शीशे का ताजमहल



शबनम का बैठकखाना खूबसूरती से सजा हुआ था, कमरे की दीवारें हल्के गुलाबी रंग से पुती हुई थी, बाईं दीवार पर एक अस्त व्यस्त ग्रामीण बाला की आदमकद तस्वीर लगी हुई थी। ठीक उसी के नीचे बड़े से दीवान पर खूबसूरत सा बेड कवर बिछा हुआ था, फर्श पर महंगा गद्देदार कालीन, सुन्दर सोफासेट..। कुल मिलकर बैठकखाना एक परिष्कृत अभिरुचि का एक जीता जागता नमूना था।कमरे की जो चीज मुझे सबसे अधिक आकर्षित कर रही थी, वो थी सोफासेट के बाजू में एक काले स्टूल पर रखी हुई ताजमहल की प्रतिकृति !लगभग दो फीट ऊँची वह प्रतिकृति चमकदार शीशे की बनी हुई थी जो कमरे की मद्धम रोशनी में हीरे की तरह जगमगा रही थी। मेरा ध्यान बार बार उस ताजमहल की ओर चला जाता और मैं भाव विभोर होकर उस कला के अद्भुत नमूने को निहारता रहता।मन होता उसे छू लूँ..। पर लगता कि मेरे छू लेने भर से कहीं वह टूट न जाये।आप सोच रहे होंगे कि यह शबनम भला कौन है और मैं उसके बैठक खाने में कैसे पहुँच गया। दरअसल शबनम मेरे दीदी की अन्तरंग सहेली है जो मेरे दीदी के घर से थोड़ी दूर पर रहती है। मेरे दीदी की शादी अहमदाबाद के एक खाते-पीते परिवार में हुई है। जीजा जी का आयात-निर्यात का अपना कारोबार है जिसमें वो अक्सर व्यस्त रहते हैं। दीदी की उम्र 35 साल है और मेरी 28 साल।दीदी की ननद की शादी नवम्बर माह में तय हुई थी। जीजाजी की व्यस्तता के कारण दीदी ने मुझे शादी की तैयारियों के लिए एक माह पहले ही बुलवा लिया था। अहमदाबाद में दीदी की आलिशान कोठी थी। दीदी ने मेरे रहने के लिए ऊपर की मंजिल में एक अलग से कमरा मुझे दे रखा था। शादी की खरीददारी के लिए दीदी अपनी अन्तरंग सहेली शबनम और मुझे साथ लेकर जाया करती थी।शबनम की उम्र 32 होगी, वह बहुत गोरी तो नहीं थी पर रंग साफ़ था। ऊंचाई लगभग 5 फीट होगी। उसके घने लम्बे घुंघराले बाल कूल्हे तक आते थे जिन्हें वो अक्सर जूड़े के रूप में बांधकर रखती थी। उसके भरे हुए गदराये जिस्म पर उभरे हुए विशाल वक्ष उसके व्यक्तित्व को पूर्णता प्रदान करते थे। वो गंभीर थी… शालीन थी.. कुल मिलाकर मैं उसके व्यक्तित्व के मोहपाश में बुरी तरह जकड़ चुका था।शादी की खरीददारी के लिए जब मैं पहली बार शबनम के घर गया तो मैं उसके ड्राइंग रूम की सजावट देखकर मंत्रमुग्ध हो गया था। विशेषकर ड्राइंग रूम में रखे उस बेहद खूबसूरत शीशे के ताजमहल के प्रति। मुझे उसके व्यक्तिगत अभिरुचि का आभास भी हो चुका था।हम लगभग प्रतिदिन शाम को चार बजे खरीददारी के लिए निकलते और रात करीब 9 बजे वापस लौट आते थे। इस बीच हम किसी काफी हाउस में काफी आदि पी लिया करते थे। मुझे शबनम का साथ अच्छा लगने लगा था। वो ज्यादा बात नहीं करती थी..। पर मैं उसकी बातें बड़े ध्यान से सुनता था….। उसकी हर ज़रूरत का ख्याल रखता था। मैं ज्यादा से ज्यादा समय उसके साथ रहने की कोशिश करने लगा था।उसमें निश्छलता थी पर मेरे अन्दर कपटपूर्ण भाव आने लगे थे। इसलिए कभी-कभार मौका देखकर जानबूझकर अनजान बनते हुए उसके शरीर का स्पर्श करने से अपने आप को रोक नहीं पाता था।ऐसा करने पर जो आनन्द की अनुभूति मुझे होती थी वह अवर्णननीय है। अपने मन की भावनाओं को छिपाकर मैंने शबनम के बारे में जानना चाहा तो दीदी ने मुझे बताया कि वह तलाकशुदा है। लगभग चार साल पहले उसने प्रेम विवाह किया था, उसके पति एक बड़े कंपनी में ऊँचे पद पर पदस्थ हैं। उसके पति ने लगभग दो साल पहले अपने घरवालों के दबाव में अपने किसी दूर के रिश्तेदार की बेटी से दूसरा विवाह कर लिया, जिससे शबनम के आत्मसम्मान को इतनी गहरी ठेस लगी कि उसने अपने शौहर से सम्बन्ध तोड़ लिया। शबनम के पति ने उस सम्बन्ध को बनाये रखने की भरपूर कोशिश की थी पर शबनम की जिद के आगे उसकी एक न चली।मैंने मन ही मन शबनम के इस कृत्य का समर्थन किया।दीदी ने मुझे यह भी बताया कि शबनम के कमरे में जो शीशे का ताजमहल रखा हुआ है उसे उसके शौहर ने ही शादी की पहली वर्षगांठ पर उसे दिया था। शादी की तारीख नज़दीक आ रही थी, सिर्फ दस दिन बचे थे, दीदी को घर की व्यवस्था देखनी थी। उसने बाकी की खरीददारी का काम हम दोनों पर छोड़ दिया। मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था। मेरे मन में तरह-तरह के ख्याल आ रहे थे।आज शाम चार बजे मुझे शबनम के साथ जाना था। मैं तीन बजे से ही तैयार होना शुरू कर दिया। मैंने सफ़ेद जींस के साथ नीले रंग का टीशर्ट पहन रखी थी। इस ड्रेस में मैं खूब फबता था। मैंने अच्छा सा सेंट लगाया और आईने के सामने अलग-अलग कोण से स्वयं को निहारता रहा। बार-बार घड़ी की ओर देखकर चार बजने की प्रतीक्षा करने लगा। जैसे-तैसे पौने चार बजे मैं घर से निकल पड़ा और चार बजने से पहले ही शबनम के घर पहुँच गया। थोड़ी देर बैठने के बाद हम निकल पड़े। खरीददारी ज्यादा बची नहीं थी इसलिए काम जल्दी निपट गया। फिर शबनम के कहने पर हम शहर के विभिन्न पर्यटन स्थलों की ओर निकल पड़े। वह मुझे एक कुशल गाइड की तरह हर एक स्थान का ऐतिहासिक महत्त्व समझाती रही। जहाँ कही भी भीड़ होती मैं जानबूझकर उससे चिपक जाता।रात के लगभग साढ़े आठ बजे थे, हम वापस लौट रहे थे। उसने मुझे अपने घर सेवइयाँ खाने के लिए रुकने को कहा तो मैं फूला नहीं समाया। मुझे मेरा लक्ष्य करीब दिखने लगा। मुझे बैठक खाने में बैठा कर वो अन्दर चली गई। मैं मंत्रमुग्ध सा शीशे के उस खूबसूरत ताजमहल की ओर निहारने लगा।थोड़ी देर में वो आई। उसने सफ़ेद सलवार के साथ आसमानी रंग का ढीला-ढाला कुरता पहन रखा था। शायद उसने ब्रा नहीं पहनी थी। उसके भारी भरकम स्तन उसके चलने से ऊपर नीचे लपक रहे थे। वो सेवई का कटोरा मेज पर रखने के लिए झुकी तो उसके उफनते हुए स्तनों का ऊपरी आधा हिस्सा ठीक मेरे आँखों के सामने था। मैं अपना आपा खो बैठा और अचानक खड़े होकर उसे अपनी बाँहों में भरकर उसके होंठों पर चुम्बन जड़ना चाहा…।मेरे होंठ उसके होंठो।म को छू पाते, इससे पहले उसने अपने दाहिने हाथ के पंजे से मेरे चेहरे को और बाएं हाथ से मेरे सीने को पूरी ताकत से परे धकेल दिया..।मैं डगमगाया और लड़खड़ा कर सोफे के बगल में रखे उस शीशे के ताजमहल से जा टकराया। ताजमहल गिरकर चकनाचूर हो चुका था बिल्कुल मेरे सपनों और अरमानों की तरह !उसके टुकड़े फर्श पर इधर उधर बिखरे पड़े थे, वो जा चुकी थीअन्दर से उसकी सिसकियों की आवाज़ मेरे सीने को छलनी किये जा रही थी। मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि उसे मनाऊँ या उससे माफी मांगूं। मैं ठगा सा किंकर्तव्यविमूढ़ बैठा स्वयं को कोस रहा था। उसके सानिध्य का जो अवसर ईश्वर ने मुझे दिया था उसे मैंने अपने उतावलेपन से खो दिया था। ग्लानि और पश्चाताप से मेरी आँखें डबडबा आई। कुछ देर यूँ ही बैठकर एक हारे हुए जुआरी की तरह मैं उठा और धीरे-धीरे बाहर निकल आया। मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था।रात में मैंने खाना नहीं खाया… ना ही मुझे नींद आई। रात भर करवटें बदलता हुआ उस मनहूस लम्हों को कोस रहा था। उसकी नज़रों में मैं गिर चुका हूँ यह सोचकर मेरा मन विचलित हो उठा।दूसरे दिन सुबह देर से उठा… सर दर्द से फटा जा रहा था।दीदी आई, मुझे छूकर देखा तो मुझे तेज बुखार था। दीदी ने मुझे आराम करने को कहा और चली गई।दिन भर मैं अपने कमरे में ही पड़ा रहा। घर पर मेहमान आने लगे थे। दीदी उन्हीं में व्यस्त थी।दो दिन से शबनम भी नहीं आ रही थी। मेरा मन आशंकाओं से भर उठा। तीसरे दिन शबनम दिखाई दी तो उसके सामने जाने का मुझमे साहस नहीं था। छिपकर मैंने देखा वो दीदी के साथ काम में हाथ बंटा रही थी। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं थे। ऐसा लग रहा था जैसे कुछ हुआ ही नहीं था। मैं कुछ निश्चिन्त हुआ और अपने कमरे में आकर चुपचाप लेट गया।लगभग एक-डेढ़ घंटा बीता होगा कि मुझे दरवाजे पर कुछ आहट सुनाई दी।उठकर दरवाजा खोला तो देखा शबनम खड़ी थी..मेरी निगाहें शर्म से नीचे हो गई।उसने कहा- कैसे हो? सुना कि तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है?मैंने कातर दृष्टि से उसकी ओर देखा… मेरी आँखे डबडबा आई, बड़ी कठिनाई से अपने आँसुओं को बहने से रोका…. और आँखें नीची कर ली।तभी दीदी आ गई- अरे शबनम तू यहाँ ? मैं तुझे कहाँ कहाँ ढूंढ़ रही हूँ। चल नीचे तुझसे काम है…।फिर उसने मेरी और देखकर कहा- तू आज से शबनम के घर रहेगा। घर पर मेहमान भर गए हैं और इस कमरे को स्टोर बनाना है। तेरी तबीयत भी ठीक नहीं है। वहाँ तुझे कुछ आराम मिल जायेगा।मैंने आश्चर्य से शबनम की ओर देखा तो दीदी ने कहा- उसे क्या देख रहा है.? उसी ने तो कहा है…इसके आगे मैं कुछ कह पाता, दोनों नीचे जा चुकी थी।रात के दस बजे थे। दीदी ने मुझे बुलाकर शबनम के साथ उसके घर जाने को कहा। हम चल पड़े। रास्ते में हमारी कोई बातचीत नहीं हुई, न उसने मुझसे कुछ कहा और न मैंने।हम चुपचाप चले जा रहे थे… अनजान इंसानों की तरह।उसके मन पर क्या बीत रही थी यह मुझे नहीं मालूम पर मेरे मन में हलचल मची हुई थी। मैंने कठोरता से बलपूर्वक अपने मन से शबनम को दूर कर उससे निर्लिप्त रहने का ठान लिया।इस बीच उसका घर आ गया, उसने दरवाजा खोला… ड्राइंग रूम में घुसते ही मेरी नज़र सबसे पहले उस जगह पर पड़ी जहाँ शीशे का ताजमहल रखा हुआ था। वह जगह खाली थी। इस बीच शबनम ने दीवान पर मेरे सोने की व्यवस्था कर अन्दर चली गई।मुझे नींद नहीं आ रही थी, मेरा मन अब शबनम के प्रति बदल चुका था। मैंने तय कर लिया था कि शबनम को अब बुरी निगाह से नहीं देखूँगा और न उसके बारे में कुछ सोचूँगा। जो गलती मुझसे एक बार हो गई है, उसे अब दोहराना नहीं है।इन्हीं विचारों में खोया हुआ मैं आँखें बंद कर चुपचाप लेटा था। लगभग बीस मिनट बीते होंगे दरवाजे पर किसी के आने की आहट सुनाई दी…देखा तो शबनम खड़ी है ..हाथों में दूध से भरा हुआ गिलास लेकर।मैं हड़बड़ाकर उठ बैठा। उसने मुझे दूध का गिलास देकर कहा- दूध पी लो…मैं यंत्रवत उसके हाथ से दूध का गिलास लेकर एक ही साँस में पूरा पी गया। शबनम के हाथों से दूध का गिलास लेते समय अनजाने में मेरी उंगलियाँ उसके उंगलियों से स्पर्श कर गई। इससे मुझे कोई उत्तेजना नहीं हुई।वो जा चुकी थी… मैं भी चादर ओढ़कर चुपचाप लेट गया। दूध सुगन्धित और स्वादिष्ट था। थोड़ी ही देर में मुझे अपने अन्दर कुछ परिवर्तन सा महसूस होने लगा। मेरे सर से पाँव तक सारे शरीर में चीटियाँ सी रेंगती हुई महसूस होने लगी। मेरा शरीर गर्म होने लगा। सारा शरीर ऐंठने लगा। मुझे ऐसा लगने लगा जैसे मेरे अन्दर सहस्त्र अश्वों का बल समाने लगा है, मैं ताकतवर होता जा रहा हूँ। मेरा लिंग आश्चर्यजनक रूप से मोटा, लम्बा और सख्त होता जा रहा था। मैंने अपने वस्त्र उतार फेंके और पूर्णतः नग्न हो गया। मैं खड़ा हुआ तो खुद को किसी अति-कामातुर अश्व की तरह पाया। मेरा जिस्म किसी स्त्री के सानिध्य के लिए विचलित हो उठा। मेरी सारी वर्जनाएं समाप्त हो चुकी थी। मैं धीरे-धीरे शबनम के कमरे की ओर बढ़ा।ज्योंही मैं शबनम के बेडरूम में पहुँचा…अन्दर का दृश्य देखकर मैं अवाक् रह गया। शबनम पूर्ण निर्वस्त्र बिस्तर पर पड़ी हुई है। उसके काले घने लम्बे घुंघराले बाल बिस्तर पर बिखरे हुए थे। उसका सांचे में ढला हुआ सा चिकना शरीर, बड़े-बड़े उभरे हुए सुडौल स्तन – स्वर्ग से उतरी हुई अप्सरा सी लग रही थी वो।मेरे आने की आहट पाकर सर घुमाकर उसने मेरी ओर देखा तो उसकी अधखुली आँखों में कामाग्नि की लालिमा साफ़ झलक रही थी। मेरी ओर देखकर वो अपने हाथों से अपने दोनों विशाल स्तनों को धीरे-धीरे सहलाने लगी।यह मेरे लिए आमंत्रण था। मैं आगे बढ़ा और उसके बिस्तर पर चढ़ गया और उसके गर्म, गदराये, निर्वस्त्र जिस्म को अपने बलिष्ठ बाँहों में भरकर उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। उसके सांसों की खुशबू से मेरा रोम-रोम खिल उठा। मैंने उसके दोनों गालों को अपने हथेलियों में लेकर उसके मस्तक, गालों, गर्दन को अपने होंठों से सहलाने लगा। उसने अपनी आँखें बंद कर मुझे कस कर जकड़ लिया और मुझ पर चुम्बनों की बौछार करने लगी। लगभग 15 मिनट तक हम एक दूसरे को चूमते रहे। उसने अपने हाथों से मेरे हाथों को पकड़कर अपने सीने पर रख दिया। मैंने उसके विशाल पुष्ट उरोजों से खेलना शुरू कर दिया। उसके बड़े- बड़े स्तन मेरी हथेलियों में नहीं समां रहे थे।मैं उसके कमर के दोनों ओर घुटनों के बल देकर उसके पेट पर बैठ गया और दोनों हाथों से उसके दोनों स्तनों को कलात्मक अंदाज़ से घुमाने लगा… दबाने लगा। उसे आनन्द आ रहा था, वो जोर-जोर से सिस्कारियाँ भर रही थी। मैं उसके बाएं और दायें स्तन को बारी-बारी से अपने दोनों हाथों से पकड़कर सख्त हो चुके भूरे चुचूक को अपने मुँह में लेकर चूसने लगा।बीच-बीच में उन्हें अपने दांतों से हल्का दबाकर ऊपर की ओर खींच लेता। जब मैं कुछ देर के लिए रुकता तो वो उन्हें पकड़कर फिर से मेरे मुँह में डाल देती। अचानक मुझे अपने भारी-भरकम उत्तेजित लिंग पर उसकी पकड़ महसूस हुई। वो मेरे लिंग को सहलाने लगी थी। मुझे अपूर्व आनंद की अनुभूति हो रही थी। मैं उसके ऊपर से उठा और उसके शरीर को – मस्तक से पैर की उँगलियों तक अपनी दसों उँगलियों से एक विशेष अंदाज़ से सहलाने लगा, जैसे कोई सर्प उसके शरीर पर इधर से उधर दौड़ रहा हो।वो अत्यधिक उत्तेजना में तड़पने लगी, उसका शरीर लहराने लगा। अचानक उसके योनिद्वार के पास मेरा दाहिना हाथ रुका। मैंने उसके योनिद्वार के कटाव को सहलाते हुए अपनी मध्यमा ऊँगली उसकी गर्म योनि में डालकर अन्दर के हिस्से को सहलाने लगा, उसका सारा शरीर थिरकने लगा। उसने अपने दोनों टांगों को कुछ ऊपर उठा कर फैला दिए। मैं अपनी उंगली उसकी योनि के और अन्दर तक ले गया और जोर-जोर से घुमा-घुमाकर रगड़ने लगा। जब भी मेरे हाथ रुकते वो विचलित हो जाती और भर्राई हुई आवाज़ में मुझे जारी रखने को कहती।उसके पैर फैलते जा रहे थे। मैं जोर-जोर से रगड़ते जा रहा था। उसकी थिरकन बढ़ती जा रही थी। अचानक उसने अपने दोनों पैरों को सटाकर योनि को सिकोड़ लिया और निढाल हो गई। वो झर चुकी थी, उसकी योनि गीली हो गई थी। उसकी उत्तेजना कुछ शांत हो गई थी पर मेरी उत्तेजना और बढ़ गई। इसे शबनम भी अच्छी तरह समझती थी। उसने मुझे चित्त लिटाया और मेरे सर के दोनों ओर अपने घुटनों को रखकर तथा अपनी दोनों कुहनियों को मेरे कमर के दोनों और रखकर मेरे लिंग को अपने मुँह में लेकर चूसने लगी। मैं उसकी कमर को दोनों हाथों से पकड़कर उसकी योनि को अपनी मुँह की सीध में लाया और अपना जीभ उसकी योनि में डाल दिया।वो मेरे लिंग को जोर-जोर से चूसने लगी। मैं अपना मुँह उसकी योनि के भीतर तक डालकर आम की तरह चूसने लगा। मैं उसकी योनि के अन्दर और बाहर जोर-जोर से चूस रहा था। उसे इतना आनंद आ रहा था कि उसने मेरे लिंग को मुँह में तो रखा था पर चूसना छोड़ दिया। वो कराह रही थी, अपने कूल्हों को हिला-हिलाकर पूर्ण आनन्द प्राप्त कर रही थी। थोड़ी देर में वो निढाल होकर मेरे ऊपर गिर पड़ी।वो फिर से झर चुकी थी।मैंने उसे अपने ऊपर से अलग किया और उसके गदराई अर्धतृप्त काया को अपनी बाँहों में समेटकर प्यार से सहलाने लगा। उसने मुझे कस कर जकड़ लिया। हम दोनों यूँ ही एक दूसरे से लिपटे हुए पड़े थे। कुछ देर पड़े रहने के बाद उसने मेरे लिंग को पकड़कर अपनी लाल-लाल याचक निगाहों से मेरी ओर देखा।मैंने उसे चित्त लिटाया और उसकी दोनों जांघों को फैलाकर उनके बीच घुटनों के बल बैठ गया। मेरा वृहदाकार लिंग पूर्ण उत्तेजित अवस्था में शबनम के प्यासे गदराये योनि में प्रवेश के लिए आतुर हो रहा था। मैंने अपने लिंग को दाहिने हाथ से पकडकड़ शबनम के योनिद्वार पर रख दिया।उसने अपने पैरों को फैलाकर थोड़ा सा ऊपर उठाया, मैंने हल्का सा धक्का दिया। लिंग थोड़ा सा अन्दर गया। मैंने लिंग को बाहर निकाला और एक जोरदार धक्के के साथ पूरे के पूरे लिंग को एक ही बार में शबनम के गर्म योनि में अन्दर तक बहुत अन्दर तक प्रवेश करा दिया।शबनम का जिस्म जोर से थिरक उठा, उसके गले से उत्तेजक चीख निकल गई, उसने मेरे कन्धों को कस कर पकड़ लिया।अब मैं अपने लिंग को धीरे-धीरे बाहर निकालकर झटके के साथ भीतर घुसाने लगा। हर झटके में वो तड़प उठती। ज्यों ही मेरा लिंग अन्दर जाने को होता शबनम अपने योनि की भीतरी दीवारों को संकुचित कर उसे जकड़कर अन्दर की गहराइयों में खींच लेती और बाहर निकलते वक़्त योनि को ढीला कर किसी अनजानी भीतरी ताक़त से बाहर की ओर धकेल देती। ऐसा वो हर प्रहार पर करने लगी।मुझे असीम आनन्द की अनुभूति हो रही थी, मैंने अपने प्रहार तेज कर दिए। वो अपने नितम्बों को उठा-उठाकर मुझे सम्भोग का सम्पूर्ण आनन्द प्रदान कर रही थी। वो चीख रही थी, चिल्ला रही थी और मैं पूरी ताक़त से उसे चोद रहा था। हम इस दुनिया से बेखबर किसी अलौकिक दुनिया में जा चुके थे। उसने अपने नाखून मेरी पीठ पर गडा दिए मैंने उसके बालों को कस कर पकड़ लिया और जोर-जोर से चोदता हुआ एक भयंकर चीत्कार के साथ अपना सर्वस्व उसकी योनि-पात्र में उड़ेल दिया।सुबह जब नींद खुली तो देखा शबनम सम्पूर्ण नग्नावस्था में मेरे समीप गहरी नींद में सोई हुई है। उसके चेहरे पर सम्पूर्ण तृप्ति और संतुष्टि के भाव थे। स्वर्गलोक की किसी अप्सरा सी लग रही थी वह।मैंने उसे आलिंगनबद्ध कर उसके माथे पर चुम्बन जड़ा… उसने आँखें खोली… मुस्कुराई… और मुझे जकड़कर अपने अंक में भर लिया। इसके बाद मैं शादी तक हर रोज़ उसके घर जाता और हम रात-रात भर रतिक्रिया में लीन हो जाते। हमने तरह-तरह के आसनों में एक दूसरे को यौनसुख का आदान-प्रदान किया, नए-नए अनुभव प्राप्त किये।शादी के तीसरे दिन मैं वापस आ गया। आते समय मेरा मन भारी था पर शबनम गंभीर… निर्विकार थी, उसके चेहरे पर दुःख का कोई भाव नहीं था। इस घटना के करीब एक माह बाद मैंने शीशे का ठीक वैसा ही ताजमहल खरीदकर उसे भिजवा दिया और एक कागज़ के टुकड़े पर लिखा- आपका जो नुक्सान मैंने अनजाने में कर दिया था, उसकी भरपाई की कोशिश कर रहा हूँ। संभव हो तो इसे उचित स्थान दीजियेगा….!बाद में दीदी से ताजमहल के बारे में पूछने पर उसने बताया कि शबनम का जो ताजमहल टूट गया था उसकी जगह उसने हूबहू वैसा ही ताजमहल खरीदकर उसी जगह पर रख दिया है। मेरे चेहरे पर निश्चिन्तता की मुस्कराहट तैर गई।




 

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