ और उसके दोनों हाथ अपने नंगे सीने पर रख लूँ।

आखिर उसके हाथ मेरी नंगी चूचियों तक पहुँच ही गए। अब तो मेरी वासना बेकाबू हुए जा रही थी।

पीछे खड़े हुए लड़के ने भी अपना हाथ मेरी टी-शर्ट के अन्दर डाल दिया। अब तो मैं सैंडविच बन कर खड़ी थी, मेरे एक मम्मे पर पीछे वाले का हाथ था, और दूसरे को आगे वाले ने दबोच रखा था।

तभी आगे वाले लड़के ने अपना मुँह मेरे कान के पास ला कर कहा,"मज़ा आ रहा है न?"

मैंने कोई जवाब नहीं दिया। मुँह में ज़ुबान ही नहीं थी।

उसने फुसफुसा के कहा,"थोड़ी टाँगे फैला दे तो और भी मज़ा दूंगा।"

मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा। लेकिन वासना की आग इतनी तेज़ जल चुकी थी कि अपने को रोक न पाई, बिना कुछ कहे मैंने अपने टाँगें थोड़ी फैला दीउसने अपना एक हाथ मेरे मम्मे पर रखा, और दूसरा मेरी स्कर्ट में घुसा दिया। उसकी उँगलियाँ मेरी कोमल कुंवारी चूत तक पहुँच गई।

जैसे ही उसके हाथ मेरी चूत के हल्के बालों से टकराए, वह चौंक गया, फिर अपने दोस्त से फुसफुसा कर बोला,"साली ने पैन्टी भी नहीं पहनी है। यह तो चुदने के लिए बस में चढ़ी है।"

फिर अपनी उंगलिओं से मेरी चूत की फांकें अलग करके उसने एक उंगली मेरी गीली चूत में घुसानी चाही, लेकिन उसको रास्ता नहीं मिला।

अब वह दुबारा चौंका और मुझसे ऐसी आवाज़ में बोला कि बस मैं और उसका दोस्त ही सुन सकते थे,"रानी, इतनी बेताब हो चुदने के लिए लेकिन अभी तक तुम्हारी चूत की सील भी नहीं टूटी है। अगर तुम चाहो तो हम तुम्हारी चूत का ताला अपनी चाभी घुसा कर खोल देते हैं, फिर चाहे कितना भी मज़ा करना।"

उसके दोस्त ने मेरी चूची को नोच कर मेरे दूसरे कान में मदहोश करने वाले तरीके से फुसफुसा के कहा,"छुआ छुई में जो मज़ा है, रानी, असली चुदाई में उस से कहीं ज्यादा मज़ा आएगा। और हम तुझे चोदेंगे भी बहुत प्यार से। तीनों मिल के मौज करेंगे और फिर तुझे हिफाज़त से छोड़ देंगे।"

पता नहीं तब तक मेरी बुद्धि कहाँ जा चुकी थी, मेरी चूत से नदी बह रही थी, मम्मे और चूचियाँ बुरी तरह दुःख रहे थे लेकिन उनका मीठा मीठा दर्द मेरे शरीर में आग लगा रहा था, मैंने धीरे से पूछा,"कहाँ और कैसे?"

बस, फिर क्या था, दोनों की आँखों में चमक आ गई। लम्बे कद वाला लड़का बोला,"जे एन यू में उतर जाते हैं। उसका कैम्पस बड़ा है, और वहाँ काफी जंगल है। मुझे एक दो जगह मालूम हैं, वहाँ कहीं अपना काम बन जाएगा।"

जे एन यू तो अगला ही स्टॉप था !

सोचने या संभलने का मौका मिले, इससे पहले ही मैं उनके साथ बस से उतर चुकी थी।

जैसे ही बस हमें उतार कर चली गई, मुझे थोड़ा होश आया। यह मैं क्या कर रही थी? पर तब तक लम्बा लड़का एक ऑटो रोक चुका था और हम तीनों उस ऑटो में सवार हो गए।

उसने ऑटो वाले को रास्ता बताया। इतने में दूसरे लड़के ने मुझे बीच में बैठा कर मेरा बैग मेरे घुटनों पर रख दिया। इस तरह ऑटो वाले की निगाह बचा कर उसने फिर मेरे मम्मे और चूचियाँ मसलने शुरू कर दिए। मेरे बदन में फिर से गर्मी आने लगी, पर तब तक डर भी लगने लगा था। मैं एक नहीं, दो बिल्कुल अनजाने मर्दों से चुदने जा रही थी, मुझे तो यह भी पता नहीं था कि यह कंडोम लाये हैं या नहीं।

ऑटो चले जा रहा था और रास्ता सुनसान हो गया था। सड़क पतली थी। आखिर हिम्मत जुटा कर मैंने लम्बे लड़के से फुसफुसा के कहा "आज नहीं करते, कभी और करवा लूँगी, आज जाने दो।"

उसने बोला,"ऐसा मत बोल, रानी, आज बात बन रही है, इसे तोड़ मत। इतना आगे आकर पीछे मत हट।"

मैंने कहा,"देखो मैंने पहले कभी नहीं किया है। मेरे साथ ऐसा मत करो, मुझे जाने दो।"

हमारी बातों से ऑटो ड्राईवर को शायद शक हो गया। उसने अचानक ऑटो किनारे पर रोक के बोला,"तुम लोग इस लड़की को जानते हो?"

मुझे आशा बंधी कि ऑटो ड्राईवर के होते ये लड़के मेरे साथ कुछ नहीं कर सकते, मैंने कहा, "हम बस में मिले थे और यह मुझे बेवक़ूफ़ बना कर यहाँ लाये हैं। कृपया मुझे वापस ले चलिए।"

यह सुन कर दूसरा लड़का बोला,"चुप साली ! बस में तो टांगें चौड़ी कर रही थी, मम्मे दबवा रही थी और चुदने को रजामंद होकर हमारे साथ यहाँ आई, और अब बात से फिरती है?"

फिर ऑटो ड्राईवर से बोला,"देख चुप चाप चला चल। इसकी चूत तो आज हम फाड़ेंगे ही, चाहे कुछ भी हो जाए। अगर तू बीच में पड़ेगा तो पिटेगा। अगर साथ देगा तो तू भी इसकी ले लेना।"

यह कह कर उसने मेरा बैग हटा दिया, और मेरी टी-शर्ट पूरी तरह उतार दी। ऑटो ड्राईवर के भूखी निगाहें मेरे सीने पर गड़ गईं। लम्बे लड़के ने उसके सामने मेरे मम्मे मसलने शुरू कर दिए। ऑटो ड्राईवर ने हाथ बढ़ा कर मेरे नंगे सीने को टटोला, मेरी चूचियाँ खींची और फिर दांत दिखा के बोला, "क्या माल लाये हो! किराया भी मत देना।"

बस, फिर तो मैं समझ गई कि आज चूत खाली खुलेगी ही नहीं, चौड़ी भी होगी।

ऑटो चल पड़ा, और थोड़ी देर में एक कच्चे रास्ते पर उतर गया। थोड़ी और देर के बाद ऑटो को रोक कर तीनों उतर गए और मुझे भी उतरने के लिए कहा। चुदने का समय आता देख कर मेरे मन में रोमांच पैदा होने लगा पर दिखावे के लिए मैंने उनको मना भी किया लेकिन कोई असर नहीं हुआ।

लम्बा लड़का बोला, "देख, खड़े लण्ड पर लात मत मार। चुपचाप चुदवा ले तो प्यार से चोदेंगे, खूब मज़ा देंगे तुझे !"

दूसरा लड़का बोला,"राकेश, इसका उद्घाटन मैं करूंगा !"

तो लम्बा लड़का बोला, "नहीं रे, इस कलि का गुलाब तो मेरे लण्ड से बनेगा। मैंने इसे पटाया था, इसकी चूत मैं लूँगा।"

यह कह के राकेश ने मेरी स्कर्ट खींच के उतर दी, और मैं पूरी नंगी हो गई।

ऑटो ड्राईवर बोला, "बाबा रे बाबा, पैन्टी भी नहीं पहनी है। तुम लोग ठीक कह रहे थे, यह साली शरीफ बनती है पर रंडी है।"

फिर वे मुझे पेड़ों के बीच एक झुरमुट में ले गए, एक झटके में उन्होंने मुझे ज़मीन पर लिटा दिया। तीनों अपने कपड़े उतारने लगे और मुझे पर टूट पड़े, मेरे मम्मों और चूचियों को नोचने लगे, अपनी ज़ुबान मेरे मुँह में घुसाने लगे और मेरी टांगें चौड़ी करके मेरी चूत चाटने लगे।

"साली तेरी चूत तो इतनी गीली है और बोल रही है कि चुदवाना नहीं चाहती। इसमें मेरा लण्ड ऐसा जायेगा जैसे मक्खन में छुरी ! आज तो तुझे ऐसा चोदूँगा रांड की तेरी सारी प्यास बुझ जायेगी।"

मुझे मज़ा आ रहा था, डर लग रहा था और सचमुच में आज चुदाई होगी इस ख्याल से रोमांच भी हो रहा था।

एक साथ तीन मर्द मेरे बदन को आज बेरहमी से इस्तेमाल करने वाले थे। मैंने कई बार खीरा और गाजर चूत में घुसाने की कोशिश की थी, लेकिन इतना दर्द होता था कि आगे बढ़ नहीं पाती थी। अपने हाथ से चूत की सील तोडना मुश्किल है, पर ये लड़के तो बिना घुसाए मानेंगें नहीं। आज तो यह होना ही था। मैं यही सब सोच रही थी कि अचानक मैंने महसूस किया कि राकेश ने अपने लण्ड का सुपारा मेरी चूत पर रख दिया और धीरे धीरे धक्का लगाना शुरू कर दिया था।

वह मेरे ऊपर लेटा हुआ था और मेरी टांगें जितनी फैल सकती थी, फैला रखी थी।

मैं अभी इस बात को समझ ही रही थी कि दूसरे लड़के ने अपना लण्ड मेरे मुँह में ठूंस दिया और अन्दरबाहर करने लगा। राकेश ने लण्ड पर जोर डालना शुरू कर दिया था। मुझे दर्द होने लगा, जैसे कोई डण्डा अन्दर जा रहा हो लेकिन मुंह में लण्ड होने की वजह से कोई आवाज़ नहीं कर सकती थी।

राकेश जोर डालता रहा और धीरे धीरे उसका लण्ड मेरी चूत के अन्दर जाने लगा। हर थोड़ी देर में वोह कुछ सेकंड को रुक कर पीछे खींचता और फिर आगे दबाता। ऐसा लगा जैसे यह अनंत काल तक चला हो।राकेश का लण्ड अब मेरी चूत में जड़ तक घुस चुका था। एक मिनट रुक के राकेश ने धक्के लगाने शुरू कर दिए। अब भी दर्द से बुरा हाल था लेकिन उसके धक्के तेज़ होने लगे। मेरी चूत थोड़ी ढीली हुई तो राकेश ने धक्के लम्बे कर दिए। उधर उसका दोस्त ताबड़तोड़ मेरे मुँह को चोद रहा था। ऑटो वाला मेरे मम्मे और चूचियाँ मसलने में मस्त था।

राकेश के धक्के अब मुझे अच्छे लग रहे थे, मेरी चूत से फच फच की आवाज़ आ रही थी।

"अबे देख कैसे गांड उठा उठा कर चुदवा रही है !" यह सुन कर मैं शर्म से पानी हो गई, सचमुच मैं चुदाई का मज़ा लेने लगी थी।

ऑटो वाले के हाथों और मुँह में लण्ड के होने से चूत की चुदाई और भी मज़ेदार लग रही थी।

अचानक मुझे राकेश के धक्के बहुत ही तेज़ होते महसूस हुए। मेरी आँखें बंद थी और मेरी नाक में झाटों के बाल थे, इसलिए कुछ देख नहीं पा रही थी। तभी राकेश रुक गया। उसने अपना लण्ड मेरी चूत में जड़ तक घुसेड़ दिया और मुझे अहसास हुआ कि वह अपना पानी मेरी चूत में छोड़ रहा है।

मैं चिल्ला पड़ी,"प्लीज़ अपना लण्ड निकाल लो। मेरा बच्चा हो गया तो क्या होगा? प्लीज़ ऐसा मत करो।"लेकिन राकेश ने अपना लण्ड निकालने की जगह मेरी चूत में और थोड़ा घुसा दिया।

दूसरा लड़का बोला,"साली रांड, चुदने के लिए मर रही थी और अब बक रही है?"

जैसे ही राकेश झड़ कर मेरी टांगों के बीच से उठा, उसका दोस्त मेरी फैली टांगों के बीच में आ गया। एक झटके में उसने मेरी टांगें उठा कर अपने कन्धों पर रख लीं और बोला, "इस मुद्रा में लण्ड चूत में खूब गहरा जाता है। जब तेरी चूत में मैं अपना वीर्य छोडूंगा तो सीधे तेरी बच्चेदानी में जाएगा।"

इससे पहले कि मैं कुछ भी कहती, उसने एक झटके में अपना लण्ड मेरी चूत में उतार दिया। मैं चिल्ला पड़ी तो ऑटो ड्राईवर ने मेरे खुले मुंह में अपना लण्ड घुसा कर मेरी आवाज़ बंद कर दी।

एक बार फिर मेरी डबल चुदाई शुरू हो गई। मेरी टांगें अब करीब करीब मेरे सर तक पहुँच चुकी थी और मेरी चूत के पूरी गहराई में लण्ड जा रहा था। दूसरे लड़के ने भी अपना पानी मेरी चूत में छोड़ दिया।

मैं अब तक थक चुकी थी, मुँह थक गया था, चूत दुःख रही थी और शरीर पसीने, मिटटी और वीर्य से लथपथ था। लेकिन अभी अंत कहाँ?

अब ऑटो वाले की बारी थी। उसने मुझे उठा कर घुटने के बल झुकने को कहा। दिमाग तो काम ही नहीं कर रहा था, न शरीर में दम था। मैं चुपचाप उसकी बात मान गई। फिर उसने मेरे पीछे जाकर पीछे से मेरी चूत में अपना लण्ड डाला। मेरे सर को उसने ज़मीन की तरफ किया और कुतिया बना कर मुझे चोदने लगा।

मैंने देखा कि राकेश और उसके दोस्त ने कपडे पहनने शुरू कर दिए थे। कम से कम ये दोनों मुझे कई बार नहीं चोदेंगे। ऑटो वाले के हर झटके के साथ उसका पूरा लण्ड मेरी चूत में जाता और मुझे उसकी झाटें अपनी गांड पर महसूस होतीं। घोड़ी बनाकर वह चोदते हुए मेरे मम्मे भी दबा रहा था।

मुझे अहसास हुआ कि मुझे मज़ा आ रहा था। मैं थक गई थी और दर्द हो रहा था, लेकिन घोड़ी बन कर चुदना मेरी सबसे मनपसंद पोजीशन है।

ऑटो ड्राईवर ने भी अपना पानी मेरी चूत में छोड़ा और फिर अपना लण्ड निकाल लिया। राकेश और उसका दोस्त कपड़े पहन चुके थे। उन्हों मेरी टी-शर्ट और स्कर्ट मेरी ओर उछालते हुए कहा,"जल्दी से पहन लो, यहाँ से निकलते हैं।"

पाँच मिनट बाद हम वापस उसी बस स्टैंड पहुँच गए। मेरा बैग मुझे पकड़ा कर राकेश और उसका दोस्त किसी और बस में चढ़ गए, और ऑटो रिक्शा कोई सवारी ले कर चला गया।

मैं थोड़ी देर तक बस स्टैंड पर बैठ कर अपने टांगों के बीच में बहते वीर्य, अपने मम्मों के ज़ख़्म और चूत के दर्द को महसूस करती रही, फिर मुझे राकेश की बात याद आई,"...हम तुम्हारी चूत का ताला अपनी चाभी घुसा कर खोल देते हैं, फिर चाहे कितना भी मज़ा करना..."

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आंटी के लिए वासना-1

Posted: 05 Feb 2013 12:07 AM PST


मेरा नाम अंशु है, 23 साल का लड़का हूँ। मेरा लण्ड 7 इंच लम्बा और दो इंच मोटा है।

मेरा हमेशा से ही लड़कियों और आंटियों के साथ सेक्स करने का मन करता रहा है, ख़ास तौर से आंटियों के प्रति कुछ ज्यादा ही वासना रही है।

आज मैं आपको अपने जीवन की सच्ची कहानी बताने जा रहा हूँ। दो साल पहले की बात है मैं अपनी बी टेक सेकंड इयर की छुट्टियों पर घर आया हुआ था। मई का महीना था, एक दिन पड़ोस में ही रहने वाली संगीता आंटी हमारे घर मम्मी से मिलने आई।

आंटी क्या वो तो बला थी, उम्र लगभग 32-34 होगी, उनका सावंला चिकना बदन और उस पर 36-28-34 का उनका फिगर !

आंटी को अपने 8 साल के लड़के बंटी के लिए एक टीचर की तलाश थी। मैं उनकी बातें दूसरे कमरे से सुन रहा था। जैसे ही मैंने यह सुना, मैं तुरंत उनके सामने जा पहुंचा, मैंने कहा- आंटी मेरी अभी छुट्टियाँ चल रही हैं, मैं बंटी को पढ़ा देता हूँ !

आंटी मान गई, उन्होंने कहा- ठीक है कल से शाम पांच से सात पढ़ाने आ जाना।

मैंने कहा- आंटी दोपहर तीन से पांच कर लीजिये, क्यूंकि पांच बजे से मेरा पढ़ने का टाइम हो जाता है।

आंटी मान गई। मैं खुश हो गया क्यूंकि मुझे पता था कि सात बजे तक अंकल ऑफिस से आ जाते हैं।

अगले दिन मैं अच्छे से तैयार होकर सही समय पर आंटी के यहाँ पहुँच गया। दरवाजा आंटी ने खोला, क्या लग रही थी आंटी उस हरी साड़ी में ! साड़ी उनके बदन से एकदम कसकर लिपटी थी, उनके नितम्बों की गोलाइयाँ साफ़ दिख रही थी, उनका भरा हुआ नशीला बदन मुझे मदहोश किये जा रहा था, ब्लाऊज़ भी उनका काफी गहरे गले का था और गर्मी होने वजह से पीछे पीठ पर भी गहरा था। उनकी चिकनी पीठ पर बार बार मेरा हाथ फिराने का मन कर रहा था।

उन्होंने मुझे पढ़ाने का कमरा दिखाया, जब वो चलती थी तो उनके नितम्बों का ऊपर नीचे होना पागल कर देता था। मैं अपने आप को बहुत मुश्किल से संभाल पा रहा था।

मैंने उनकी ओर देखना बंद कर दिया और बंटी को पढ़ाने लगा।

आंटी रसोई में चली गई एक घंटे बाद आंटी चाय नाश्ता लेकर आई, मैंने कसम खा ली थी कि इस बार उनको नहीं देखूँगा। लेकिन आंटी बिल्कुल मेरे सामने आकर बैठ गई और मुझसे पूछा- अंशु, चाय में चीनी कितनी लोगे?

मैं बंटी की तरफ देखते हुए बोला- बस एक चम्मच।

फिर आंटी ने चीनी घोलना शुरु किया। इस बार मैंने उनको एक नज़र देखा लेकिन सामने का नज़ारा तो एकदम नशीला था, आंटी थोड़ा झुक कर चीनी घोल रही थी, इससे उनके स्तनों के दर्शन होने लगे थे, हालाँकि ब्लाऊज़ गहरा होने के कारण स्तन बाहर आ रहे थे लेकिन साड़ी का पल्लू उसके ऊपर हल्का सा आवरण डाले था, मगर फिर भी उनके चिकने भरे भरे स्तनों की गोलाइयाँ देख कर मैं पागल हुआ जा रहा था, अपने आप को संभालना मुझे मुश्किल लग रहा था।

मैंने आंटी से पूछा- बाथरूम कहाँ है?

उन्होंने आगे आगे चल कर मुझे बता दिया, मैं तो सिर्फ उनके ही नशे में खोया हुआ था, बाथरूम जाकर मैंने मुठ मारी तब जाकर मेरी वासना शांत हुई, वापस आकर मैं नोर्मल हो गया और आंटी के नशीले बदन हो निहारता हुआ मस्त चाय नाश्ते का आनन्द लिया।

अगले एक हफ्ते तक सब कुछ ऐसे ही चलता रहा, मैं आंटी के नशीले बदन में खोता ही जा रहा था, उनके बारे में सोच सोच कर कभी उनके बाथरूम में तो कभी रात को बिस्तर पर मुठ मार लेता था। आंटी के लिए मैं पागल हुए जा रहा था, मैं दिन रात बस संगीता आंटी के लिए परेशान रहने लगा।

एक दिन बंटी को पढ़ाते समय आंटी आकर कमरे में झाड़ू लगाने लगी, वो झुक कर झाड़ू लगते समय इतनी मस्त लग रही थी कि मन कर रहा था कि इसी पोज़ में उनको चोद दूँ। उनकी भरी हुई कमर साड़ी से कसकर लिपटी हुई थी, लग रहा था कि मुझे चोदने के लिए निमंत्रण दे रही हो।

मुझसे रहा नहीं गया, मैं उठ कर बाथरूम चला गया वहाँ जाकर अपनी पैंट खोली ही थी कि मैंने देखा, वहाँ पर संगीता आंटी की ब्रा और पैंटी धुलने के लिए पड़ी थी। मैंने उनकी पैंटी उठाई और उसे सूंघना शुरु किया। क्या खुशबू थी, मैं उस नशीली खुशबू में खोता जा रहा था। अब मैंने पैंटी को चाटना शुरु कर दिया। मुझे लग रहा था कि जैसे मैं संगीता आंटी की चूत चाट रहा था।मुझे समय का पता ही नहीं चला, एकदम से संगीता आंटी की बाथरूम का दरवाजा खटखटाने की आवाज़ आई, वो बोल रही थी- क्या हो गया अंशु? क्या कर रहे हो अंदर इतनी देर से?

मैं अंदर बिल्कुल पसीना-पसीना हो गया था, मुझे कुछ सूझ भी नहीं रहा था, हालाँकि बस एक बात अच्छी थी कि मैं मुठ मार चुका था। मैंने अंदर से कहा- आंटी, मेरा पैर फिसल गया है, मैं बिल्कुल भी चल नहीं पा रहा हूँ।आंटी परेशान होकर बोली- बेटा, तुम किसी तरह दरवाजा खोल लो और बाहर आ जाओ।

मैंने आंटी की पैंटी को एक बार जी भर कर और चाटा, फिर नीचे फेंक दी। उसके बाद मैंने पानी की कुछ बूंदों से अपने नकली आंसू बनाये, थोड़ा सा पानी लेकर अपना पैंट गीली कर ली और करीब एक मिनेट बाद दरवाजा खोला और अपनी रोने की एक्टिंग जारी रखी।

मुझे लंगड़ाता और घिसटता देख कर आंटी को मुझ पर दया आ गई, उन्होंने मुझे अपने दोनों हाथों से पकड़ा और ऊपर उठाने की कोशिश की। उन्होंने मुझे सामने से पकड़ा, उनके दोनों हाथ मेरी पीठ पर थे। मैं भी यह मौका कहाँ छोड़ने वाला था, मेरा एक हाथ उनकी चिकनी पीठ को सहला रहा था तो दूसरा उनके रसीले नितम्बों की गोलाइयाँ नाप रहा था और मैं उनसे चिपका जा रहा था, मुझे लग रहा था कि बस यही स्वर्ग की अनुभूति है।

उसी समय मुझे एक और शरारत सूझी, मैंने अपना वजन थोड़ा भरी किया और लड़खड़ा गया, इससे हुआ यह कि मैं नीचे गिरने लगा और इस चक्कर में आंटी का पल्लू नीचे गिर गया। नीचे गिरते हुए मेरे दोनों हाथ आंटी की पीठ से होते हुए उनके पेट पर,फिर उनकी कमर का स्पर्श लेते हुए उनकी दोनों जांघों पर टिक गए मैंने उनकी दोनों जांघों को कसकर पकड़ लिया और जी भर का उनकी रसीली जांघों का स्पर्श-आनन्द लिया।

इससे पहले कि आंटी अपना पल्लू सम्हालती, मैं जोर जोर से रोने लगा, इस कारण आंटी अपना पल्लू सम्हलना भूल कर मुझे फिर से उठाने के लिए झुकी। उनके बूब्स अब मुझे पूरी तरह से देख रहे थे। इस बार तो मैंने मैदान मारने की ठान ली थी।

आंटी बोली- अंशु बेटा, कहाँ लगी? चलो, रोते नहीं ! चलो उठो !

मैंने अपने दोनों हाथ उनके कंधों पर रख लिए और उनके खुले हुए वक्ष से चिपक कर रोने लगा।

फिर हम दोनों धीरे धीरे आंटी के बेडरूम जाने लगे, बेडरूम बाथरूम के बगल में था।

कहानी जारी रहेगी।

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