हिंदी सेक्सी कहानियां



हिंदी सेक्सी कहानियां


ऋचा भाभी को चोदा

Posted: 11 Feb 2013 08:21 AM PST


बात उन दिनों की है जब मैं 19 साल का था। मेरे भाई की शादी थी। शादी में काफी सारे रिश्तेदार भी आये हुए थे। इन्हीं में से एक थी जिसने मेरी जिंदगी बदल थी। उसने मेरे अंदर सेक्स भर दिया या यूँ कहिये कि मुझे सेक्स के लिए पागल कर दिया। यह थी मेरी एक दूर की भाभी जिसका नाम था ऋचा !

देखने में तो काफी ठीक थी लेकिन उसके बोबे थोड़े कम थे पर उससे क्या? बाकी फिगर तो अच्छा था। वो पतली कमर, गोरी जांघें, सुराही जैसी गर्दन और वो मीठी आवाज़ ! साला कोई वैसे ही बेहोश हो जाये पर अपने होश तो उड़ने वाले थे ना।

चूँकि मैं एक बहुत ही शरीफ किस्म का लड़का था। मैंने जब तक किसी लड़की से फ्रेंडशिप भी नहीं की थी वैसी वाली आप समझ रहे है न।

अब क्योंकि शादी में भीड़भाड़ तो होती ही है। ऐसे ही एक दिन मैं कमरे में जाकर बैठ गया। वहाँ पर भाभी ऋचा भी बैठी थी जो अपनी माता जी के पैर दबा रही थी। मैं भी उसी बिस्तर पर जाकर बैठ गया और कुछ ऐसे ही सामान्य बातें करने लगा।

अचानक वो हो गया जो नहीं होना था। बिजली चली गई और कमरे में अँधेरा हो गया।

अरे यारो, एक बात तो बताना मैं भूल गया ! वो क्या है कि दरअसल जब सर्दियों के दिन थे और मैं सर्दी से बचने के लिए भाभी वाली रजाई में घुस गया था। बस मेरे हाथ और पैर ही रजाई के अंदर थे, मैं दीवार के सहारे पीठ लगा कर बैठा हुआ था।

हाँ तो जैसे ही अँधेरा हुआ, वैसे ही मेरी जिन्दगी में सेक्स का दीपक किसी ने प्रज्वलित कर दिया। अचानक किसी ने मेरा हाथ रजाई के अंदर से पकड़ लिया और मेरे हाथ को दबाने लगा। शुरुआत में तो मैं थोड़ा सा डर गया। पर यह मेरी भाभी थी, उनका हाथ बहुत गर्म था। मुझे काफी मज़ा आया।

वो एक अंगुली से मेरी हथेली को कुरेद रही थी। आप तो जानते हैं इसका मतलब क्या होता है ! लेकिन उस वक्त मुझे इसका मतलब नहीं पता था। मैं एक असीम आनन्द की झील में गोते लगा रहा था।

अब आप सोच रहे होंगे कि झील क्यों ?

क्योंकि अभी सागर का आना तो बाकी है। तभी बिजली आ गई, मेरे आनन्द पर तुषारापात हो गया। भाभी ने एक झटके से मेरा हाथ छोड़ दिया जैसे कुछ हुआ ही ना हो !

और फिर से लग गई माता जी के पैर दबाने।

अब क्योंकि अगले दिन बारात जानी थी तो कुछ हुआ नहीं। बारात में थोड़ी मस्ती की और साहब, हम वापिस आ गए।

अब जो नई भाभी आई थी, उसकी मुँह दिखाई की रस्म हो रही थी, वो ऋचा भाभी भी थी उसी कमरे में, वो भी पास में ही बैठी हुई थी।

मैंने नई भाभी की मुँह दिखाई की। अब वहाँ पर और भी कई महिलाएँ थी जिनमें से कई मेरी भाभी लगती थी।

उनमें से किसी ने कहा- तुमने ऋचा भाभी को भी तो पहले बार देखा है। तुमने इसको को कुछ दिया नहीं मुंह दिखाई में और मुँह भी देख लिया? ऐसे ही और पता नहीं कुछ और भी देखा हो।

और ऐसा कहकर कातिलाना मुस्कान देकर कर हंसने लगी। मैं थोड़ा शरमा गया। फिर मैंने एक बर्फी का टुकड़ा लिया और कहा- चलो कोई बात नहीं ! तब नहीं तो अब सही !

और भाभी को खिलाने लगा।

तभी किसी और मुझे धक्का दिया और मैं ऋचा भाभी के ऊपर गिर गया। मैं कुछ ऐसे गिरा कि हम दोनों के चेहरे बिल्कुल पास-पास थे और उन्होंने एक फोटो भी खींच ली और बोली- अब यह फोटो रमेश के पास जायेगी।

रमेश उनके पति का नाम है। अब जबकि हम दोनों साथ में गिरे थे और उस समय उन्होंने साड़ी पहन रखी थी काले रंग की, तो मैंने मौके का फायदा उठाते हुए अपना हाथ साड़ी के ऊपर से ही उनकी जांघ पर फेर दिया।

तभी अचानक वो हुआ जो यह कहिए कि ऐसे शादी के समय पर नहीं होना चाहिए था, एक बार फिर से बिजली चली गई और मैंने इस बार फिर एक बार मौके की नजाकत को समझते हुए उनकी साड़ी के अंदर थोड़ा सा हाथ डालने की थोड़ी सी गुस्ताखी की।

तो वो बड़े कातिलान अंदाज़ में बोली- डर जाओगे इसे देख के।

तो मैं भी बोला- मैं भी डरना चाहता हूँ।

तभी कमबख्त बिजली आ गई और अपना के एल पी डी हो गया।

उसके बाद सब कुछ सामान्य हो गया जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो !

लेकिन मेरे अंदर जो आग लग गई थी वो सामान्य नहीं हुई वो और बढ़ गई। अब मुझे किसी भी हालत में चूत, मम्मे देखने की इच्छा हो रही थी क्योंकि सेक्स तो मुमकिन नहीं था इस वक्त। हाँ अगर चूत में उंगली हो जाये अभी तो कम चल जाता क्योंकि अगले दिन सेक्स भी हो जाता इतना मुझे विश्वास था।

जो होना था, वो तो होना ही था।

अब आपको तो पता ही है कि सुहागरात गौने के बाद होती है। तो जो नई भाभी थी उसके कमरे में हमने गाने-वाने सुनने का कार्यक्रम रखा और सभी लोग आ गए।

मुझे उस समय तो नहीं पता था लेकिन अब मैं जरुर कह सकता हूँ मेरी ऋचा भाभी की चूत में जरूर खुजली हो रही होगी उस वक्त।

इसलिए उसने कहा- हम दोनों पास पास बैठेंगे।

मुझे भला क्या परेशानी हो सकती थी। हम बैठ गए और टीवी पर वीडियो गाने देखने लगे। अब जो गाने थे उनमें इमरान हशमी के ज्यादा थे, अब आपको को पता है उसके गाने कैसे होते हैं। तो धीरे-धीरे करके काफी लोग खिसक लिए। अब मैं तो खिसकने वाला नहीं था क्योंकि ऋचा जो मेरे पास थी। शुरू में हम लोग ठीकठाक बैठे थे, बस पैर रजाई के अंदर थे। इसी दौरान हमने आपस में एक दूसरे के हाथों को पकड़ा हुआ था और मजे ले रहे थे।

अब जबकि काफी लोग खिसक लिए थे और हमारे लेटने के लायक जगह थी तो मैं भी वहीं रुक लिया। कमरे में बाकी लोग सो गए थे और शायद हम दोनों ही जग रहे थे और लेटे हुए थे जिससे लगे कि हाँ साहब, ये तो सो रहे हैं।

अब मैंने भाभी के सबसे पहले गोरे गोरे गुलाबी गालों को चूमा। क्या मज़ा था।

फिर मैंने उनके गुलाबी होठों के ऊपर अपने होंठ रख दिए और मधुपान करता रहा।

हम एक दूसरे की जीभ को भी चूस रहे थे। सच में ऐसा लग रहा था कि मैं किसी और दुनिया में हूँ।

काफी देर तक चुम्बन करने के बाद मैंने सोचा कि अब आगे बढ़ना चाहिए। फिर मैंने भाभी के ब्लाउज में हाथ डालने की कोशिश की पर सफल नहीं हो पाया क्योंकि एक तो हम लेटे हुए थे और दूसरे कुछ ज्यादा आवाज़ भी नहीं कर सकते थे कहीं कोई जाग गया या फिर किसी को पता चल गया तो लेने के देने पड़ जाते।

भाभी को भी मजा आ रहा था शायद क्योंकि भाभीजी ने भी मुझे कुछ छूट देनी चाही तो वो बोली- जरा रुको।

अब सुनो उसने क्या किया?

उसने अपना मंगल सूत्र अंदर कर लिया जो बाहर था और उसके बाद अपने ब्लाउज के ऊपर के दो बटन भी खोल लिए जिससे मुझे हाथ डालने में थोड़ी आसानी हो। अब मैं बड़े आराम से उसके बोबे दबा रहा था और मसल भी रहा था। मेरा किसी औरत के बोबे दबाने या मसलने का यह पहला अनुभव था। मेरा पप्पू भी अब अंगड़ाई लेने लगा था।

उसके मम्मे बहुत ही मुलायम थे और दबाने से उनके निप्प्ल भी थोड़े कड़क से हो गए थे। अब मैं चुम्बन और वक्षमर्दन साथ में कर रहा था।

क्या बताऊँ यारो, कैसा महसूस हो रहा था। मैं तो किसी अलग ही दुनिया में पहुँच गया था। लगा, जब इसमें इतना मज़ा आ रहा तो नीचे वाली चीज में कितना मजा आएगा।

मेरा तो यही सोच-सोच कर पप्पू कुतुबमीनार बन गया था।

अब मैंने भाभी के एक हाथ को पकड़ के अपने पैंट में डालने की कोशिश की पर उन्होंने मना कर दिया, बोली- अभी नहीं। अभी ऐसे ही करते रहो बस देवर जी ! दबाते रहे और मेरे होठों को चूसते रहो। इसका स्वाद तुम अभी बाद में लेना।

लेकिन मैं भी कहाँ मानने वाला था, मैंने कहा- अगर तुमको मेरी चड्डी में हाथ नहीं डालना तो कोई बात नहीं। लेकिन मैं भाभी जी, जरूर चड्डी में हाथ डालूँगा|

उस समय उन्होंने साड़ी पहनी हुई थी जो उन्होंने लेटते समय अपनी कमर से हटा दी थी। अब वो महज पेटीकोट और आधे खुले ब्लाउज में थी जिसमे उसकी काले रंग की ब्रा मुझे साफ़ दिख रही थी।

मैंने उसका एक मम्मा मुँह में ले रखा था और उसे चूस रहा था। अब मैंने धीरे से अपना हाथ उनकी नाभि पर फिराने लगा। उनका पेट बहुत गर्म था, वो भी इतनी सर्दी में।

शायद वो काफी गर्म हो गई थी। मैं अपना हाथ उनके पेटीकोट के अंदर डालने लगा तो वो बोली- यह नहीं, यह सिर्फ तुम्हारे भाई के लिए है।

तो मैंने कहा- भाभी, तो मैं कौन सा इसे लेकर जा रहा हूँ। बस एक बार देखने तो दो, मैंने चूत आज तक देखी नहीं है और वैसे भी मैं अभी भी नहीं देखने वाला बस छू करके महसूस करना चाहता हूँ कि कैसी होती है।

लेकिन वो नहीं मानी और कहने लगी- अब तुम जाओ, काफी हो गया।

लेकिन मैं कहाँ जाने वाला था क्योंकि मुझे पता था कि इतनी मुश्किल से यह मौका मिला है, फिर कभी मिले या न मिले।

और मैं नहीं गया, वहीं लेटा रहा। अब मैंने ऐसे ही बातें करते हुए उनके पेटीकोट का नाड़ा खोल दिया। चूँकि उनका एक हाथ मेरे सर के नीचे था और दूसरा फ्री था, अब वो मुझे एक हाथ से ही रोक सकती थी और रात के ४ बज रहे थे, मैंने जबरदस्ती अपना हाथ नाड़े वाली साइड से उनके पेटीकोट में घुसा दिया।

वो मुझे रोक नहीं सकी क्योंकि उनका दूसरे हाथ को मैंने पकड़ा हुआ था।

वो कहने लगी- यह तुम्हारे भाई के लिए है, इसे मत छेड़ो।

अब मैं आसानी से उसकी पैंटी को स्पर्श कर पा रहा था, मैं पैंटी के ऊपर से ही उनकी चूत को छूने और दबाने लगा और वो बहुत ही धीरे-धीरे साँस लेने लगी क्योंकि जोर से नहीं ले सकती थी।

अब जबकि चूत बिल्कुल मेरे हाथ में थी, मैं बता नहीं सकता कि मैं कितना आनन्दित हो रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे कुबेर का धन भी इसके आगे कुछ नहीं है। कुबेर के धन को मैं इस चूत के आगे न्यौछावर कर दूँ।

अब मैंने उनकी पैंटी के अंदर अपनी उंगली घुसा दी। मुझे लगा कि उनकी पैंटी कुछ गीली हो गई थी। उन्होंने झांटें नहीं बना रखी थी। उनकी चूत के ऊपर बाल थे जो ज्यादा बड़े तो नहीं थे इसका मतलब उन्होंने कुछ दिन पहले ही अपनी झांटें साफ़ की थी।

मैंने भाभी के कान में पूछा- भाभी, कितने दिन पहले मैदान साफ किया था?

वो बोली- चल हट बदमाश ! अभी 8-10 दिन पहले ही किया था।

और बोली- अब बहुत हो गया, अब कुछ मत करना।

दोस्तो, मैं एक बात कह सकता हूँ, ये लड़कियाँ हमेशा ही ऐसे करती हैं- प्लीज, कुछ मत करो।

अब क्योंकि वो भी फंस चुकी थी, आवाज़ वो कर नहीं सकती थी और उठ कर कहीं जा भी नहीं सकती थी और न ही मैं यह मौका हाथ से छोड़ना चाहता था। मैं उनकी झांटों के ऊपर अपनी अंगुलियाँ फिरा रहा था। वाह, क्या फीलिंग आ रही थी।

अब मैंने धीरे से उनकी भगनासा को छेड़ दिया और उनके पूरे शरीर ने एक मदमस्त कर देने वाली अंगड़ाई ली। कुछ ऐसा लग रहा था जैसे कि सब कुछ मिल गया है।

अब मैंने धीरे से उनकी चूत में उंगली कर दी। उनकी चूत तो काफी गीली थी भाभी धीरे-धीरे हिलने लगी। काफी देर तक मैं उंगली करता रहा और चूत को मसलता रहा।

मैं शब्दों में नहीं बता सकता कि जब मैं उनकी चूत में उंगली कर रहा था तो कितना मज़ा आ रहा था।

उसके कुछ देर बाद मैंने उंगली बहार निकाल ली और उसे सूंघ कर देखा तो बहुत ही अजीब सी मादक खुशबू आ रही थी।

उसके बाद मैंने अपनी वो ऊँगली चाट कर देखी, कुछ नमकीन सा स्वाद था।

दोस्तों अब आपको अच्छा तो नहीं लगेगा लेकिन मुझे कहना पड़ रहा है कि उस रात उसके बाद और कुछ नहीं हुआ। उसके बाद मैं हॉल में जाकर सो गया।

अगर शानदार और खुशबूदार चूत की मालकिनें मेरा होंसला बढ़ाएँगी अपनी राय मुझे भेज कर तो मैं आपके आगे प्रस्तुत करूँगा कि कैसे मैंने भाभी को चोदा।

cool.sexyboy22@yahoo.in

भाभी को चुदना ही पड़ता है -2

Posted: 11 Feb 2013 07:42 AM PST


उसने स्पष्ट रूप से मेरा अपना रिश्ता बता दिया। मुझे कुछ शर्मिंदगी सी भी हुई... बुरा भी लगा, गुस्सा भी आया...

पर मैंने अपने आप को सम्भाला...

"ओह अंकित... ऐसा कुछ भी नहीं है... बस तुझे नीचे देखा तो ऊपर ले लिया... अब सो जा..."

हम दोनों इस झूठ को समझते थे... पर एक नाकामयाब परदा सा डालने का प्रयत्न किया था। मैं दूसरी ओर करवट लेकर लेट गई और आत्मग्लानि से भर उठी।

इतना कुछ तो वो करने लगा था ! फिर यह ना नुकुर...? समझ में नहीं आई थी।

कुछ ही देर बाद पीछे से उसने मेरा पेटीकोट ऊपर सरकाया।

अरे ! यह अब क्या करने लगा है? मैं बस इन्तजार करने लगी। उसने मेरा पेटीकोट उठा कर मेरी कमर से ऊपर कर लिया और फिर से मेरे चूतड़ों की गोलाइयों पर हाथ घुमाना आरम्भ कर दिया। इस बार तो वो पक्का जानता ही था कि मैं नींद में नहीं हूँ ! फिर...?

मैंने उसे पीछे घूम कर देखा। वो मदहोशी में मेरे चूतड़ों को जोर जोर से दबा रहा था... सिसकार भी रहा था।

अब तो उसके हाथ मेरे सीने पर भी आ गये थे। एक हाथ उसका लण्ड पर भी था। मेरे तने हुये उरोज और भी कठोर हो गये... निप्पल कड़े होकर सीधे तन गए।

मुझे बहुत तेज आनन्द आने लगा था। उफ़्फ़्फ़ ! करने दो जो यह करना चाहता है।

उसके हाथ अब मेरे कठोर स्तन को दबा रहे थे। मेरी चूत तो पानी पानी हो रही थी। मेरा मन तो चुदने को बेताब होने लगा था।

"अंकित... प्लीज अब कुछ कर ना..."

"अह... नहीं भाभी... नहीं, आप बहुत अच्छी हैं..." कहकर उसने मुझे चूम लिया।

फिर तो मैं तड़प सी उठी। उसका कड़ा तन्नाया हुआ लण्ड मेरी गाण्ड में घुस कर छल्ले को कुरेदने लगा। उसके हाथों ने मेरी चूत पर कब्जा जमा लिया, मेरी चूत को वो जोर जोर से दबाने लगा। तभी उसके लण्ड ने जोर से मेरी गाण्ड में बिना लण्ड घुसाये ही छल्ले से लण्ड दबा कर वीर्य उगल दिया। मेरी चूतड़ों की गोलाइयाँ उसके वीर्य से गीली हो गई... चिकनाई से भर गई।

उफ़ ! यह क्या कर दिया लाला... बिन चोदे ही माल निकाल दिया?

मैंने धीरे से दो अंगुलियाँ अपनी चूत में घुसा ली और अन्दर-बाहर करके अपना भी रस निकाल लिया।

चलो मेरे लिये आज तो इतना ही बहुत है। धीरे धीरे जोश आने पर तो मुझे वो चोद ही देगा। मेरे दिल से एक ठण्डी आह निकल गई।

सवेरे मेरी आँख जल्दी खुल गई। देखा तो सवेरे के पांच बज रहे थे। मैंने देखा तो अंकित मेरे पास नंगा पड़ा बेहाल सो रहा था। मैं जल्दी से उठी और वीर्य जो कि सूख कर कड़ी परत की तरह जम गया था उसे धोने के लिये बाथरूम में चली आई। मैं तो स्नान करके तरोताजा हो गई फिर अपना तौलिया गीला करके अंकित के पास आ गई। उसका लण्ड भी सूखे वीर्य से सना हुआ था पर खड़ा हुआ था। साला अभी भी कोई चोदने का सपना देख रहा है।

मुझे हंसी भी आई पर ना चुदने का अफ़सोस भी हुआ। मैंने उसका लण्ड गीले तौलिये से अच्छी तरह से साफ़ कर दिया। आस पास का बिखरा हुआ वीर्य भी साफ़ कर दिया।

उसका लण्ड इस दौरान और भी सख्त हो गया था। मैंने खेल खेल में उसके लण्ड को हौले हौले से मुठ्ठ मारना आरम्भ कर दिया। मुठ्ठ मारने से उसका लण्ड और भी खिल गया। सुपाड़ा रक्ताभ होने लगा था। लण्ड फ़ूल कर मोटा और कठोर हो गया था। उसके टोपे को मैंने अपनी अंगुली से सहलाया। उसके चीरे पर गुदगुदाया...

चीरे में से दो बून्द रस की छलक आई। मैंने धीरे से उसे चाट लिया। फिर मन मचल गया... मैंने उसका लण्ड अपने मुख में ले लिया... और चूसने लगी।

उसकी सिसकारियाँ फ़ूट पड़ी। मेरी सांसें अब तेज हो गई थी... कुछ करने को मन मचल गया था... मैं उसके ऊपर बैठ गई और उसकी कमर जकड़ ली... मैंने अपनी चूत को दोनों अंगुलियों से चौड़ा कर के उसका रक्ताभ सुपाड़ा अपनी खुली हुई चूत में डाल लिया।

"अरे भाभी... प्लीज ये मत करो... प्लीज... प्लीज !"

उसने अपनी आँखें खोल कर मुझे धकेलने की कोशिश की। पर मैंने इतनी देर में अपनी चूत उसके लण्ड पर दबा दी थी। लण्ड चूत को चीरता हुआ काफ़ी अन्दर तक उतर गया था।

"उफ़ ! यह क्या कर दिया भाभी... मुझे अब पाप लगेगा...!"

मैंने उसे और दबाते हुये लण्ड को पूरा चूत में घुसा लिया, उसके ऊपर मैं लेट ही गई।

"कुछ नहीं होगा देवर जी... यह सब काम तो देवर भाभी के रिश्ते में समाया हुआ होता है। देवर से तो भाभी को चुदना ही पड़ता है... फिर देवर तो भाभी को कब चोदने की तलाश में रहता ही है।"

"आह्ह्ह... मार डालोगी आप तो मुझे... बहुत मजा आ रहा है भाभी।"

"तभी तो... भाभियाँ देवर पर मरती हैं... बहुत मजा आता है देवर से चुदाने में..."

"बस करो भाभी... अब मार डालो मुझे ! जोर से भचीड़ दो ना..."

"अरे तू ऊपर आकर मुझे दबा कर चोद दे..."

उसने पलटी मारी और मेरे ऊपर सवार हो गया और जोर जोर से मुझे भचीड़ कर चोदनेलगा।

आह... साले ने बहुत नखरे दिखाये... पर पट ही गया ना।

"उह्ह्ह ! मेरे देवर... मार और जोर से... चोद दे मेरे राजा... दे... और दे... फ़ाड़ दे मेरी भोसड़ी राजा..."

"उफ़्फ़ मेरी भाभी... मार डालो मुझे आज... कितनी मस्त हो आप... आपकी ये चूचियां... कितनी कठोर हैं।"

मैं अपनी चूचियां दबने से बेहाल थी... इतनी जोर से तो मेरे पति ने भी नहीं चोदा था मुझे और अब क्या चोदेगा... अब तो देवर ही मेरा सब कुछ है।

उस सुबह मैं उससे दो बार चुद गई... एक बार उसने मेरी गाण्ड भी चोद दी थी।

उसने मुझे पूरी तरह से सन्तुष्ट कर दिया था... पर यह तो शुरूआत थी।

"देवर जी रात को तो बड़े नखरे दिखा रहे थे?"

"सच बताऊँ भाभी... आपको देख कर मैंने बहुत बार मुठ्ठ मारी थी... पर रिश्ता तो भाभी का था ना... फिर भैया का आदर... यह तो पाप होता ना..."

"कुछ पाप नहीं होता है... बस जब कोई दूसरा चोदता है तो लोग जल जाते हैं और जलकर बुरा भला कहते हैं... यदि उन्हें कोई चूत मिल जाये तो देखो... उनकी कैसी लार टपकती है।"

"पर जब आपने दीवार तोड़ ही दी तो मैंने आपका यह पाप अपने सर ले लिया..."

"नहीं यह पाप नहीं है... भैया तो अब कुछ कर नहीं सकते हैं ना... बाहर जाकर चुदवाने से तो बड़ी बदनामी होती, तो घर की बात घर में... कितना सुरक्षित और रोमान्टिक है ना। ना कहीं जाना ना कोई खतरा... देवर का टनाटन लण्ड... और भाभी की चिकनी रस भरी चूत..."

"धत्त भाभी... आप तो बेशरम होने लगी है..."

अंकित धीरे धीरे मेरे पास आने लगा और धीरे से उसने हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाये।

"शरमाओ मत मेरे देवर जी... अब तो मै आपकी हूँ... चाहे जैसे दबा लो मुझे... चाहो जब चोद दो मुझे..."

अंकित शरमा गया और पास आकर उसने मेरी दोनों चूचियों के मध्य अपना चेहरा दबा लिया।

उफ़्फ़ दैया ! मेरी तो धड़कनें बढ़ने लगी... चूचियां फ़ूलने लगी। चूत गुदगुदाने लगी... तभी अंकित के मोटे और टन्टनाते हुये लण्ड ने मेरी चूत पर दस्तक दी... उसने मुझे उठा कर बिस्तर पर पटक दिया... पलंग चूं चर्रर्रर्र करने लगा...

"अरे धीरे देवर जी... पलंग टूट जायेगा !!!" मैं उसके नीचे दब गई... मेरी सिसकारियाँ फ़ूट पड़ी। मैं चुदने लगी...

निशा भागवत

भाभी को चुदना ही पड़ता है -1

Posted: 11 Feb 2013 07:33 AM PST


जब मैं कॉलेज में पढ़ती थी तब मैं राहुल से बहुत प्यार करती थी।

मेरी एक हमराज सहेली भी थी विभा... वो मेरी राहुल से मिलने में बहुत मदद करती थी। एक तो वो अकेली रहती थी और वो मेरे अलावा किसी से इतनी घुली मिली भी नहीं थी। जब मैं एम ए के प्रथम वर्ष में थी... मुझे याद है मैंने पहली बार अपना तन राहुल को सौंपा था। बहुत मस्त और मोटे लण्ड का मालिक था वो। विभा मुझसे अक्सर पूछा करती थी कि आज क्या किया... कितनी चुदाई की... कैसे चोदा... मजा आया या नहीं...

मैं उसे विस्तार से बताती थी तो वो बस अपनी चूत दबा कर आह्ह्ह कर उठती थी, फिर कहती थी- अरे देख तो सही...

अपनी चूत घिस घिस कर मेरे सामने ही अपना रस निकाल देती थी। मुझे तो राम जी ! बहुत ही शरम आती थी।

राहुल ने मुझे एम ए के अन्तिम वर्ष तक जी भर के चोदा था। कहते है ना वो... चोद चोद कर भोसड़ा बना दिया... बस वही किया था उसने। पहली बार उसने मेरी गाण्ड जब मारी थी तब मैं जितना सुनती थी कि बहुत दर्द होता है... तब ऐसा कोई जोर का दर्द तो नहीं हुआ था। बस पहली बार थोड़ा सा अजीब सा लगा था...

दर्द भी कोई ऐसा नहीं था... पर हाँ जब धीरे धीरे मैं इसकी अभ्यस्त हो गई तो खूब मजा आने लगा था।

पढ़ाई समाप्त करते करते मुझमें उसकी दिलचस्पी समाप्त होने लगी थी। पर चोदने में वो अभी भी मजा देता था... मस्त कर देता था। मैंने धीरे से अपनी मां से शादी की बात की तो घर में जैसे तूफ़ान आ गया। जैसा हमेशा होता आया है... मेरी शादी कहीं ओर कर दी गई। राहुल ने भी मुझसे शादी करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। बाद में मुझे पता चला था कि वो विभा से लग गया था और उसी को चोदने में उसे आनन्द आता था।

राहुल को न पाकर मैं बहुत रोई थी, बहुत छटपटाई थी। पर विभा की बात जब मैंने सुनी तो सारा जोश ठण्डा पड़ गया था। मैं पढ़ी लिखी, समझदार लड़की थी...

मैंने अपने आप को समझा लिया था। पर उसकी वो चुदाई और गाण्ड मारना दिल में एक कसक छोड़ गई थी। मेरी शादी हो गई थी। मुझे घर भी भरा पूरा मिला था। सास थी... ससुर थे... एक देवर अंकित भी था प्यारा सा, बहुत समझदार... हंसमुख... मुझे बहुत प्यार भी बहुत करता था।

पति सुरेश एक कॉलेज में सहायक प्राध्यापक था। बहुत अनुशासनप्रिय... घर को कॉलेज बना दिया था उसने... उसकी सारी प्रोफ़ेसरी वो मुझ पर ही झाड़ता था। आरम्भ में तो वो रोज चोदता था... पर उसके चोदने में एकरसता थी। कोई भिन्नता नहीं थी... बस रोज ही मेरे टांगों के मध्य चढ़ कर चोद कर रस भर देता था। झड़ तो मैं भी जाती ही थी पर झड़ने में वो कशिश नहीं थी।

एक दिन वो बाईक से गिर पड़े... फ़ुटपाथ के कोने से चोट लगी थी। रीढ़ की हड्डी में चोट आई थी। नीचे का हिस्सा लकवा मार गया था। अब वो अस्पताल में थे...

महीना भर से अधिक हो गया था... पता नहीं ये निजी अस्पताल वाले कब तक उन्हें वहाँ रखते... शायद उन्हें तो बस पैसे से मतलब था। मैंने ससुर से कह कर अंकित को अपने कमरे में सुलाने की आज्ञा ले ली थी। अकेले में मुझे डर भी लगता था।

पर इन दिनों में मुझे अंकित से लगाव भी होने लगा था। वो मुझे भाने लगा था। रात को मैं देर से सोती थी सो बस उसे ही चड्डी में पहने हुये सोते हुये निहारती रहती थी।

उफ़ ! बहुत प्यार आता था उस पर... पर शायद यह देवर वाला प्यार नहीं था... मैं उसके गुप्त अंगों को भी अन्दर तक से एक्सरे कर लेती थी।

एक दिन अचानक मैंने अंकित को देखा कि उसका लण्ड तना हुआ था, चड्डी में से सीधा उभरा हुआ नजर आ रहा था। उसका एक हाथ तभी अपने लण्ड पर आ गया और वो उसे दबाने लगा, शायद कोई मनमोहक सपना देख रहा था।

मैं उत्तेजित हो उठी... उसे ध्यान से देखने लगी। फिर मै उठ कर उसके बिस्तर पर उसके पास ही बैठ गई।

तभी मेरे कान खड़े हो गये... वो मुठ्ठ मारने के साथ मेरा नाम बड़बड़ा रहा था।

मेरे तो रोंगटे खड़े हो गये। मेरे नाम की मुठ्ठ ! हाय रे ! मेरा मुन्ना !

मेरा बेबी... मेरा प्यारा अंकित... मैंने धीरे से हाथ बढ़ा कर लण्ड के नीचे के भाग को छुआ... उफ़्फ़ कैसा कड़क... कठोर था। मैंने धीरे से उसका नाड़ा खोल दिया और उसकी चड्डी धीरे से हटा दी... अंकित ने बाकी चड्डी को हटा कर अपना लण्ड पकड़ लिया।

उसका लाल सुर्ख सुपारा... सुपारे के मध्य में एक छोटी सी लकीर... उसमें से वीर्य की दो बूंदें निकल कर सुपारे पर फ़ैली हुई थी। मैंने

उसके सुपारे पर उंगली से चिकनाहट को स्पर्श किया।

तभी उसके लण्ड ने जोर से पिचकारी निकाल दी। मैंने अपनी आदत के अनुसार अपना मुख खोल लिया और उसकी वीर्य की पिचकारियों को मुख में जाने की अनुमति दे दी।

उफ़ कुवांरा, जवान मस्त गाढ़ा शुद्ध माल... कितना स्वाद लग रहा था। तभी अंकित की सिसकारी ने मेरा ध्यान भंग कर दिया और मैं तेजी से उठ गई।

हुआ कुछ नहीं बस वो करवट ले कर सो गया। मैं अपने बिस्तर से उसे देखती रही...

फिर बत्ती बुझा कर लेट गई। रात भर मुझे अंकित का लण्ड ही दिखता रहा... उसके वीर्य का स्वाद मुँह जैसे में आने लगा।

फिर मजबूरन मुझे उठ कर नीचे बैठना पड़ा और चूत में अंगुली फ़ंसा कर मुठ्ठ मार ली... मेरा सारा पानी छूट गया। फिर मुझे गहरी नींद आ गई।

अंकित को मैं बार बार चोर नजर से देखने लगी, मन में चोर जो घुस आया था।

मेरे मन में तरह तरह के विचार आने लगे। तब मेरे दिमाग में एक बात आई। मेरे पास सुरेश की नींद की गोलियाँ बची हुई पड़ी थी। मन का शैतान जाग उठा... रात को मैंने उसे कैसे करके वो गोलियाँ अंकित को खिला दी। खाना खाने के कुछ ही देर बाद उसे नींद सताने लगी। वो जल्द ही आज सो गया। आधे घण्टे के बाद मैंने उसे हिलाया ढुलाया... वो गहरी नींद में था।

मैंने उसके पास बैठ कर उसकी चड्डी को नाड़ा खोल कर ढीला कर दिया। फिर उसे ऊपर से खींच कर नीचे करके उसका लण्ड बाहर निकाल लिया। सोया हुआ लण्ड छोटा सा हो गया था। मैंने उसे बहुत हिलाया... पर वो खड़ा नहीं हुआ। मैंने अपने मुख में लेकर उसे चूसा भी पर वो टस से मस नहीं हुआ। मुझे बहुत निराशा हुई।

मैंने उसकी चड्डी ऊपर सरका दी। पर मैं उसे बांधना भूल गई। सुबह जब वो उठा तो उसे शायद कुछ महसूस हुआ। मैंने उसे देख तो झेंप गई।

भाभी... माफ़ करना... जाने कैसे ये चड्डी का नाड़ा रात को अपने आप कैसे खुल जाता है।

"जरूर तुम कुछ रात को कोई शरारत करते हो?" मैंने मजाक किया।

वो शरमा सा गया। उसने जल्दी से नाड़ा बांध लिया। पर शायद उसे शक हो गया था। पर फिर वो दिन भर सामान्य रहा। मैंने सावधानी बरती और आज कुछ नहीं किया। बस उसके सोते ही मैं भी लेट गई। पर नींद कहां थी? तभी मुझे अंकित के उठने और चलने की आवाज आई। मैं सतर्क हो गई... यह अंकित मेरे बिस्तर के पास क्या कर रहा है?

मैं दिल थाम कर कुछ होने का इन्तजार करने लगी।

ज्यादा इन्तजार नहीं करना पड़ा। वो मेरी बगल में लेट गया, फिर उसने मेरे पेटीकोट के ऊपर से ही मेरे कूल्हे पर हाथ रख दिया। मैं कांप सी गई। उसने हौले से हाथ फ़ेर कर मेरे सुडौल चूतड़ों का जायजा लिया।

अन्दर ही अन्दर मुझे झुरझुरी छूट गई। उसे रोकने का मतलब था कि आने वाले सुख से वंचित रह जाना। मैं सांस रोके उसकी मधुर हरकतों का आनन्द लेने लगी। अब वो मेरे चूतड़ के गोले एक एक करके दबा रहा था। उसकी हरकत से मेरा दिल लहूलुहान हो रहा था। चूत बिलबिला उठी थी। उसका हाथ गाण्ड के गोले सहलाते हुये चूत तक पहुँच रहा था...

मेरा मन बुरी तरह से डोलने लगा था। तब शायद उसने उठ कर मेरा चेहरा देखा था। मुझे गहरी नींद में सोया देख कर उसके हाथ मेरी चूचियों पर आ गये, मेरे ढीले ढाले ब्लाऊज के ऊपर से ही उसने उन्हें सहला दिया, मेरी निप्पल उसने उंगलियों के पौरों में लेकर मसल दिए।

मेरा मन चीख उठा... चोद दे रे... हाय राम इतना तो मत तड़पा... !

मैंने सोचा कि यदि मैं सीधे लेट जाऊँ तो शायद यह मेरे ऊपर चढ़ जाये और चोद दे मुझे।

मैं धीरे से सीधे हो गई... पर वो चुप से किनारे हो गया। तभी मैंने खर्राटे लेने जैसी आवाज की... तो वो समझ गया कि मैं अभी भी गहरी नींद में ही हूँ।

उसने ध्यान से मेरे पेटीकोट की तरफ़ देखा और पेटीकोट का नाड़ा खोल दिया।

मेरा दिल अब खुशी के मारे उछलने लगा... लगा बात बन गई। पर नहीं ! उसने बस मेरा पेटीकोट धीरे से नीचे किया और मेरी चूत खोल दी, उस पर अपनी अंगुली घुमाने लगा।

चूत पूरी भीग कर चिकनी हो चुकी थी। मैंने भी जान कर अपनी टांगें चौड़ा दी। उसने सहूलियत देख कर अपनी एक अंगुली मेरी चूत में पिरो दी।

मुझे अचानक महसूस हुआ कि उसका लण्ड बेतहाशा तन्ना रहा था, बहुत ही सख्त हो गया था। वो मेरे कूल्हों से बार बार टकरा रहा था। फिर वो उठा और धीरे से उसने मेरा मुख चूमा... और बिस्तर से धीरे से सरक कर नीचे उतर गया।

मेरा मन तड़प उठा। उफ़्फ़्फ़... मेरी तरसती चूत को छोड़ कर वो तो जा रहा था। अब क्या करूँ?

पर वो गया नहीं... वहीं नीचे बैठ गया और अपनी मुठ्ठ मारने लगा।

मेरा दिल तो पहले ही पिंघल चुका था। उसे मुठ्ठ मारते देख कर मुझसे रहा नहीं गया, मैंने उसकी बांह पकड़ ली- यह क्या कर रहे हो देवर जी... उठो !

वो एकदम से घबरा गया- वो तो भाभी... मैं तो...

"श्...श्... भाभी का पेटीकोट उतार दिया... चूत में अंगुली घुसेड़ दी... अब और क्या देवर जी?"

"वो तो... मैं तो..."

"चुप... चल ऊपर आ जा..."

मैंने उसे अपने बिस्तर पर लेटा लिया और उससे चिपक गई।

"अरे भाभी सुनो तो...! यः क्या कर रही हैं आप...?"

यह सुन कर मुझे एकदम होश आ गया, मैंने आश्चर्य से उसे देखा- क्या हो गया देवर जी? अभी तो आप...

"पर यह नहीं... आप भाभी हैं ना मेरी... मैं यह सब नहीं कर सकता... प्लीज !"

उसने स्पष्ट रूप से मेरा अपना रिश्ता बता दिया। मुझे कुछ शर्मिंदगी सी भी हुई... बुरा भी लगा, गुस्सा भी आया...

पर मैंने अपने आप को सम्भाला...

ओह अंकित... ऐसा कुछ भी नहीं है... बस तुझे नीचे देखा तो ऊपर ले लिया... अब सो जा...

देखेंगे आगे क्या हुआ !

निशा भागवत




 

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