हिंदी सेक्सी कहानियां



हिंदी सेक्सी कहानियां


अक्षरा-2

Posted: 28 Feb 2013 08:40 PM PST


मुलाकातों का दौर बढ़ता चला गया। अब इतनी मुलाकातों में वरुण भी अक्षरा को ठीक से समझ चुका था।

एक दिन वरुण अक्षरा से बोला- मेरे पास एक खबर है।

अक्षरा बोली- वो क्या??

वरुण ने बताया- मेरी शादी पक्की हो गई है, लड़की का नाम रेशम है।

अक्षरा सन्न रह गई, जैसे छाती में से किसी ने दिल को निकाल लिया हो, आँसू पोंछते हुए बोली- बधाई हो।

साफ पता चल रहा था कि अक्षरा वरुण को चाहने लगी थी। वरुण भी रुआंसा हो उठा.. लग रहा था वो भी अक्षरा के चाहने लगा था। उसकी दोस्त से जाने रिश्ता रहता या नहीं उसका शादी के बाद !

वरुण ने बताया- व्यापार के सिलसिले में बाहर भी जाना है, करीब 4 महीनों में लौटूँगा।

अब तो अक्षरा उठी और बस चल दी वरुण आवाज देता रह गया।

कुछ दिन बाद वरुण की शादी थी। अक्षरा को फोन मिला मिला कर थक गया था, फोन लग ही नहीं रहा था।

उसने मनोज को मेसेज भेजा कि अक्षरा को मेरी शादी के बारे में बता देना।

उत्तर आया- मैं तो जम्मू में हूँ, बस तेरी शादी के दिन आऊँगा, पर यह अक्षरा कौन है?

वरुण ने बताया- वो रंगीली...

मनोज को कुछ पता तो था नहीं... उसके सवालों की झड़ी लगने से पहले ही वरुण ने कहा- बाद में तेरे को सब बताता हूँ।

मनोज बोला- तू चिन्ता ना कर, तेरा काम करवा दूँगा।

"अहसानमंद रहूँगा !" ऐसा कह कर वरुण ने फोन रख दिया।

मनोज ने मौसी से कह कर रंगीली तक यह बात पहुँचा दी। रंगीली शादी में आई और शुभकामनायें देकर चली गई।

मनोज को शादी के कुछ समय बाद धीरे धीरे रेशम की वास्तविकता का पता चला कि रेशम एक अमीर बाप की बिगड़ी हुई औलाद है, उसके गर्भ में जो बच्चा है वो भी वरुण का नहीं, ना वो उसको प्यार करती है।

वरुण पागल-सा हो गया। उसको कुछ समझ में नहीं आ रहा था... कि करे क्या और क्या करे??

उसको अपने मित्र मनोज की याद आई। उसने मनोज को कॉल कर सारी बातें बताई।

मनोज ने सलाह दी कि रेशम से उसके बॉयफ्रेंड के बारे में पूछे।

रेशम को बहुत प्यार से विश्वास में लेकर वरुण ने पूछा और उसने अपने बॉय फ्रेंड का नाम अनूप बता दिया।

अब वो रेशम को लेकर अनूप से मिलने चल दिया। अनूप के पास पहुँच कर अनूप को सारी स्थिति बताई तथा अपने होने वाले बच्चे तथा रेशम को अपनाने के लिये कहा।

लेकिन अनूप इस बात के लिये तैयार नहीं हुआ तथा बहाने बनाने लगा।

तभी वरुण ने मनोज को फोन किया और मनोज इत्तेफाक से उसी शहर किसी कार्य से आया हुआ था, मनोज ने कहा- दस मिनट इंतजार कर, मैं अभी तुम्हारे पास आ रहा हूँ।

दस मिनट बाद एक पुलिस की जीप अनूप के घर के आगे रुकी और उसमें से इंस्पेक्टर मनोज 6 कांस्टेबल के साथ जीप से उतर कर घर की तरफ़ बढ़ने लगे।

उनको देख कर अनूप की सांसें उखड़ने लगी।

इंस्पेक्टर मनोज दनदनाते हुए बैठक में घुस गए, मनोज ने वरुण से गर्म जोशी से हाथ मिलाया और बोले- बताओ क्या मामला है।

वरुण ने सारी बातें मनोज को कह सुनाई। मनोज ने अनूप को कानूनी और पुलिसिया भाषा दोनों में समझाया। थोड़े प्रयास के बाद अनूप ने वरुण से माफ़ी मांगी और रेशम को स्वीकार करने के लिये राजी हो गया और मनोज के साथ वरुण अपने घर वापस आ गया।

मनोज ने वरुण से अक्षरा के विषय में पूछा। वरुण ने बताया हम अंतिम समय शादी में मिले थे। मनोज उसको लेकर काला बाजार चल दिया और सीधा मौसी के पास पहुँचा।

वरुण थोड़ा हिचकिचा रहा था परन्तु मनोज के साहस बंधाने पर वो चल दिया।

मौसी बैठी पान चबा रही थी, मनोज को देखते ही बोली- क्या इंस्पेक्टर बाबू !!! तुम जम्मू क्या चले गए, हमको तो भूल ही गए?

मनोज मौके को सम्हालते हुए बोला- ऐसी कोई बात नहीं है मौसी.. कैसी हो...? मिलता तो रहता था समय समय पर मेरा सन्देश। अब भी तो आया हूँ आपके पास !

और हँस पड़ा।

मनोज ने मौसी से रंगीली के बारे में पूछा तो मौसी ने बताया कि जब से वरुण की शादी से आई है मेरा तो कोठा जैसे चलना ही बंद हो गया है। जाने कौन है यह वरुण। जब से आई है उसी रात से ना सोती है, ना कुछ खाती है, कभी खा लिया तो खा लिया... उसकी एक थिरकन पर महफिल में सब वाह-वाह कर उठते थे अब वो ही रंगीली फीकी और सूख कर कांटा हो गई है। जाने कितना समझाया उसको, पर वो है कि समझने को तैयार ही नहीं, बस रोती रहती है।

इशारा करके बोली- यह साथ में कौन है? कुछ खातिरदारी या व्यवस्था करवाऊँ?

"वरुण है !"

सुनते ही मौसी थोड़ा कड़की, थोड़ा भड़की और बस मन मसोसकर रह गई।

मनोज बोला- इसको रंगीली से मिलना है।

रूबी को बुला कर कमरे में भेज दिया। साथ ही पीछे मनोज और मौसी भी आ खड़े हुए।

रंगीली वरुण को देखा और अनदेखा सा करके बैठ गई।

वरुण ने पुकारा- "अक्षरा !"

कोई जबाब नहीं आया, वरुण ने फिर से पुकारा- अक्षरा !

आवाज आई- यहाँ कोई अक्षरा नहीं है।

"और रंगीली....."

"रंगीली वो नाचने वाली....? वो तो आपसे मिलने के बाद ही खत्म हो गई थी, तब से घुंघरुओं को हाथ तक नहीं लगाया !"

"अक्षरा क्यों नहीं है यहाँ? वरुण ने कहा।

"जब आप मेरे नहीं तो अक्षरा नहीं। अक्षरा को कोई नहीं जानता था.. सिवाय आपके... रंगीली को अक्षरा बनाने का श्रेय जाता है तो सिर्फ आपको।"

वो बोली- आपके साथ घूमना फिरना, मस्ती वो कुल्फी खाना और वो एक एक पल जो आपके साथ गुजारा था.. उसी को याद कर मैं आज तक जी रही हूँ। इतना प्यार था और उसी प्यार पर विश्वास कि आप एक दिन जरूर आओगे। पर यह भी पता था कि शादी होने के बाद आप किसी नाचने वाली के साथ क्यों घूमेंगे !

... और इतना कहते ही वो रो पड़ी।

"एक मुजरे में नाचने वाली लड़की की जिन्दगी को किस कदर आपने बदल दिया आपको इस बात का अंदाजा भी नहीं। अब मुझे मेरे हाल पर अकेली छोड़ दीजिए।"

"यहाँ इस तरह घुट-घुट कर जीने को?" वरुण बोला।

अक्षरा ने कहा- उससे आपको क्या वरुण ! मैं कैसे भी रहूँ?

"तुमने पहले क्यों नहीं बताया कि ये सब कुछ चल रहा था तुम्हारे जहन में?" वरुण ने कहा।

"कुछ भी बताने से पहले तुमने अपनी शादी की खबर जो दे दी थी। बता कर भी क्या होता? तुम एक सफल बिजनेस मैन हो। क्या किसी कोठे पर मुजरों में नाचने वाली लड़की से शादी करते?" रूआंसी अक्षरा बोली।

अपने को सम्हाल कर बहुत हिम्मत करके अक्षरा बोली- दीदी कैसी हैं?

मनोज बोला- हम उनको उनके घर हमेशा के लिये छोड़ आए हैं।

वरुण ने कहा- क्या तुम मेरे साथ चलोगी?

प्यारी-सी मुस्कान-स्वीकृति देख वरुण ने अक्षरा को ह्रदय से लगा लिया।

मौसी भी खड़े-खड़े देख रही थी।

मनोज और मौसी के चेहरे पर भी सुकून के भाव थे।

सोने के कंगन

Posted: 28 Feb 2013 07:57 PM PST

दोस्तो, मेरा नाम निहारिका है, यह मेरी पहली कहानी है, आशा करती हूँ आप सभी को पसंद आएगी।

बारहवीं कक्षा पास करते ही मुझे बैंक में क्लर्क की नौकरी मिल गई लेकिन मुझे अपने घर से दूर पोस्टिंग मिली, इतनी कम उम्र में घर से दूर रहना आसान नहीं था पर घर के हालात ऐसे थे कि मुझे और मम्मी-पापा को यह समझौता करना पड़ा। मैंने किराये पर एक मकान लिया जिसमें बस एक कमरा था।

मम्मी-पापा तीसरे चौथे महीने मिलने आते थे, शुरू शुरू में बहुत दिक्कत होती थी पर धीरे धीरे आदत पड़ गई। वैसे मेरे मकान मालिक भी अच्छे लोग थे तो थोरि आसानी से जिन्दगी कटने लगी पर अकेलापन बहुत लगता था। तब मैंने अकेलापन दूर करने के लिए एक कुत्ता पाल लिया और ऐसे ही तीन साल निकल गए। अब अकेले रहने का डर आत्मविश्वास में बदल गया था और मेरी जवानी भी परवान चढ़ने लगी थी आस पास के लड़कों का दिल मेरे जिस्म को देख कर डोल जाता था पर मैं इस सबसे दूर ही रहती थी।

एक दिन जब ऑफिस से घर वापस आई तो देखा टॉमी कि अपनी टांगों के बीच कुछ चाट रहा है, देखने से अजीब सी गुदगुदी होने लगी मन में।

एक रविवार ऐसे ही जब मैं टॉमी को देख कर आनन्द ले रही थी तो उस समय मेरे मकान मालिक का लड़का छत पर पढ़ रहा था शायद मेरी मस्ती भरी सिसकारियों की आवाज़ उस तक पहुँच गई और उसने चुपके से खिड़की का पट खोल के अंदर झाँका। खिड़की खुलते ही मेरी नज़र उस पर पड़ी और मेरा दिमाग एकदम से काम करना बंद हो गया, मेरी कुछ समझ नहीं आया कि अब मैं क्या करूँ, बस मैंने खिड़की बंद कर दी।

कुछ ही पल बाद इन्द्रजीत (मकान मालिक का लड़का) ने मेरे कमरे के दरवाज़े पर दस्तक दी।

मैंने पूछा- क्या बात है?

तो उसने कहा- दरवाज़ा खोलो !

मैंने दरवाज़ा खोल दिया और तभी मेरी नज़र उनके पजामे पर गई, वो बिलकुल टेन्ट बना हुआ था। इन्द्रजीत एम सी ए के फायनल इयर में पढ़ रहे हैं और कद में मुझसे 6 इंच लम्बे होने के साथ साथ मजबूत शरीर वाले भी हैं।

इससे पहले मैं कुछ समझ पाती इन्द्रजीत ने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया और बोले- मैडम, कुत्तों को क्या घूर रही हो, हमारे लौड़ों में क्या कांटे लगे हैं, कब से गली के सारे लड़के लाइन लगा के खड़े हैं और आप किसी को भाव तक नहीं देतीं।

मैं झिझकते हुए बोली- दरवाज़ा तो बंद कर लो।

इन्द्रजीत बोले- घबराओ मत मैडम, मम्मी पापा बाज़ार गए हैं, दो घंटे से पहले नहीं आने वाले।

मैं बोली- पर यह ठीक नहीं है इन्द्र मुझे छोड़ दो।

इन्द्रजीत बोले: मैडम, आज हमें भी सेवा का मौका दो।

मैं बस शरमा के रह गई और कुछ न कह सकी।

इन्द्रजीत ने धीरे धीरे मेरे गालों को चूमना शुरू किया फिर मेरे होंठो पर अपने होंठ रख दिए।

मैंने शरमा कर खुद को छुड़ाने की कोशिश की और भाग कर कमरे की दीवार से सट कर खड़ी हो गई।अपने सारे कपड़े मैंने पहले ही उतार रखे थे इसलिए मेरे बदन का पूरा नज़ारा इन्द्र के सामने था।

उन्होंने भी अपनी टी-शर्ट और पजामा उतार दिया उनका लंड अन्डरवीयर को फाड़ कर बाहर आने को तैयार था।

इन्द्रजीत ने आगे बढ़कर मेरी कमर को दोनों हाथो से पकड़ा और मेरे होंठों को चूमना शुरू किया।

इस बार मैंने भी अपने दाहिने हाथ की उंगलियाँ उनके बालो में उलझा दी और बायें हाथ से उनकी पीठ सहलाते हुए होंठों को चूसने लगी।

इन्द्रजीत का एक हाथ आहिस्ता से बढ़कर मेरे गोल गोल मम्मों पर आ गया मेरे बदन में सिहरन सी दौड़ गई पहली बार किसी ने मेरे मम्मों को छुआ था मेरे मुँह से कसक भरी आह निकलने लगी।

मेरी हालत देखकर इन्द्रजीत का जूनून और बढ़ने लगा और उन्होंने मेरे दोनों उरोज़ों को जोर जोर से मसलना शुरू कर दिया।

मैं बोली- आह इन्द्र..आह..जी..आ..त... धीरे से दबाओ अह उफ़ अह...

वो बोले- जानू, बड़े दिन से कोशिश कर रहा था, आज हाथ में आई हो आज तो पूरा रगड़ के ही छोडूँगा।

मैंने इन्द्रजीत से खुद को छुड़ाने की नाकाम कोशिश की पर उनकी मजबूत पकड़ से मैं टस से मस भी न हो सकी।

इन्द्रजीत ने मेरी गर्दन को चूमा फिर मेरे दोनों स्तनों को एक एक करके चूसने लगे और उनके हाथ मेरी चिकनी गांड पर घुमने लगे।

मैं लगातार आहें भर रही थी, सारे जिस्म में गर्मी भर गई थी, मेरी चूत में से पानी गिर रहा था और मुँह से सेक्सी आवाज़ें निकल रही थी- आह उह आ आ आअ ह इन्द्रजीत आराम से करो आह आह

इन्द्रजीत किसी बच्चे की तरह मेरा निप्पल चूस रहे थे। फिर वो धीरे से सरक कर मेरी कमर और फिर मेरी चूत को चूमने लगे, चाटने लगे यहाँ तक कि उन्होंने मेरी चूत को मुँह में भरकर काट भी लिया। मैं तो जैसे स्वर्ग में पहुँच गई, सारे बदन में झनझनाहट सी होने लगी।

तभी इन्द्रजीत ने मुझे छोड़ दिया।

मैंने कुछ कहा नहीं पर मेरी आँखों में साफ़ दिख रहा था कि जालिम ऐसे प्यासी मत छोड़।

इन्द्रजीत ने टॉमी का पट्टा पकड़ा और उसे कमरे से बाहर धकेल दिया उसके बाद दरवाज़ा बंद कर लिया।

फिर मुझे उठा कर बेड पर पटक दिया और मेरे ऊपर लेट गए और मेरे बदन के हर हिस्से पर अपने होंठों की मोहर लगानी शुरू कर दी मेरे तन बदन में सेक्स की आग जल उठी और मैं मचल मचल के उनका साथ देने लगी कभी उनको चूमती तो कभी उनका चेहरा अपने वक्ष में दबाकर चूसने का इशारा करती।

इन्द्रजीत बोले- यार, तुम तो गजब का माल हो, मज़ा आ गया।

मैंने शरमा कर अपना चेहरा अपने हाथों से छुपा लिया।

इन्द्रजीत ने अपने कच्छा उतारा और अपने लम्बा काला तना हुआ लंड मेरे मुह में डाल दिया मैं भी उसे लॉली पॉप की तरह चूसने लगी

बीच बीच में वो अपने लंड को धक्का लगा देते थे जिससे वो मेरे गले के अंदर तक चला जाता था।

ऐसे ही चूमा चाटी करते 20 मिनट बीत गए।

अब इन्द्रजीत ने मेरी टांगों को चौड़ा किया और अपने लम्बा लंड मेरी चूत के मुँह पर रखा, एक अनजाना सा डर मेरे मन में भर गया था मैंने अपनी आँखें बंद कर ली और बस एक पल की देर के बाद इन्द्रजीत ने एक जोरदार धक्का मारा। उनका दमदार लंड सनसनाता हुआ आधे से ज्यादा मेरी चूत में घुस गया दर्द से मेरी चीख निकली और आँखों से आंसू और मैं तड़पते हुए बोली- आह आह आआअ इन्द्र निकाल लो इसे ! अह उई माँ ! मैं मर जाऊँगी.. प्लीज़ निकाल लो बाहर ! आआह !

इन्द्रजीत ने मेरी बात मान कर अपना लंड बाहर खींचना शुरू किया मुझे थोड़ी राहत मिली पर यह मेरी ग़लतफहमी थी, इन्द्रजीत ने इस बार अपनी पूरी शक्ति लगाकर धक्का मारा और इस बार मेरी चूत सच में फट गई, खून की पतली धार बह निकली और उनका लंड पूरा का पूरा जड़ तक मेरी चूत में समा गया।

मुझसे दर्द बर्दाश्त नहीं हो रहा था पर मेरे होंठ उनके होंठों से बंद थे और मेरे हाथों को उन्होंने कलाई से पकड़ कर जकड़ रखा था। मैं बस छटपटा कर रह गई और सोचने लगी कि आज तो यह बंदा मुझे मार ही डालेगा।

उसके बाद 5 मिनट तक इन्द्रजीत ने कुछ नहीं किया बस ऐसे ही मुझे दबोचे हुए पड़े रहे। कुछ देर में दर्द भी कम हो गया। अब इन्द्रजीत ने धीरे धीरे धक्के लगाने शुरू किये दर्द के साथ ही मज़ा भी आने लगा।

इन्द्रजीत बोले- अब कैसा लग रहा है?

मैं कुछ नहीं बोली, बस आहें भरती रही।

फिर उन्होंने धक्कों की रफ़्तार बढ़नी शुरू की, मुझे भी अब ज्यादा मज़ा आने लगा था, मैंने कमर उचका उचका कर उनका साथ देना शुरू कर दिया। लगभग आधे घंटे तक वो मेरी चूत में अपनी मर्दानगी पेलते रहे, मैं इस दौरान दो बार झड़ चुकी थी पर प्यास अब भी नहीं बुझी थी, मैं बोल रही थी- और जोर से चोदो मेरे राजा ! आज इस कली को फूल बना दो ! रगड़ डालो मेरी चूत को ! गुलाम बना दो अपने लंड का।

मेरी ऐसी बातों को सुनकर उनका जोश और बढ़ जाता था और उनके धक्कों की ताकत भी बढ़ जाती थी, वो बोल रहे थे- रानी मज़ा आ गया, तेरी चूत मार के ऐसा लग रहा है जैसे गांजे का नशा है तेरे बदन में।

ऐसे ही न जाने कितनी देर तक हम एक दूसरे की बाहों में मचलते रहे, फिर उन्होंने अपना गर्म माल मेरी चूत में फव्वारे के साथ छोड़ दिया, मैं भी पूरी तरह निहाल हो चुकी थी..

इसी तरह हमारी चुदाई जब मौका मिलता, तब चलने लगी और ऐसा करते करते दो महीने गुजर गए।

उस दिन मेरा जन्मदिन था, मैं ऑफिस से वापस आई तो टॉमी घर पर नहीं था आवाज़ लगाने पर भी जब वो नहीं आया तो मेरे मन में शक घर करने लगा। मुझे लगा कि यह जरुर इन्द्रजीत की ही हरकत है।

तभी इन्द्रजीत कमरे में आ गए और दरवाज़ा बंद कर लिया।

मैंने गुस्से से पूछा- टॉमी कहाँ है?

वो बोले- वहीं जहाँ उसे होना चाहिए।

मैंने कहा- मतलब?

वो बोले- सरकारी पशु घर में बहुत सारी कुत्तियों के पास छोड़कर आया हूँ उसे।

मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर था, मैं बोली- आपने ऐसा क्यों किया?

वो बोले- वही बताने तो आया हूँ !

मैंने कहा- तो बताओ !?

वो बोले- आँखें बंद करो पहले।

मैंने न चाहते हुए भी आँखें बंद की, जब आँखे खोली तो देखा उन्होंने अपने खड़े लंड पर चार सोने के कंगन टांग रखे थे।

वो बोले- निहारिका, अगर इन्हें मेरे लंड से सीधा अपने हाथ में पहन कर दिखा दोगी तो मैं तुम्हें हमेशा के लिए अपनी बना लूँगा !

मैंने पूछा- मतलब??

वो बोले- तुमसे शादी कर लूँगा पगली।

मैं शरमा गई पर दिल ही दिल में बड़ी खुश भी हुई क्यूंकि इन्द्रजीत का शानदार लंड सदा के लिए मेरा होने वाला था।

बस फिर क्या था मैंने अपनी नाज़ुक उंगलियों से उनके लंड का सिरा पकड़ा और दूसरे हाथ से कंगनों को सरका कर बड़े आराम से पहन लिया।

इन्द्रजीत मेरे होंठ चूम कर बोले- आज तुम्हारा जन्मदिन है, तुम्हारे मम्मी पापा आये हुए हैं और नीचे मेरे मम्मी-पापा से बात कर रहे हैं , जल्दी ही हमारी शादी हो जाएगी।

मैं शरमा कर उनकी बाहों में सिमट गई और बोली- इससे अच्छा जन्मदिन का तोहफा और कुछ नहीं हो सकता था मेरे लिए !

मैंने धीरे से कंगन खनकाए और मुस्कुरा कर नीचे भाग गई।

अब जल्दी ही हमारी शादी होने वाली है, सुहागरात को क्या हुआ, आप सब को जल्दी ही बताऊँगी।

वैसे मैंने इन्द्रजीत को वादा किया है कि सुहागरात को मैं उन्हें अपनी गांड मारने का मौका दूँगी उन्हें और मुझे उस पल का बेसब्री से इंतज़ार है मैं अभी अपने मम्मी-पापा के घर पर हूँ इसलिए आजकल चुदाई बिल्कुल बंद है बस फ़ोन पर गर्म बातें हो जाती हैं।

आप सभी को मेरी कहानी कैसी लगी, जरूर बताएँ।

niharika6387@yahoo.com

मोटी जांघें

Posted: 28 Feb 2013 07:40 PM PST


दोस्तो, मैं अशोक कुमार चौधरी 21 वर्ष, बहरोर, राजस्थान, 6' लम्बा तथा कसरती बदन वाला हूँ आप सबके सामने अपनी आपबीती कहानी के साथ !

तो बात अक्तूबर महीने की है जब मैंने गुडगाँव में एक ग्लोबल कम्पनी में ज्वाइन किया था। मैं हेड ऑफिस में काम करता था तो उसी कंपनी में अंजलि नाम की एक लड़की भी काम करती थी। क्या मस्त माल था दोस्तो, मैं बता नहीं सकता।

उसके साथ एक लड़की और थी जो बहुत मोटी थी। वह मोटी मेरे को लाइन देती थी पर मैं उससे डरता था। मैं कमजोर नहीं था, मैं छः फ़ीट लम्बा खूबसूरत लड़का हूँ पर मैं उसके मोटापे से डर गया था। मैं अंजलि को चोदना चाहता था पर वो मेरी तरफ देखती ही नहीं थी।

तो मैंने सोचा कि चाट पर जाने के लिए सीढ़ियाँ तो चढ़नी ही पड़ती हैं, मैंने पहले मोटी को पटाने की सोची जो कि पटी हुई ही थी, बस मेरी पहल की कमी थी।

मैंने एक बार शनिवार को मोटी से बोला- मैडम, क्या आप रविवार को ऑफिस में आ सकती हो? मुझे कुछ जरूरी पेपर के प्रिंट लेने हैं।

आपको बता दूँ कि वो प्रिंटर का काम देखती थी। ऐसा कहने पर वो हंसने लगी तो मैं भी मुस्करा दिया।

रविवार को मैं जल्दी ही ऑफिस आ गया क्योंकि मुझे कुछ काम भी करना था।

मैं काम में लगा हुआ था, तभी मोटी आई, बड़ी मस्त जींस पहनी थी उसने, दोनों जाँघें आपस में टकरा रही थी। मुझको उसकी चूत से ज्यादा उसकी जांघों में रुचि थी। देखते ही मन करता था कि साली की जांघों में ही टपका दूँ।

मैं अपना कोट उतार कर बैठा था तो उसने कहा- गर्मी लग रही है क्या?

तो मैंने कहा- नहीं अन्दर हॉट ब्लोअर चल रहा है ना ! इसलिए उतार दिया, इसमें शरीर दबा रहता है, मज़ा नहीं आता काम करने में ! आपको इतनी फिट जींस में परेशानी नहीं होती?

तो उसने कहा- क्या करूँ? लड़कों के लिए पहननी पड़ती है !

मैंने पूछा- तो कितने लड़के फंसे?

तो उसने कहा- अभी तो कोई नहीं फंसा ! बस आप पर आशाएँ टिकी हैं !

बस फिर क्या चाहिए था इस जाट बॉय को !

मैंने खड़े होकर उसके होंटों पर एक लम्बा चुम्बन लिया, लगभग दस मिनट की चूमा-चाटी के बाद वो कसमसाने लगी तो मैंने छोड़ दिया।

वो गिरते गिरते बची, मुझे बड़ा मजा आया था उसके चुम्बन में !

मैंने उसको अपनी बाहों में कस लिया, बिल्कुल सोफे की तरह गद्देदार था उसका शरीर !

मैंने उसके कपड़े उतार दिए, उसने मेरे कपड़े खोल दिए थे।

मैं उसके मम्मों को दबाने लगा तो मेरा लण्ड उसकी जांघों में चला गया। मैं जैसे जैसे हिलता था, मुझे मज़ा आने लगा।

अचानक मेरी स्पीड बढ़ गई, मैं उसकी जांघों में ही होने वाला था कि अचानक मोटी मुझे से छुट कर नीचे बैठ गई और मेरे लण्ड को मुँह में ले लिया और चूसने लगी।

मुझे काफी मजा आ रहा था, मैंने उसके मुंह में अपने दूध की धार छोड़ दी। मुझे महसूस हो रहा था जैसे उसको जन्नत का मज़ा आ रहा हो !

उसके बाद वो मेरे सामने एक मेज पर बैठ गई और अपनी दोनों टांगें फैला कर बोली- अब तू मेरी चूत को चाट !

मैंने उसकी चूत की तरफ देखा तो पता लगा कि वो बहुत गीली थी। मुझे बहुत बुरा लगा। मैं चाटने के लिए तैयार नहीं था, मैंने मना कर दिया तो वो नाराज़ हो गई। मुझे भी उसमे कोई खास रुचि नहीं बची थी क्योंकि मैं झड़ चुका था इसलिए मैंने उसको मनाने की कोशिश नहीं की।

तभी मैंने देखा कि हमारा गेट मैन अपने लंड को पकड़े दरवाज़े पर खड़ा है। वो मेरा दोस्त था, मैंने उसको आँख मारी तो उसने आकर मोटी को बाहों में ले लिया और दबाने लगा।

मैंने जब उन दोनों को देखा तो मैं फिर से तैयार हो गया। मैंने उससे कहा- अजय तुम इसकी चूत को चाटो !

तो वो तैयार हो गया। मैंने अपना लंड मोटी के मुँह में डाल दिया। उसे बहुत मज़ा आ रहा था। फिर मैंने अजय को बदलने के लिए कहा तो वो मुँह पर आ गया और मैं उसकी चूत पर जाकर अपना लंड उसकी चूत के मुँह पर लगा कर एक जबरदस्त झटका दिया जिससे मोटी और अजय दोनों की चीख निकल गई। अजय की इसलिए क्योंकि मोटी को झटका लगने पर उसने अजय के लंड को काट दिया था दांतों से !

फिर हमारा चुदाई का सिलसिला चलता गया, लगभग चार घंटे तक हम तीनों ने मस्ती की।

फिर मेरे दोस्त का फोन आ गया तो मैं वहां से आ गया।

मुझे बहुत मज़ा आया उसके साथ में।

मेरा अगला निशाना तो आप को बताने की ज़रूरत नहीं होगी तो इन्त्ज़ार करें !

कैसी लगी मेरी कहानी?

पहली थी, इसलिए ज्यादा अच्छी नहीं लगी होगी, अगली कहानी में बहुत मज़ा आयगा दोस्तो !

अपने विचार मुझे ज़रूर भेजें।

आपके इंतजार में जाट पुत्र अशोक कुमार चौधरी

ashoktabbu@gmail.com

अक्षरा-1

Posted: 28 Feb 2013 07:28 PM PST


नोट उड़ाए जा रहे हैं, रंगीली नाच रही है, छम-छम कर घुंघरू पैरों में बज रहे हैं, चारों ओर वाह-वाह हो रही है।

रंगीली फरहा मौसी के कोठे की सबसे सुन्दर और अदाकार कलाकार है या यूँ समझिए कि कोठा ही रंगीली के नाम से चलता है।

रंगीली नहीं तो कोठा नहीं। रंगीली न नाचे तो न कोई नाच गाना देखने आने वाला।

एक तरफ तो महफिल जमी हुई है वहीं दूसरी तरफ दूसरी तरफ कुछ गम के मारे और कुछ पीने के शौकीन बैठे हैं गोल मेज के चारों ओर वेटर से दारू और बीयर की मांग कर रहे हैं। कुछ शान्ति सी है यहाँ।

सुबह कोई नहीं कह सकता कि यह कोठा है, लगता है गर्ल्स हॉस्टल है, एकदम सादा सच्चा-सा जीवन है, कोई चोटी बना रही है तो कोई कपड़े धो रही है, कोई सब्जी काट रही है, कोई कपड़े सुखा रही है।

मौसी पान चबा रही है और लड़ रही रूही और रूबी को डांट रही है। रात के पहने उत्तेजक कपड़े और सब कुछ और सुबह तो ऐसा कुछ नहीं। सदा-सा सलवार कमीज।

अभी शाम को वर्दी में एक नया पुलिस वाला वहाँ पर नजर आया। मौसी को इस बात की सूचना दी गई। पता चला कि नई पोस्टिंग है इस काला बाजार में।

मौसी ने शागिर्द को भेज दिया उसकी जन्म कुण्डली निकलवाने के लिये। पता चला कि वो तो बण्डल की पूजा करता है और नर्कामृत (शराब) सेवन करता है।

फिर क्या था मौसी के एक इशारे पर वो मौसी का गुलाम हो गया। रोज सलाम ठोकता और बहुत-सी चेलियों से उसकी जान पहचान तथा आना जाना हो गया।

अगले दिन पुलिस वाले के साथ एक सुन्दर नवयुवक था। उसको वो समझा रहा था कि वो एक ईमानदार पुलिस है। तब ही तो इस स्थान पर उसको नियुक्त किया गया है। लड़का पुलिस वाले का बचपन का दोस्त था।

इतने में ही एक सुन्दर सी लड़की आई और उस युवक से बोली- तू मेरे को कोल्ड ड्रिंक पिलवा रहा है या मैं तेरे को पिलवाऊँ?

युवक सहमा सा बोला- आप ही पी लीजिये।

तब वो लड़की बोली- चाचा दो कोल्ड ड्रिंक देना।

एक लड़के के हाथ में दे दी और एक खुद पीने लगी। इतना में युवक चलता बना और पुलिस वाले से बोला- क्या ड्रामा है ये?

पुलिस वाला बोला- वरुण तू एक नंबर का घोंचू है। अप्सरा तेरे पास आई और तू पत्ता काट कर आ गया। कोई बात नहीं... बचपने में होता है कभी कभी। यह रंगीली है, जो ना तो आज तक किसी के पास सोई न आसानी से जाती। और तेरे पास आई तू पागल-पंथी कर वहाँ से खिसक लिया।

वरुण पूरा दिन अपना व्यापार देखता और उसके बाद शाम को समय व्यतीत करने गपशप करने अपने पुलिस वाले बचपन दोस्त मनोज के पास चला जाता।

दो तीन दिन भी नहीं बीते ये रंगीली फिर आ धमकी, बोली- कैसा है रे तू ??

वरुण बोला- मैं ठीक हूँ, आप कैसे हो?

उसे पता नहीं क्या हुआ, बहुत खुश-सी हो गई, कहा- चाचा, मेरे वाले दो पान लगवाना।

वो बोले- अभी लगवाता हूँ मेमसाहब।

एक पान खुद मुँह में रख कर बोली- तेरा नाम क्या है?

वो बोला- मेरा नाम वरुण है और तू क्यों है इस काला बाजार में... तेरी अभी तक व्यवस्था नहीं हुई?

वरुण ने कहा- मैं तो अपने दोस्त के साथ कुछ देर गपशप करने आता हूँ। फिर चला जाता हूँ।"

"हर कोई ऐसा नहीं होता जैसा पहली नजर में सोच लिया जाता है।"

बस इतनी ही तो बात हुई थी उस अँधेरे से में... वो इतना कहकर चला गया और रंगीली देखती रह गई।

मौसी मनोज को बुलाती है और पता नहीं क्या धंधे की बातें करती है।

अगले दिन स्काइप कोलिंग करते वरुण के फोन पर किसी का मेसेज आता है- हेल्लो वरुण

वरुण अपनी बचपन की दोस्त रेशम से बात कर रहा था। उसने भी पूछ लिया- किस का मेसेज है?

आखिर महीनों में तो बातें होती थी रेशम से।

उसने कहा- पता नहीं किसका है !

और फोन साइलेंट पर कर दिया। बातें खत्म हुई, फोन पर देखा, अंतिम सन्देश था- यू देयर???

ऑफिस का कार्य तो समाप्त हो ही गया था ... वरुण ने कहा- हाँ जी, आप कौन?

जवाब आया- अक्षरा !

"अक्षरा? मैं तो किसी अक्षरा को नहीं जानता।"

मेसेज आया- रंगीली को तो जानते हो ना?

वरुण को याद आया- हाँ, यह तो वही है काला बाजार की सुंदर-सी लड़की।

उसने कहा- मेरा नंबर कहाँ से मिला?

तो बोली- पुलिस वाले से...

बहुत गुस्सा आया साले मनोज पर, मेरा नंबर एक नर्तकी को दे दिया।

"तुम भी क्या मेरे को ऐसा समझते हो?"

वरुण ने कहा- इसमें समझने की क्या बात है?

उसने याद दिलाया- ...तुमने ही कहा था कि "हर कोई ऐसा नहीं होता जैसा पहली नजर में सोच लिया जाता है !"

उसको भी अपनी गलती-सी लगी, वरुण ने कहा- मैं व्यस्त हूँ।

"ठीक है।"

"बाद ने बात करता हूँ।"

"कोई बात नहीं !"

शाम होते ही पहुँच गया अपने दोस्त के पास और बोला- मनोज बेटा, तेरे से ऐसी उम्मीद नहीं थी।

मनोज बोला- एक तो तेरी सेटिंग करा दी, ऊपर से ऐसा और सुनने को मिल रहा है।

"तू साले है ही हमेशा से ऐसा। पर वो है कहाँ?" "मुझको क्या पता?" मनोज ने कहा।

मनोज अपने काम में लग गया और वरुण अपने काम में लग गया। दो तीन दिन भी नहीं पता चला कुछ उसका।

एक दोपहर को फोन बजा... कॉल थी... उठाते ही आवाज आई- वरुण, मेरी याद नहीं आई तुमको? हम्म?

एक प्यारी सी आवाज आई उधर की तरफ से। आवाज समझ में आ रही थी। नंबर देखते ही समझ आ गया कि यह रंगीली ही थी।

फिर भी वरुण ने पूछा- कौन है?

आवाज आई- इस नम्बर को सेव कर लो, मैं अक्षरा हूँ। कैसे हो???

अक्षरा की वरुण से कुछ बातें हुई ... उसने वरुण से मित्रता प्रस्ताव रखा।अपनी बात को रखते हुए वरुण ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

अब अक्सर उनकी बातें होने लगी। थोड़ी बहुत बातें करने में परेशानी ही क्या थी ! पर लगता था जैसे अक्षरा को एक तरफा प्यार होने लगा था। दोस्ती धीरे धीरे गहराने लगी पर वरुण अभी भी कुछ परेशान सा था।

एक दिन वरुण ने कहा- मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ।

अक्षरा बोली- आ जाओ काला बाजार ! बहुत दिनों से आये भी नहीं हो।

वरुण ने कहा- नहीं ! अब मनोज का भी ट्रांसफर हो गया है, मैं आकर क्या करूँगा।

दोनों ने मिलकर एक समंदर किनारे रेस्तरां में मिलने का विचार किया।

अक्षरा बुरका पहन कर आई थी। बहुत सुन्दर लग रही थी वो।

बातों का दौर शुरू हुआ, कुछ खाया-पिया फिर अँधेरे के साथ वो चल दिए समंदर किनारे घूमने।

वहाँ पर वरुण ने कहा- बुरा ना मानो तो एक बात पूछ सकता हूँ?

अक्षरा बोली- हम दोस्त हैं, इसमें पूछना कैसा? पूछ लो यार।

तब वरुण ने कहा- तुम ऐसा काम क्यों करती हो?

अक्षरा पहले तो चुप हो गई, फिर बोली- तुमको क्या लगता है? मैं क्यों करती हूँ इस काम को? जब मैं छोटी थी तो मेरे सौतेले मौसा ने मेरे को बेच दिया था और मेरे को तो कुछ पता नहीं था... ना मैंने माँ देखी, ना बाप। मैं यहीं नाचती गाती बड़ी हुई हूँ। अभी ही नाचती हूँ। और नाचती हूँ... सब मेरे को ऐसी ही नजर से देखते हैं.. क्या मैं लड़की नहीं हूँ... क्या मेरे दिल नहीं है?? क्या वो पत्थर है जो कभी धड़कता नहीं है। आज तक मैं किसी के साथ नहीं सोई। क्या मेरा मन नहीं करता कि मेरा बॉय फ्रेंड हो... क्या मेरा मन नहीं करता कि मैं उस कोठरी से निकल कर कभी बाहर नीले आसमान के नीचे अपने प्रेमी के साथ घूमूँ। तुम मेरे को अच्छे लगे और तुम्हारे विचार भी शालीन थे। तुमने मेरे को एक लड़की की तरह देखा न कि नाचने वाली की तरह। तुम सच में देवता हो मेरे लिये।

और फफक कर वरुण की छाती से चिपक कर रोने लगी। वरुण की आँखों में आँसू आ चुके थे।

वरुण बोला- मैं हूँ ना तुम्हारा दोस्त.... रो मत प्लीज़ !

किसी तरह वरुण ने अक्षरा को चुप कराया और फिर उसको बाजार की ओर छोड़ कर घर चला गया।

कहानी जारी रहेगी।

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